तेलुगु सिनेमा में अगर किसी निर्देशक के डायलॉग्स थिएटर में सीटियां और तालियां एक साथ बजवा देते हैं, तो वह नाम है Trivikram Srinivas। इन दिनों फिर से उनकी चर्चा तेज है, क्योंकि एक तरफ उनके क्लासिक डायलॉग्स सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं, तो दूसरी तरफ उनकी फिल्मों का इमोशन, फैमिली ड्रामा और फिलॉसॉफी वाला अंदाज नई पीढ़ी को भी खूब पसंद आ रहा है। फैंस उन्हें प्यार से “माताला मान्त्रिकुडु” यानी शब्दों का जादूगर और “गुरुजी” बुलाते हैं। उनकी फिल्मों में हीरो सिर्फ लड़ता नहीं, रिश्तों की अहमियत भी समझाता है, और यही चीज उन्हें बाकी निर्देशकों से अलग बनाती है।

आंध्र प्रदेश के भीमावरम में जन्मे त्रिविक्रम का असली नाम अकेला नागा श्रीनिवास शर्मा था। बचपन से फिल्मों का जबरदस्त क्रेज था, लेकिन हालात ऐसे थे कि हैदराबाद जाकर फिल्म इंडस्ट्री में किस्मत आजमाना भी मुश्किल लगता था। पढ़ाई में इतने तेज थे कि न्यूक्लियर फिजिक्स में मास्टर्स करने के बाद गोल्ड मेडल हासिल किया। वह स्कूल में मैथ्स, फिजिक्स और केमिस्ट्री पढ़ाते थे, लेकिन दिल में फिल्ममेकर बनने का सपना पल रहा था। इसी दौरान उनके दोस्त और अभिनेता Sunil ने उन्हें हैदराबाद बुलाया और वहीं से उनकी जिंदगी ने नया मोड़ लिया।

फिल्म इंडस्ट्री में शुरुआत आसान नहीं थी। कभी ट्यूशन पढ़ाकर गुजारा किया, तो कभी बिना पैसों के शूटिंग लोकेशन तक पहुंचना भी मुश्किल हो गया। लेकिन उनकी लिखाई में ऐसा दम था कि धीरे-धीरे बड़े लेखक और निर्माता उन्हें नोटिस करने लगे। “स्वयंवरम”, “नुव्वे कवाली”, “नुव्वु नाकु नचाव” और “मन्मधुडु” जैसी फिल्मों के डायलॉग्स ने उन्हें रातोंरात स्टार राइटर बना दिया। खास बात यह थी कि उनके डायलॉग्स सिर्फ पंचलाइन नहीं होते थे, उनमें जिंदगी की फिलॉसॉफी, रिश्तों की गर्माहट और हल्का-फुल्का ह्यूमर भी होता था। यही वजह रही कि तेलुगु सिनेमा में उनकी अलग पहचान बन गई।

साल 2002 में उन्होंने “नुव्वे नुव्वे” से निर्देशन की दुनिया में कदम रखा और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। “अथाडु”, “जलसा”, “जुलायी”, “अत्तारिंटिकी दारेदी”, “एस/ओ सत्यामूर्ति”, “आ आ”, “अरविंदा समेथा वीरा राघव” और “अला वैकुंठपुरमुलू” जैसी फिल्मों ने उन्हें साउथ सिनेमा के सबसे बड़े निर्देशकों की लिस्ट में ला खड़ा किया। उनकी फिल्मों में फैमिली इमोशन, मास एंटरटेनमेंट और क्लासी राइटिंग का ऐसा कॉम्बिनेशन देखने को मिलता है, जो कम ही निर्देशकों के पास है। “अला वैकुंठपुरमुलू” ने बॉक्स ऑफिस पर रिकॉर्ड तोड़े और Allu Arjun के साथ उनकी जोड़ी को सुपरहिट बना दिया।

हालांकि उनके करियर में उतार-चढ़ाव भी आए। “अज्ञातवासी” और “गुंटूर कारम” जैसी फिल्में उम्मीदों पर खरी नहीं उतर सकीं, लेकिन इसके बावजूद उनकी फैन फॉलोइंग में कोई कमी नहीं आई। वजह साफ है—त्रिविक्रम सिर्फ फिल्में नहीं बनाते, वह डायलॉग्स के जरिए जिंदगी को बड़े पर्दे पर उतारते हैं। उनके किरदार रिश्तों, आत्मसम्मान और परिवार की अहमियत पर जोर देते हैं। यही कारण है कि उनकी फिल्मों के सीन और डायलॉग्स आज भी मीम्स, रील्स और सोशल मीडिया पोस्ट्स में छाए रहते हैं।

पुरस्कारों की बात करें तो त्रिविक्रम ने बेस्ट डायलॉग राइटर के लिए छह नंदी अवॉर्ड जीते हैं, जबकि “अथाडु” और “अत्तारिंटिकी दारेदी” के लिए उन्हें बेस्ट डायरेक्टर का फिल्मफेयर अवॉर्ड भी मिला। भारतीय सिनेमा में योगदान के लिए उन्हें बी. एन. रेड्डी नेशनल अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया। एक समय ट्यूशन पढ़ाकर गुजारा करने वाला यह लड़का आज भारतीय सिनेमा के सबसे ज्यादा फीस लेने वाले निर्देशकों में गिना जाता है। यही वजह है कि त्रिविक्रम श्रीनिवास सिर्फ एक निर्देशक नहीं, बल्कि तेलुगु सिनेमा की सोच बदलने वाला नाम बन चुके हैं।

Pratahkal Newsroom

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