हिंदी साहित्य और भारतीय सिनेमा के इतिहास में पंडित नरेंद्र शर्मा का नाम एक ऐसे रचनाकार के रूप में दर्ज है, जिन्होंने शब्दों को संवेदना, संस्कार और सांस्कृतिक चेतना का स्वर दिया। 11 फरवरी को उनकी पुण्यतिथि पर उनका बहुआयामी योगदान फिर से स्मरण में आता है- एक ऐसे कवि का, जिसने साहित्य, रेडियो, सिनेमा और टेलीविजन सभी माध्यमों में अपनी विशिष्ट छाप छोड़ी।

उत्तर प्रदेश में जन्मे नरेंद्र शर्मा बचपन से ही हिंदी साहित्य की ओर आकर्षित थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अध्ययन किया, जो उस समय हिंदी साहित्यिक चेतना का प्रमुख केंद्र था। वहीं उन्हें छायावाद के प्रमुख स्तंभों महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ और जयशंकर प्रसाद का सान्निध्य और प्रभाव मिला। इन महान रचनाकारों की साहित्यिक दृष्टि ने उनके काव्य को गहराई, संवेदनशीलता और दार्शनिक विस्तार प्रदान किया।



लता मंगेशकर के साथ उनका संबंध विशेष उल्लेखनीय रहा। लता जी उन्हें पिता समान मानती थीं और वे उन्हें अपनी पुत्री कहकर संबोधित करते थे। ब्रिटेन के चैनल 4 के लिए नसीरीन मुन्नी कबीर द्वारा निर्मित एक डॉक्यूमेंट्री में लता मंगेशकर ने स्वीकार किया था कि उन्होंने ‘पंडितजी’ से जीवन के अनेक पाठ सीखे और उनकी सलाह ने उन्हें कठिन परिस्थितियों से उबरने की शक्ति दी।


उनकी प्रमुख फिल्मों में शामिल हैं:

  • राधा कृष्ण (1954)
  • भाभी की चूड़ियां (1961)
  • फिर भी (1971)
  • सत्यम शिवम सुंदरम (1978)
  • प्रेम रोग (1982)
  • सुभा (1982)


साहित्यिक जीवन की शुरुआत के साथ ही उन्होंने 1934 में ‘अभ्युदय’ समाचारपत्र का प्रकाशन किया, जो उनके वैचारिक और संपादकीय कौशल का प्रमाण था। इसके बाद उनका रुख फिल्म जगत की ओर हुआ। 1943 में आई फिल्म ‘हमारी बात’ से उन्होंने हिंदी सिनेमा में गीतकार के रूप में पदार्पण किया। इसके बाद उन्होंने सौ से अधिक फिल्मों में गीत लिखे और लगभग सभी प्रमुख संगीतकारों तथा गायकों के साथ कार्य किया।



नरेंद्र शर्मा का योगदान केवल फिल्मों तक सीमित नहीं रहा। वे ऑल इंडिया रेडियो से जुड़े और ‘विविध भारती सेवा’ के संस्थापक रहे। रेडियो के माध्यम से उन्होंने साहित्य और संस्कृति को जन-जन तक पहुंचाया। आगे चलकर वे लोकप्रिय टीवी धारावाहिक ‘महाभारत’ के वैचारिक सलाहकार बने और इसके लिए गीत भी लिखे। यह उनका अंतिम महत्वपूर्ण कार्य था।

11 फरवरी 1989 को, धारावाहिक के प्रसारण शुरू होने के चार महीने बाद, 76 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया—अपने 77वें जन्मदिन से मात्र 16 दिन पहले। उनका निधन भारतीय साहित्य और कला जगत के लिए एक युग का अवसान था। पंडित नरेंद्र शर्मा की रचनात्मक यात्रा इस बात का प्रमाण है कि शब्द जब संस्कार और संवेदना से जुड़ते हैं, तो वे समय की सीमाओं को पार कर अमर हो जाते हैं। उनकी विरासत आज भी हिंदी साहित्य, सिनेमा और सांस्कृतिक इतिहास में प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है।




Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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