कौन हैं यश चोपड़ा? रोमांस को सिनेमा की सबसे खूबसूरत भाषा बनाने वाला जादूगर
निर्देशक यश चोपड़ा ने 'धूल का फूल' से करियर की शुरुआत कर 'वीर-ज़ारा' जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्मों के जरिए हिंदी सिनेमा में रोमांस को एक नई पहचान दिलाई।

भारतीय फिल्म निर्देशक यश चोपड़ा जिन्होंने अपने पांच दशक लंबे करियर में यश राज फिल्म्स के बैनर तले कई प्रतिष्ठित और सफल फिल्मों का निर्देशन किया।
आज भी जब बॉलीवुड में प्यार, बारिश, स्विट्जरलैंड की वादियां और दिल छू लेने वाले गाने याद किए जाते हैं, तो सबसे पहले नाम आता है यश चोपड़ा का। हिंदी सिनेमा के इस लीजेंड ने सिर्फ फिल्में नहीं बनाईं, बल्कि इमोशंस को बड़े पर्दे पर जीना सिखाया। उनकी बनाई फिल्मों का असर ऐसा था कि लोग थिएटर से बाहर निकलकर भी किरदारों और गानों में खोए रहते थे। “दिल तो पागल है”, “वीर-ज़ारा”, “चांदनी” और “जब तक है जान” जैसी फिल्मों ने उन्हें रोमांस का किंग बना दिया। आज भी सोशल मीडिया पर उनकी फिल्मों के डायलॉग, गाने और विजुअल्स वायरल होते रहते हैं और नई पीढ़ी उन्हें बॉलीवुड का सबसे बड़ा स्टोरीटेलर मानती है।
27 सितंबर 1932 को लाहौर में जन्मे यश चोपड़ा का सफर आसान नहीं था। देश के बंटवारे के बाद उनका परिवार भारत आ गया और यहीं से उनके सपनों ने नई उड़ान भरी। इंजीनियर बनने का सपना देखने वाले यश चोपड़ा का दिल आखिरकार फिल्मों में बस गया। उन्होंने अपने बड़े भाई बी. आर. चोपड़ा के साथ असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर काम शुरू किया और फिर 1959 में “धूल का फूल” से डायरेक्शन की दुनिया में कदम रखा। उस दौर में जब फिल्में सिर्फ मनोरंजन तक सीमित थीं, यश चोपड़ा ने समाज, रिश्तों और इंसानी भावनाओं को अपनी कहानियों का हिस्सा बनाया। “धर्मपुत्र” जैसी फिल्म ने बंटवारे और कट्टरता जैसे मुद्दों को बड़े पर्दे पर दिखाकर सबको चौंका दिया।
सत्तर का दशक आते-आते यश चोपड़ा बॉलीवुड के सबसे बड़े फिल्ममेकर्स में गिने जाने लगे। “वक्त” ने मल्टीस्टारर फिल्मों का ट्रेंड शुरू किया, जबकि “दीवार” ने अमिताभ बच्चन को एंग्री यंग मैन बना दिया। “कभी-कभी”, “त्रिशूल” और “काला पत्थर” जैसी फिल्मों में उन्होंने रिश्तों, दर्द और महत्वाकांक्षा को जिस अंदाज में दिखाया, वो उस दौर से बहुत आगे था। फिर आया उनका सबसे बड़ा मास्टरस्ट्रोक “यश राज फिल्म्स”, जिसने हिंदी सिनेमा की तस्वीर बदल दी। इस बैनर ने सिर्फ ब्लॉकबस्टर फिल्में नहीं दीं, बल्कि बॉलीवुड को ग्लोबल पहचान भी दिलाई।
अस्सी और नब्बे के दशक में यश चोपड़ा ने रोमांस को नए अंदाज में पेश किया। श्रीदेवी के साथ “चांदनी” और “लम्हे” जैसी फिल्मों ने लोगों को इमोशंस की नई दुनिया दिखाई। “चांदनी” ने उस दौर के हिंसक सिनेमा के बीच प्यार और संगीत की वापसी कराई। वहीं “लम्हे” को आज भी हिंदी सिनेमा की सबसे बोल्ड और क्लासिक फिल्मों में गिना जाता है। इसके बाद शाहरुख खान के साथ उनकी जोड़ी इतिहास बन गई। “डर” ने शाहरुख को सुपरस्टार बना दिया, जबकि “दिल तो पागल है” और “वीर-ज़ारा” ने रोमांटिक फिल्मों की परिभाषा बदल दी। उनकी फिल्मों में प्यार सिर्फ कहानी नहीं होता था, बल्कि एक एहसास बन जाता था।
यश चोपड़ा की सबसे बड़ी खासियत थी उनकी फिल्मों की खूबसूरती। उनकी फिल्मों में मजबूत महिला किरदार, शानदार म्यूजिक, विदेशी लोकेशंस और दिल में उतर जाने वाली लव स्टोरीज़ होती थीं। स्विट्जरलैंड को भारतीय टूरिस्ट्स के बीच पॉपुलर बनाने का बड़ा श्रेय भी उन्हें ही जाता है। यही वजह है कि उन्हें दादासाहेब फाल्के अवॉर्ड, पद्म भूषण और ब्रिटिश एकेडमी की लाइफटाइम मेंबरशिप जैसे बड़े सम्मान मिले। उन्होंने 6 नेशनल अवॉर्ड और कई फिल्मफेयर अवॉर्ड अपने नाम किए। साल 2012 में “जब तक है जान” उनकी आखिरी फिल्म बनी और उसी दौरान डेंगू की वजह से उनका निधन हो गया। लेकिन सच यही है कि यश चोपड़ा कभी गए नहीं, क्योंकि हिंदी सिनेमा में रोमांस जब तक जिंदा रहेगा, उनका नाम हमेशा अमर रहेगा।

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