आज जब भी हिंदी सिनेमा में डार्क, इंटेंस और दिमाग हिला देने वाली फिल्मों की बात होती है, तो सबसे पहले नाम आता है Vishal Bhardwaj का। सोशल मीडिया से लेकर फिल्म लवर्स की चर्चाओं तक, हर जगह उनकी फिल्मों का अलग ही क्रेज दिखाई देता है। “मकबूल”, “ओमकारा” और “हैदर” जैसी फिल्मों ने उन्हें सिर्फ एक डायरेक्टर नहीं, बल्कि हिंदी सिनेमा का ऐसा कहानीकार बना दिया जिसने शेक्सपियर को मुंबई के अंडरवर्ल्ड, यूपी की राजनीति और कश्मीर के दर्द में ढालकर नया सिनेमाई इतिहास लिख दिया। उनकी फिल्मों का माहौल, किरदारों की ग्रे शेड्स और म्यूजिक की बेचैन कर देने वाली धुनें आज भी लोगों के दिमाग में घूमती हैं।

उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के चांदपुर में जन्मे विशाल भारद्वाज का सपना कभी क्रिकेटर बनने का था। वह स्टेट अंडर-19 टीम तक खेल चुके थे, लेकिन एक चोट और पिता के निधन ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी। इसी दर्द और संघर्ष ने शायद उनके अंदर का कलाकार पैदा किया। कम उम्र में ही उन्होंने गाने लिखने और कंपोज करने शुरू कर दिए थे। बाद में दिल्ली यूनिवर्सिटी के हिंदू कॉलेज में पढ़ाई के दौरान उनकी मुलाकात रेखा भारद्वाज से हुई, जो आगे चलकर उनकी जीवनसाथी बनीं। मुंबई आने के बाद उन्होंने म्यूजिक कंपोजर बनने के लिए स्ट्रगल किया और फिर धीरे-धीरे वही इंसान हिंदी सिनेमा का सबसे अलग फिल्ममेकर बन गया।

विशाल भारद्वाज ने अपने करियर की शुरुआत म्यूजिक डायरेक्टर के तौर पर की थी। “माचिस” का संगीत आते ही पूरी इंडस्ट्री ने नोटिस करना शुरू कर दिया कि यह आदमी सिर्फ धुनें नहीं बनाता, माहौल रचता है। “छोड़ आए हम वो गलियां”, “चप्पा चप्पा चरखा चले” जैसे गाने आज भी लोगों की प्लेलिस्ट में जिंदा हैं। इसके बाद “सत्या”, “गॉडमदर”, “इश्किया”, “कमीने”, “हैदर” और “तालवर” जैसी फिल्मों में उनका संगीत कहानी का हिस्सा बन गया। यही वजह है कि उन्होंने कई नेशनल अवॉर्ड अपने नाम किए। गुलजार के साथ उनकी जोड़ी हिंदी सिनेमा की सबसे आइकॉनिक क्रिएटिव पार्टनरशिप मानी जाती है। दोनों ने मिलकर ऐसे गाने दिए जो सिर्फ सुने नहीं जाते, महसूस किए जाते हैं।

डायरेक्टर के तौर पर विशाल भारद्वाज ने जो दुनिया बनाई, वह बॉलीवुड के पारंपरिक मसाला सिनेमा से बिल्कुल अलग थी। “मकबूल” में मुंबई अंडरवर्ल्ड के बीच मैकबेथ की कहानी हो या “ओमकारा” में यूपी की राजनीतिक हिंसा के बीच ओथेलो का देसी रूप, उन्होंने हर कहानी को इतनी बारीकी से पेश किया कि लोग दंग रह गए। “हैदर” ने तो कश्मीर के दर्द और राजनीति को जिस हिम्मत के साथ दिखाया, उसने पूरे देश में बहस छेड़ दी। “कमीने” में शाहिद कपूर का डबल रोल, “7 खून माफ” की डार्क लव स्टोरी, “मटरू की बिजली का मंडोला” का पॉलिटिकल सटायर और “पातालखा” की देसी बहनों की लड़ाई— हर फिल्म में उनका अलग अंदाज़ दिखाई देता है। यही वजह है कि उनकी फिल्मों को बॉक्स ऑफिस से ज्यादा कल्ट स्टेटस मिला।

विशाल भारद्वाज सिर्फ डायरेक्टर या म्यूजिक कंपोजर नहीं, बल्कि पूरे सिनेमा के क्राफ्ट्समैन माने जाते हैं। वह अपनी फिल्मों का म्यूजिक खुद बनाते हैं, स्क्रिप्ट लिखते हैं और कई बार गाने भी गाते हैं। “ओमकारा”, “कमीने”, “7 खून माफ”, “हैदर” और “खुफिया” जैसी फिल्मों में उनकी आवाज़ ने अलग ही फील दी। उनकी फिल्मों में किरदार कभी पूरी तरह अच्छे या बुरे नहीं होते, और शायद यही चीज़ उन्हें बाकी फिल्ममेकर्स से अलग बनाती है। आज की नई पीढ़ी के फिल्ममेकर्स भी विशाल भारद्वाज के काम को फिल्म स्कूल की तरह देखती है।

नेशनल अवॉर्ड्स, फिल्मफेयर और इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल्स में सम्मान पाने वाले विशाल भारद्वाज आज भी एक्सपेरिमेंट करने से नहीं डरते। “खुफिया”, “चार्ली चोपड़ा एंड द मिस्ट्री ऑफ सोलंग वैली” और आने वाली फिल्म “ओ’रोमियो” को लेकर भी फैंस के बीच जबरदस्त एक्साइटमेंट है। यही वजह है कि हर बार जब विशाल भारद्वाज कोई नई कहानी लेकर आते हैं, तो पूरा सिनेमा जगत उन्हें देखने के लिए तैयार बैठा रहता है।

Pratahkal Newsroom

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