रायपुर: छत्तीसगढ़ के वन्यजीव इतिहास में एक अत्यंत असाधारण और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विस्मयकारी घटनाक्रम सामने आया है। राज्य के उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में एक ऐसी वयस्क बाघिन की उपस्थिति दर्ज की गई है, जिसका देश के किसी भी आधिकारिक वन्यजीव रिकॉर्ड अथवा डेटाबेस में कोई सुराग उपलब्ध नहीं है। वन्यजीव वैज्ञानिकों और वन विभाग के अधिकारियों की चिंता और उत्सुकता तब और बढ़ गई जब इस बाघिन की शारीरिक धारियों के प्रतिरूप यानी स्ट्राइप पैटर्न का मिलान भारतीय वन्यजीव संस्थान के प्रतिष्ठित नेशनल टाइगर डेटाबेस से भी पूरी तरह विफल रहा। आमतौर पर प्रत्येक बाघ की धारियां इंसानी उंगलियों के निशान की तरह विशिष्ट होती हैं, परंतु इस मामले में किसी भी ज्ञात बाघ से इसका मेल न होना एक अनसुलझी पहेली बन गया है।

इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत साल की शुरुआत में हुई थी, जब पहली बार इस अज्ञात वन्यजीव को रिजर्व के कोर एरिया में देखा गया था। आरंभिक चरण में यह अनुमान लगाया जा रहा था कि संभवतः यह कोई प्रवासी बाघ है जो अन्य किसी पड़ोसी राज्य के गलियारे से होकर यहां से गुजर रहा है। हालांकि, इस रहस्यमयी वन्यजीव की शारीरिक पहचान और लिंग का सटीक निर्धारण करने के लिए वैज्ञानिक पद्धतियों का सहारा लिया गया। जबलपुर स्थित नानाजी देशमुख वेटरनरी साइंस यूनिवर्सिटी की अत्याधुनिक फॉरेंसिक लैब में इस वन्यजीव के मल के नमूनों की गहन जांच की गई। डीएनए और फॉरेंसिक विश्लेषण के बाद लैब की रिपोर्ट ने इस बात की आधिकारिक पुष्टि कर दी कि यह लगभग चार वर्ष की एक स्वस्थ मादा बाघ यानी बाघिन है।

इस खोज ने वन्यजीव विशेषज्ञों के बीच इसलिए भी हलचल तेज कर दी है क्योंकि हाल ही में सामने आईं ताजा कैमरा ट्रैप तस्वीरों से इसके स्थायी प्रवास के संकेत मिले हैं। शुरुआती संशय को खारिज करते हुए नई तस्वीरों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि इस अज्ञात बाघिन ने केवल इस क्षेत्र का दौरा नहीं किया, बल्कि उदंती के घने जंगलों को अपना नया स्थायी ठिकाना बना लिया है। जीवविज्ञान के स्थापित सिद्धांतों के अनुसार, नर बाघ अक्सर नए क्षेत्रों की खोज में एक हजार किलोमीटर तक की लंबी यात्राएं तय करने के लिए जाने जाते हैं, परंतु मादा बाघिनों का स्वभाव इसके बिल्कुल विपरीत होता है। वैज्ञानिक शोध दर्शाते हैं कि मादा बाघिनें अपने जन्मस्थान से अधिकतम डेढ़ सौ से दो सौ किलोमीटर के सीमित दायरे में ही विचरण करती हैं और नया इलाका चुनती हैं। ऐसे में पड़ोसी राज्यों जैसे ओडिशा या मध्य प्रदेश के कैमरा ट्रैप में बिना किसी रिकॉर्ड के, इस बाघिन का सीधे छत्तीसगढ़ के इस कोर जंगल में प्रकट हो जाना वैज्ञानिकों को चकित कर रहा है।

यह घटनाक्रम उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के पुनरुद्धार के लिए भी एक ऐतिहासिक मील का पत्थर माना जा रहा है। पिछले एक दशक के आंकड़ों पर नजर डालें तो इस अभ्यारण्य में बाघों का अस्तित्व लगभग पूरी तरह समाप्त होने की कगार पर पहुंच चुका था। साल 2014 की गणना में जहां यहां केवल तीन बाघ सक्रिय थे, वहीं 2018 आते-आते यह संख्या घटकर मात्र एक रह गई थी। इस शून्य को भरने के लिए वन विभाग ने प्रशासनिक स्तर पर प्रयास शुरू किए थे और यहां बाघों की आबादी को कृत्रिम रूप से दोबारा बसाने के लिए राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण को तीन बाघों को स्थानांतरित करने का एक औपचारिक प्रस्ताव भेजा था।

प्रशासनिक फाइलें और सरकारी मंजूरी की प्रक्रियाएं अभी कागजों पर चल ही रही थीं कि प्रकृति ने मानवीय योजनाओं से इतर खुद ही इस वीरान हो चुके जंगल को आबाद करने का बीड़ा उठा लिया। वन्यजीव विशेषज्ञ और पर्यावरणविद् इस सुखद घटनाक्रम को 'नेचुरल रीइंट्रोडक्शन' यानी प्राकृतिक पुनर्वास का एक अत्यंत उत्कृष्ट और दुर्लभ उदाहरण मान रहे हैं। बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के एक दुर्लभ वन्यजीव का यहां आकर बसना यह प्रमाणित करता है कि उदंती का पारिस्थितिक तंत्र और वन आवरण अब पुनः हिंसक जीवों और वन्यजीवों के पनपने के अनुकूल और सुरक्षित होने लगा है।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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