कौन हैं जोसेफ विजय? पर्दे के 'थलपति' से लेकर सियासत के 'नायक' बनने तक की पूरी कहानी
अभिनेता विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कड़गम ने विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर राजनीति में ऐतिहासिक पदार्पण किया है।

अभिनेता से राजनेता बने जोसेफ विजय अपनी नई पार्टी 'तमिलगा वेत्री कड़गम' की चुनावी सफलता के बाद चेन्नई में सरकार बनाने की तैयारी में।
आज दक्षिण भारत से लेकर दिल्ली के गलियारों तक सिर्फ एक ही नाम की गूंज है और वो है जोसेफ विजय। जिन्हें प्यार से दुनिया 'थलपति' कहती है, उन्होंने हाल ही में २०२६ के तमिलनाडु विधानसभा चुनावों में अपनी नई राजनीतिक पार्टी 'तमिलगा वेत्री कड़गम' के साथ जो धमाका किया है, उसने सबको हैरान कर दिया है। महज़ १०८ सीटें जीतकर विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरना कोई छोटी बात नहीं है। सिनेमा की चकाचौंध को पीछे छोड़ विजय अब राज्य की तकदीर बदलने के मिशन पर निकल पड़े हैं। कल तक जो सुपरस्टार अपनी फिल्मों से बॉक्स ऑफिस हिलाता था, आज वही शख्स राजभवन में सरकार बनाने का दावा पेश कर रहा है। उनकी यह नई पारी उनके दशकों पुराने फिल्मी करियर जितनी ही रोमांचक और पावरफुल नजर आ रही है।
विजय का यह सफर रातों-रात शुरू नहीं हुआ, बल्कि इसकी नींव १९८४ में एक बाल कलाकार के रूप में फिल्म 'वेट्री' से पड़ी थी। उनके पिता एस ए चंद्रशेखर ने उन्हें 'नालय्या थीरपू' से बतौर लीड हीरो लॉन्च किया, लेकिन शुरुआत में उन्हें काफी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। हालांकि, विजय ने हार नहीं मानी और 'पूवे उनक्कागा' जैसी रोमांटिक हिट्स के जरिए लोगों के दिलों में जगह बनाई। धीरे-धीरे 'घिल्ली', 'पोक्किरी' और 'थुप्पाक्की' जैसी एक्शन फिल्मों ने उन्हें मास महाराजा बना दिया। उन्होंने 'मर्सल', 'सरकार', 'मास्टर' और 'लियो' जैसी ६०० करोड़ी फिल्मों के जरिए साबित किया कि बॉक्स ऑफिस पर उनका सिक्का चलता है। तीन दशकों के इस फिल्मी सफर में वह भारत के सबसे महंगे और प्रभावशाली अभिनेताओं में शुमार हो गए।
लेकिन विजय सिर्फ एक अभिनेता नहीं, बल्कि एक जबरदस्त डांसर और बेहतरीन गायक भी हैं। 'गूगल गूगल' और 'सेल्फी पुल्ला' जैसे गानों से उन्होंने अपनी आवाज का जादू चलाया। उन्हें 'कलैमामणि' और 'मानद डॉक्टरेट' जैसे बड़े सम्मानों से नवाजा गया। दिलचस्प बात यह है कि जब वह अपने करियर के शिखर पर थे, तभी उन्होंने 'जाना नायगन' के बाद फिल्मों को अलविदा कहकर पूरी तरह राजनीति में आने का फैसला किया। उनका यह कदम उनके प्रशंसकों के लिए भावुक करने वाला था, लेकिन उनकी लोकप्रियता ऐसी थी कि उनके प्रशंसकों ने चुनावी मैदान में भी उनका साथ नहीं छोड़ा।
विजय का निजी जीवन भी काफी चर्चा में रहा है। १९९९ में संगीता सोर्नलिंगम के साथ हुई उनकी शादी और उनके बच्चों, जैसन संजय और दिव्या साशा के साथ उनके रिश्ते हमेशा मीडिया की सुर्खियों में रहे। हालांकि, २०२५ और २०२६ में उनके तलाक की खबरों और निजी विवादों ने भी काफी तूल पकड़ा, लेकिन विजय ने अपनी प्रोफेशनल और राजनीतिक गरिमा को बनाए रखा। उनकी संपत्ति ६.२५ अरब रुपये से अधिक आंकी गई है, जो उनकी मेहनत और कामयाबी का प्रमाण है। तमाम कानूनी विवादों और टैक्स जांचों के बावजूद, जनता के बीच उनकी छवि एक मसीहा और 'थलपति' की ही बनी रही।
अब जब २०२६ के नतीजों ने उन्हें एक बड़े राजनीतिक खिलाड़ी के रूप में स्थापित कर दिया है, तो तमिलनाडु की राजनीति में एक नया युग शुरू होता दिख रहा है। हालांकि बहुमत के दावों को लेकर अभी पेंच फंसा हुआ है, लेकिन विजय ने यह साफ कर दिया है कि वह एम जी रामचंद्रन और जयललिता जैसे दिग्गजों की विरासत को आगे ले जाने के लिए तैयार हैं। उदयनिधि स्टालिन जैसे पुराने दोस्तों के साथ उनकी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता ने राज्य के चुनावी माहौल को और भी दिलचस्प बना दिया है। पर्दे का यह हीरो अब हकीकत की जंग में अपनी किस्मत आज़मा रहा है और पूरी दुनिया की नजरें उनके अगले कदम पर टिकी हैं।

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