कौन हैं असरानी? ‘शोले’ के जेलर से कॉमेडी के बेताज बादशाह बनने तक का सफर
350 से ज्यादा फिल्मों में काम कर असरानी भारतीय सिनेमा की कॉमेडी विरासत का अमर चेहरा बन गए।

गोवर्धन कुमार असरानी
जब भी हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार कॉमिक चेहरों की बात होती है, तो Govardhan Kumar Asrani यानी असरानी का नाम अपने आप सामने आ जाता है। “हम अंग्रेजों के जमाने के जेलर हैं” वाला उनका डायलॉग आज भी सोशल मीडिया पर मीम्स, रील्स और पुराने सिनेमा की चर्चाओं में धूम मचाता है। पांच दशक से भी ज्यादा लंबे करियर में 350 से ज्यादा हिंदी और गुजराती फिल्मों में काम करने वाले असरानी सिर्फ कॉमेडियन नहीं थे, बल्कि वो ऐसा चेहरा थे जिसने हर दौर के सुपरस्टार को अपनी मौजूदगी से और चमका दिया। राजेश खन्ना से लेकर अमिताभ बच्चन, जितेंद्र और गोविंदा तक, हर बड़े स्टार के साथ उनकी जोड़ी दर्शकों को खूब पसंद आई।
जयपुर के एक सिंधी परिवार में जन्मे असरानी का बचपन बिल्कुल आम था। पिता की कालीन की दुकान थी, लेकिन उनका मन बिजनेस में नहीं लगता था। पढ़ाई के साथ-साथ उन्होंने आकाशवाणी जयपुर में वॉइस आर्टिस्ट का काम किया ताकि अपनी फीस निकाल सकें। एक्टिंग का जुनून उन्हें मुंबई ले आया, जहां शुरुआत में संघर्ष मिला लेकिन किस्मत तब बदली जब ऋषिकेश मुखर्जी जैसे दिग्गज निर्देशक ने उनकी प्रतिभा पहचान ली। पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट से एक्टिंग सीखने के बाद उन्हें ‘सत्यकाम’ और ‘मेरे अपने’ जैसी फिल्मों में मौका मिला, और फिर पीछे मुड़कर देखने की जरूरत नहीं पड़ी।
सत्तर का दशक असरानी के नाम रहा। ‘बावर्ची’, ‘चुपके चुपके’, ‘रफू चक्कर’, ‘छोटी सी बात’, ‘अभिमान’, ‘नमक हराम’ और ‘शोले’ जैसी फिल्मों में उनकी कॉमिक टाइमिंग ने उन्हें घर-घर का चेहरा बना दिया। खास बात ये रही कि वो सिर्फ हंसाते नहीं थे, बल्कि अपने किरदारों में अलग तरह की मासूमियत और व्यंग्य भी लेकर आते थे। ‘कोशिश’ में नेगेटिव शेड, ‘खून पसीना’ में गंभीर रोल और ‘निकााह’ जैसी फिल्मों में रोमांटिक अंदाज दिखाकर उन्होंने साबित किया कि वो सिर्फ एक कॉमिक साइड हीरो नहीं, बल्कि पूरी तरह वर्सेटाइल कलाकार थे। उनकी और राजेश खन्ना की दोस्ती भी इंडस्ट्री में खूब मशहूर रही, और दोनों ने साथ में 25 फिल्मों में काम किया।
असरानी की सबसे बड़ी ताकत थी उनका बदलते दौर के साथ खुद को ढाल लेना। जब नब्बे के दशक में कॉमेडियन का ट्रेंड कमजोर पड़ने लगा, तब भी उन्होंने खुद को गायब नहीं होने दिया। ‘तक़दीरवाला’, ‘बड़े मियां छोटे मियां’, ‘हेरा फेरी’, ‘गरम मसाला’, ‘धमाल’, ‘भूल भुलैया’, ‘दे दना दन’ और ‘बोल बच्चन’ जैसी फिल्मों में उन्होंने नई पीढ़ी को भी उतना ही हंसाया जितना पुरानी पीढ़ी को। प्रियदर्शन और डेविड धवन की फिल्मों में उनका किरदार आते ही थिएटर में हंसी का माहौल बन जाता था। यही वजह रही कि 1970 और 1980 के दशक में सबसे ज्यादा फिल्मों में बतौर कॉमिक और कैरेक्टर आर्टिस्ट नजर आने का रिकॉर्ड भी उनके नाम दर्ज हुआ।
सिर्फ अभिनेता ही नहीं, असरानी निर्देशक और निर्माता भी रहे। ‘चला मुरारी हीरो बनने’ और ‘सलाम मेमसाब’ जैसी फिल्मों का निर्देशन उन्होंने खुद किया। गुजराती सिनेमा में भी उन्होंने हीरो से लेकर चरित्र अभिनेता तक हर तरह के रोल किए और वहां भी सुपरस्टार जैसी लोकप्रियता हासिल की। उनकी पत्नी मंजू बंसल के साथ उनकी ऑनस्क्रीन और ऑफस्क्रीन जोड़ी को भी खूब प्यार मिला। ‘आज की ताजा खबर’ और ‘बालिका बधू’ के लिए मिला फिल्मफेयर अवॉर्ड इस बात का सबूत था कि असरानी सिर्फ लोगों को हंसाने वाले कलाकार नहीं, बल्कि अभिनय की बारीकियों को समझने वाले अभिनेता थे।
20 अक्टूबर 2025 को असरानी ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन उनका सिनेमा आज भी जिंदा है। ‘शोले’ का जेलर, ‘चुपके चुपके’ का दोस्त, ‘हेरा फेरी’ का बैंक मैनेजर और ‘धमाल’ का नारी कॉन्ट्रैक्टर आज भी दर्शकों के चेहरे पर मुस्कान ले आता है। यही वजह है कि उनकी मौत के बाद भी सोशल मीडिया पर लोग उनके डायलॉग, सीन और फिल्मों को शेयर कर उन्हें याद कर रहे हैं। असरानी सिर्फ एक अभिनेता नहीं थे, वो हिंदी सिनेमा की उस सुनहरी कॉमेडी परंपरा का नाम थे जिसे शायद कभी भुलाया नहीं जा सकेगा।

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