भारत की प्राचीन भू-वैज्ञानिक धरोहरों में शामिल अरावली पर्वतमाला केवल पहाड़ों की श्रृंखला नहीं, बल्कि उत्तर भारत की पारिस्थितिक सुरक्षा कवच है। दिल्ली से हरियाणा, राजस्थान होते हुए गुजरात तक फैली यह पर्वतमाला सदियों से मरुस्थलीकरण को रोकने, भूजल पुनर्भरण सुनिश्चित करने और जैव विविधता को संरक्षित रखने में अहम भूमिका निभाती रही है। हाल के वर्षों में बढ़ती खनन गतिविधियों और पर्यावरणीय क्षरण के बीच, अरावली के संरक्षण को लेकर केंद्र और राज्यों के स्तर पर एक बार फिर गंभीर मंथन हुआ है।

अरावली पहाड़ियों को ऐतिहासिक रूप से 37 जिलों में राज्य सरकारों द्वारा मान्यता दी गई है। इन पहाड़ियों का महत्व केवल पर्यावरणीय ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से भी अत्यंत व्यापक है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने कई निर्णयों में यह स्पष्ट किया है कि अरावली क्षेत्र में अनियंत्रित खनन “देश की पारिस्थितिकी के लिए गंभीर खतरा” है। इसी पृष्ठभूमि में न्यायालय ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया था कि अरावली क्षेत्र की पहचान और संरक्षण के लिए एक समान और वैज्ञानिक मानदंड तय किए जाएं।

इन निर्देशों के अनुपालन में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) द्वारा गठित समिति ने विस्तृत अध्ययन और सभी संबंधित राज्य सरकारों के साथ व्यापक परामर्श किया। समिति की रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आया कि राजस्थान एकमात्र ऐसा राज्य है, जहां अरावली क्षेत्र को लेकर खनन विनियमन हेतु औपचारिक और स्पष्ट परिभाषा पहले से लागू है। यह परिभाषा वर्ष 2002 की राज्य सरकार की समिति की रिपोर्ट पर आधारित थी, जिसमें रिचर्ड मर्फी भूमि-आकृति वर्गीकरण प्रणाली को अपनाया गया था।

इस प्रणाली के अनुसार, स्थानीय भू-स्तर से 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाले सभी भू-आकृतियों को “पहाड़ी” माना गया और न केवल इन पहाड़ियों, बल्कि उनकी सहायक ढलानों पर भी खनन पर प्रतिबंध लगाया गया। राजस्थान सरकार 9 जनवरी 2006 से इस परिभाषा का पालन करती आ रही है। समिति की बैठकों और विचार-विमर्श के दौरान अन्य राज्यों ने भी इस मानदंड को वैज्ञानिक, व्यावहारिक और प्रभावी माना।

परिणामस्वरूप, सभी राज्यों ने सर्वसम्मति से “स्थानीय भू-स्तर से 100 मीटर ऊंचाई” के समान मानदंड को अपनाने पर सहमति जताई, साथ ही इसे और अधिक वस्तुनिष्ठ तथा पारदर्शी बनाने का निर्णय लिया गया। नए प्रावधानों के तहत, 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियों को घेरने वाली सबसे निचली बंद समोच्च रेखा (binding contour) के भीतर आने वाली सभी भूमि आकृतियों को—चाहे उनकी ऊंचाई या ढलान कुछ भी हो—खनन पट्टों के लिए निषिद्ध क्षेत्र घोषित किया जाएगा।

इसके अलावा, अरावली पर्वत श्रृंखला को परिभाषित करते हुए यह भी स्पष्ट किया गया कि 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली दो सन्निहित पहाड़ियों के बीच 500 मीटर की परिधि में आने वाली सभी भूमि आकृतियां भी खनन के लिए प्रतिबंधित रहेंगी। इस निर्णय का उद्देश्य केवल खनन गतिविधियों को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिक तंत्र को एक समग्र इकाई के रूप में संरक्षित करना है।

विशेषज्ञों के अनुसार, यह एकरूप मानदंड अरावली क्षेत्र में वर्षों से चली आ रही कानूनी अस्पष्टताओं को दूर करेगा और पर्यावरण संरक्षण तथा सतत विकास के बीच संतुलन स्थापित करने में सहायक होगा। अरावली की रक्षा का यह प्रयास न केवल वर्तमान पीढ़ी के लिए, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के जल, जलवायु और जैव विविधता की सुरक्षा के लिए भी निर्णायक सिद्ध हो सकता है।

Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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