उत्तर भारत की जलवायु ढाल मानी जाने वाली अरावली पहाड़ियाँ एक बार फिर सुर्खियों में हैं। सवाल सीधा और गंभीर है क्या अरावली धीरे-धीरे रेगिस्तान में बदल सकती है? यह चर्चा उस समय तेज़ हुई है, जब सुप्रीम कोर्ट के एक हालिया आदेश में अरावली की नई, समान परिभाषा को स्वीकार किया गया है। इस फैसले के बाद सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई है, वहीं पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने इसके दूरगामी प्रभावों को लेकर चेतावनी दी है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार, अरावली प्रणाली में केवल वही भू-आकृतियाँ शामिल मानी जाएंगी, जो अपने आसपास के भू-भाग से कम से कम 100 मीटर ऊँची हों। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि इस तकनीकी परिभाषा के चलते अरावली का बड़ा हिस्सा जिसमें छोटे पहाड़, टीले और उनसे जुड़े वन क्षेत्र शामिल हैं कानूनी संरक्षण से बाहर हो सकता है। यही वह बिंदु है, जिसने “अरावली के रेगिस्तान में बदलने” की आशंका को जन्म दिया है।

फैसले के सामने आते ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर तीखी प्रतिक्रियाएँ देखने को मिलीं। ट्विटर (एक्स), इंस्टाग्राम और फेसबुक पर #SaveAravalli और #AravalliUnderThreat जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे। कई पर्यावरण संगठनों ने पोस्ट और वीडियो के जरिए यह समझाने की कोशिश की कि अरावली केवल ऊँची पहाड़ियों का समूह नहीं, बल्कि एक विस्तृत पारिस्थितिक तंत्र है, जिसकी निरंतरता टूटने से मरुस्थलीकरण की प्रक्रिया तेज़ हो सकती है। दिल्ली, गुरुग्राम और राजस्थान से जुड़े नागरिक समूहों ने इसे उत्तर भारत की पर्यावरणीय सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बताया।

पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि अरावली थार मरुस्थल और उत्तर भारत के घनी आबादी वाले क्षेत्रों के बीच एक प्राकृतिक अवरोध की तरह काम करती है। इसके जंगल धूल भरी हवाओं को रोकते हैं, तापमान संतुलित रखते हैं और मानसून के पानी को जमीन में समाहित कर भूजल पुनर्भरण में मदद करते हैं। यदि इन वनों की कटाई या भूमि उपयोग में बदलाव बढ़ता है, तो राजस्थान के पूर्वी हिस्सों से लेकर दिल्ली-एनसीआर तक रेगिस्तान जैसी परिस्थितियाँ बनने का खतरा बढ़ सकता है।

इस बीच, आधिकारिक और कानूनी पक्ष भी सामने आए हैं। न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े सूत्रों का कहना है कि अदालत का उद्देश्य परिभाषा में स्पष्टता लाना और नियमों के क्रियान्वयन को आसान बनाना है। साथ ही यह भी कहा गया है कि पर्यावरण संरक्षण से जुड़े मौजूदा कानून और नियामक संस्थाएँ अपना कार्य जारी रखेंगी। हालांकि, पर्यावरण समूहों का तर्क है कि परिभाषा में यह बदलाव जमीनी स्तर पर संरक्षण को कमजोर कर सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, यदि अरावली को संरचनात्मक और वनस्पति स्तर पर नुकसान पहुँचा, तो इसके परिणाम केवल स्थानीय नहीं होंगे। इससे वायु प्रदूषण में वृद्धि, अत्यधिक गर्मी, और पानी की उपलब्धता में गिरावट जैसी समस्याएँ सामने आ सकती हैं। दिल्ली और गुरुग्राम जैसे शहरी क्षेत्रों में इसका प्रभाव सीधे स्वास्थ्य और जीवन गुणवत्ता पर पड़ सकता है।

अरावली को लेकर उठ रहा यह सवाल—क्या वह रेगिस्तान में बदल जाएगी—वास्तव में भविष्य की चेतावनी है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद शुरू हुई यह बहस बताती है कि कानूनी परिभाषाएँ और पर्यावरणीय वास्तविकताएँ जब टकराती हैं, तो उसका असर केवल कागज़ों तक सीमित नहीं रहता। आने वाले समय में इस फैसले के प्रभाव और उस पर होने वाली कार्रवाइयाँ यह तय करेंगी कि अरावली अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभाती रहेगी या पर्यावरणीय दबावों के आगे कमजोर पड़ जाएगी।

Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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