संजय दत्त अभिनीत फिल्म 'धुरंधर' इन दिनों अपनी सशक्त कहानी और किरदारों के कारण जबरदस्त चर्चा बटोर रही है, जिसमें दत्त ने पाकिस्तानी पुलिस अधिकारी चौधरी असलम की भूमिका निभाई है। आदित्य धर के निर्देशन में बनी यह फिल्म वास्तविक घटनाओं पर आधारित एक अर्ध-काल्पनिक कहानी है जो कराची के ल्यारी में सक्रिय आतंकी नेटवर्क के इर्द-गिर्द बुनी गई है। दिलचस्प तथ्य यह है कि असल जीवन में भी चौधरी असलम संजय दत्त के बड़े प्रशंसक थे, जो इस कास्टिंग को और भी सार्थक बनाता है। सिंध पुलिस के इस निडर अधिकारी असलम खान की जीवनगाथा वीरता, विवादों और अटूट कर्तव्यनिष्ठा का एक जटिल मिश्रण है, जो कराची के अपराध जगत में खौफ का पर्याय बन चुके थे।

10 अप्रैल 1963 को मानसेहरा जिले की धौडियाल यूनियन काउंसिल के अर्घुशाल गांव में एडवोकेट अकरम खान के घर जन्मे असलम का ताल्लुक पश्तूनों के स्वाति कबीले की उप-शाखा अर्घुशाल से था। प्राथमिक शिक्षा के पश्चात अपने पिता के साथ कराची स्थानांतरित होने वाले असलम ने 31 अक्टूबर 1984 को सहायक उप-निरीक्षक के रूप में सिंध पुलिस में अपने करियर का आगाज किया। अपनी विशिष्ट कार्यशैली के कारण उन्होंने कराची और बलूचिस्तान के विभिन्न थानों में सेवाएं दीं और निरंतर पदोन्नति प्राप्त करते हुए 1987 में गुलबहार थाने के एसएचओ, 1999 में नाजिमाबाद के डीएसपी और 2005 में पुलिस अधीक्षक (एसपी) के पद तक पहुंचे। वर्ष 2010 में उनकी क्षमताओं को देखते हुए उन्हें अपराध जांच विभाग (सीआईडी) के उग्रवाद विरोधी विंग का प्रमुख नियुक्त किया गया।

चौधरी असलम का करियर मुख्य रूप से कराची के अंडरवर्ल्ड और आतंकवाद के विरुद्ध चलाए गए कठोर अभियानों के लिए स्मरणीय है। 1992-1994 और 1996-1997 के कालखंड में उन्होंने एक 'एनकाउंटर स्पेशलिस्ट' के रूप में अपनी अमिट पहचान बनाई। हालांकि 1990 के दशक के 'ऑपरेशन क्लीन-अप' से जुड़े कई अधिकारियों की हत्या और विभिन्न विवादों के कारण उनका करियर प्रभावित रहा, किंतु 2004 में विभाग में बहाली के पश्चात उन्हें लक्षित हत्यारों के खात्मे और 'ल्यारी टास्क फोर्स' (LTF) के नेतृत्व की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई। 2005 से 2013 के मध्य उन्होंने मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट (MQM), तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP), बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA), लश्कर-ए-झांगवी और सिपह-ए-सहबा जैसे प्रतिबंधित संगठनों के खतरनाक अपराधियों और चरमपंथियों को या तो सलाखों के पीछे भेजा या मुठभेड़ में ढेर कर दिया। वर्ष 2006 में गैंगस्टर मुश्ताक ब्रोही की हत्या के आरोप में 16 महीने जेल काटने और 2009 में रहमान डकैत के कथित फर्जी एनकाउंटर जैसे गंभीर आरोपों के बावजूद, 2012 के 'ल्यारी ग्रैंड ऑपरेशन' में उनके साहसिक प्रदर्शन ने उनकी पेशेवर साख को पुनः स्थापित किया।

खतरों और हमलों से असलम का नाता सदैव बना रहा; वर्ष 2012 में डिफेंस फेज VIII स्थित उनके निजी आवास पर टीटीपी द्वारा किए गए भीषण ट्रक बम हमले में आठ निर्दोष लोग मारे गए थे, किंतु वे बाल-बाल बच निकले। उस भयावह मंजर में मलबे के बीच खड़े होकर उन्होंने अडिग स्वर में घोषणा की थी कि वे चरमपंथियों से कभी नहीं डरेंगे। अंततः 9 जनवरी 2014 को कराची के ईसा नगरी इलाके में ल्यारी एक्सप्रेसवे पर एक आत्मघाती कार हमलावर ने उनके काफिले को अपना निशाना बनाया। इस आत्मघाती हमले में असलम खान, उनके सुरक्षा गार्ड और चालक सहित तीन अधिकारियों की मृत्यु हो गई। टीटीपी के मोहमंद एजेंसी चैप्टर ने इस हमले की उत्तरदायित्व स्वीकार करते हुए असलम को अपनी हिट-लिस्ट में शीर्ष पर बताया था। जांच के दौरान यह सनसनीखेज तथ्य भी सामने आया कि असलम के अपने ही ड्राइवर-सह-बॉडीगार्ड ने आतंकियों को उनके आवागमन की सटीक सूचना लीक की थी। कालांतर में पाकिस्तान ने इस हत्याकांड में भारतीय नागरिक कुलभूषण जाधव की संलिप्तता का आरोप लगाया, जिसे भारत ने सिरे से खंडन किया। तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और सेना प्रमुख जनरल राहील शरीफ ने उन्हें 'शहीद' की उपाधि देते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की। उनकी इसी शौर्यगाथा और विरासत को 2022 की बायोपिक 'चौधरी - द मार्टियर' और अब भारतीय सिनेमा की फिल्म 'धुरंधर' के माध्यम से जीवंत रखा गया है।

Ruturaj Ravan

Ruturaj Ravan

यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।

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