भारत की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में गिनी जाने वाली अरावली श्रृंखला केवल राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात तक सीमित एक भौगोलिक संरचना नहीं है, बल्कि यह देश की जलवायु, पर्यावरण और पारिस्थितिकी संतुलन की एक अहम धुरी है। हाल के वर्षों में अवैध खनन, अंधाधुंध निर्माण और वन क्षेत्र के तेजी से घटने के कारण अरावली का निरंतर क्षरण चिंता का विषय बनता जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि इसका प्रभाव केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसके दूरगामी परिणाम महाराष्ट्र जैसे राज्यों में भी महसूस किए जा सकते हैं।

अरावली पर्वतमाला उत्तर-पश्चिम भारत में एक प्राकृतिक अवरोधक की भूमिका निभाती है। यह थार मरुस्थल से उठने वाली गर्म और शुष्क हवाओं को नियंत्रित करती है और उन्हें देश के आंतरिक हिस्सों में तेजी से फैलने से रोकती है। जब इस पर्वतमाला का क्षरण होता है, तो मरुस्थलीकरण की प्रक्रिया तेज होती है। इसका सीधा असर मानसून की दिशा और तीव्रता पर पड़ता है, क्योंकि भारतीय मानसून प्रणाली अत्यंत संवेदनशील है और छोटे पर्यावरणीय बदलाव भी बड़े जलवायु प्रभाव उत्पन्न कर सकते हैं।

महाराष्ट्र पर इसका प्रभाव भले ही अप्रत्यक्ष हो, लेकिन दीर्घकालिक दृष्टि से यह गंभीर हो सकता है। जलवायु वैज्ञानिकों के अनुसार, अरावली के कमजोर होने से उत्तर-पश्चिम भारत में बढ़ती गर्मी और सूखे की स्थिति वायुमंडलीय परिसंचरण को प्रभावित करती है। यह परिवर्तन धीरे-धीरे मध्य और पश्चिमी भारत तक फैल सकता है, जिससे विदर्भ और मराठवाड़ा जैसे पहले से ही जल संकट और गर्मी से जूझ रहे क्षेत्रों में स्थिति और बिगड़ सकती है।

इसके अलावा, अरावली के क्षरण से उत्पन्न धूल कण और रेत के तूफान लंबी दूरी तय करते हैं। ये कण हवा के साथ बहकर पश्चिमी भारत के शहरी और अर्ध-शहरी इलाकों तक पहुँच सकते हैं। इससे न केवल वायु गुणवत्ता प्रभावित होती है, बल्कि स्वास्थ्य संबंधी जोखिम भी बढ़ते हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि शुष्क मौसम के दौरान महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में प्रदूषण और धुंध की बढ़ती घटनाओं के पीछे इस क्षेत्रीय पर्यावरणीय असंतुलन की भी भूमिका हो सकती है।

जल संसाधनों के संदर्भ में भी अरावली का महत्व कम नहीं है। यह पर्वतमाला भूजल पुनर्भरण में सहायक है और कई नदियों तथा जलधाराओं की जीवनरेखा मानी जाती है। जब यह प्राकृतिक व्यवस्था कमजोर होती है, तो पश्चिमी और मध्य भारत के जल स्रोतों पर दबाव बढ़ता है। महाराष्ट्र, जहां पहले से ही शहरीकरण और कृषि जरूरतों के कारण पानी की मांग अधिक है, वहां इस अप्रत्यक्ष दबाव के प्रभाव समय के साथ और स्पष्ट हो सकते हैं।

कानूनी और आधिकारिक स्तर पर अरावली की सुरक्षा को लेकर समय-समय पर दिशा-निर्देश और नीतिगत प्रयास किए गए हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर उनका प्रभाव सीमित रहा है। पर्यावरणविदों का मानना है कि अरावली को केवल एक क्षेत्रीय संपदा मानने की बजाय राष्ट्रीय पर्यावरण सुरक्षा ढांचे के हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए।

अंततः, अरावली का क्षरण यह संकेत देता है कि पर्यावरणीय क्षति की सीमाएँ राज्यों की सीमाओं से बंधी नहीं होतीं। आज यदि यह पर्वतमाला कमजोर होती है, तो उसका असर कल महाराष्ट्र की जलवायु, जल सुरक्षा और जनस्वास्थ्य पर दिखाई दे सकता है। यही कारण है कि अरावली का संरक्षण केवल उत्तर भारत की आवश्यकता नहीं, बल्कि पूरे देश की साझा जिम्मेदारी बनता जा रहा है।

Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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