आज भी अगर आप अपने म्यूजिक ऐप पर 90 के दशक या 2000 की शुरुआत के रोमांटिक गानों की प्लेलिस्ट खोलते हैं, तो एक ऐसी आवाज कानों में पड़ती है जो सीधे दिल को छू जाती है। यह सुरीली और रूहानी आवाज किसी और की नहीं, बल्कि हम सबके चहेते उदित नारायण की है। उनकी गायकी में एक ऐसी स्मूथ और फील-गुड वाइब है जो आज के दौर के स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स पर भी जबरदस्त तरीके से ट्रेंड करती है। हैरानी की बात यह है कि आज की नई पीढ़ी के लिसनर्स भी उनके गानों को उतना ही एन्जॉय करते हैं जितना उनके पुराने फैंस करते आए हैं। यही कारण है कि आज की युवा पीढ़ी भी अक्सर यह पूछती नजर आती है कि आखिर इस जादुई आवाज के पीछे का इंसान कौन है जिसने संगीत की दुनिया को इतना खूबसूरत बनाया है।

एक दिसंबर 1955 को जन्मे उदित नारायण झा का सफर किसी ब्लॉकबस्टर फिल्मी कहानी से कम नहीं है। बिहार और नेपाल की मिट्टी से जुड़ी अपनी जड़ों के बीच पले-बढ़े उदित ने बहुत कम उम्र में ही यह ठान लिया था कि उन्हें संगीत की दुनिया में ही अपना नाम रोशन करना है। हालांकि, उनके लिए यह रास्ता फूलों की सेज नहीं था क्योंकि उनका परिवार चाहता था कि वह डॉक्टर या इंजीनियर बनकर अपना भविष्य संवारें। लेकिन उदित का दिल तो सिर्फ सुरों और तालों में बसता था। काठमांडू के रेडियो नेपाल से अपना सफर शुरू कर छोटे-छोटे शोज तक, उन्होंने हर उस मौके को लपका जिसने उन्हें उनके सपनों की नगरी मुंबई के करीब पहुँचाया।

मुंबई आने के बाद उनका असली स्ट्रगल शुरू हुआ, जहां उन्हें अनगिनत ऑडिशन्स, रिजेक्शन्स और लंबे इंतजार का सामना करना पड़ा। उनके सब्र का फल उन्हें साल 1980 में मिला जब फिल्म उन्नीस-बीस में उन्हें महान गायक मोहम्मद रफी के साथ गाने का सुनहरा मौका मिला। लेकिन उनके करियर का असली टर्निंग पॉइंट साल 1988 में आई फिल्म कयामत से कयामत तक का सुपरहिट गाना 'पापा कहते हैं' साबित हुआ। इस एक गाने ने उन्हें रातों-रात सुपरस्टार बना दिया और उन्हें अपना पहला फिल्मफेयर अवॉर्ड भी दिलाया। इस बड़ी कामयाबी के बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और सफलता की सीढ़ियां चढ़ते चले गए।

उदित नारायण की आवाज की सबसे बड़ी खासियत उनका भोलापन और सुनने वालों के साथ एक गहरा इमोशनल कनेक्ट रहा है। लगान फिल्म का गाना मितवा हो या दिल चाहता है का जाने क्यों लोग, उनके हर गाने ने संगीत प्रेमियों के दिलों पर गहरी छाप छोड़ी। छोटे-छोटे सपने और ये तारा वो तारा जैसे गानों ने उन्हें नेशनल अवॉर्ड्स दिलाए और उन्हें प्लेबैक सिंगिंग का असली प्रिंस बना दिया। उनके करियर की सबसे दिलचस्प बात यह है कि वह भारतीय संगीत जगत के इकलौते ऐसे मेल सिंगर हैं जिन्होंने 80, 90 और 2000 के तीनों दशकों में लगातार फिल्मफेयर अवॉर्ड्स जीते हैं। यही कंसिस्टेंसी उन्हें इंडस्ट्री के बाकी गायकों से बिल्कुल अलग और खास बनाती है।

उदित नारायण का प्रभाव सिर्फ बॉलीवुड तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने नेपाली और भोजपुरी संगीत में भी अपनी एक अलग पहचान बनाई। उन्होंने भोजपुरी फिल्म कब होई गवनवा हमार प्रोड्यूस कर नेशनल अवॉर्ड जीतकर यह साबित कर दिया कि वह एक बेहतरीन कलाकार के साथ-साथ एक विजनरी भी हैं। उनकी बेमिसाल उपलब्धियों के लिए भारत और नेपाल दोनों देशों ने उन्हें सर्वोच्च सम्मानों से नवाजा है। साल 2009 में पद्म श्री और 2016 में पद्म भूषण जैसे प्रतिष्ठित नागरिक सम्मानों से लेकर नेपाल के राजा द्वारा दिए गए सम्मानों तक, उनकी उपलब्धियों की लिस्ट बहुत लंबी है।

आज भी उदित नारायण की विरासत सिर्फ उनके पुराने गानों तक सिमट कर नहीं रह गई है, बल्कि उनके बेटे आदित्य नारायण भी इसी म्यूजिकल लिगेसी को बड़ी बखूबी से आगे बढ़ा रहे हैं। उदित नारायण की पूरी जर्नी हमें यह सिखाती है कि अगर आपके पास टैलेंट है और आप लगातार मेहनत करने का जज्बा रखते हैं, तो कोई भी सपना अधूरा नहीं रहता। शायद यही वजह है कि इतने दशकों के बाद भी जब उनका कोई गाना बजता है, तो वह बिल्कुल फ्रेश और एवरग्रीन महसूस होता है। उनकी आवाज आज भी हर प्रेमी और संगीत के चाहने वाले के लिए एक मरहम की तरह काम करती है।

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Pratahkal Newsroom

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