तेलुगु सिनेमा में जब भी दमदार महिला विलेन या देसी अंदाज वाली कॉमिक किरदारों की बात होती है, तो सबसे पहले नाम आता है तेलंगाना शकुंतला का। उनकी भारी आवाज, जबरदस्त डायलॉग डिलीवरी और तेलंगाना बोली में बोलने का अंदाज ऐसा था कि स्क्रीन पर आते ही पूरा माहौल बदल जाता था। आज भी सोशल मीडिया पर उनके कई सीन वायरल होते रहते हैं और नई पीढ़ी उन्हें “ओरिजिनल मास एंटरटेनर” के तौर पर याद करती है। चाहे फिल्म ‘ओसेय रामुलम्मा’ हो, ‘ओक्काडु’ या फिर ‘लक्ष्मी’, हर रोल में उन्होंने ऐसा असर छोड़ा कि दर्शक उनके किरदार को भूल ही नहीं पाए।

महाराष्ट्र में जन्मी शकुंतला का सफर बिल्कुल फिल्मी कहानी जैसा था। उनके पिता आर्मी ऑफिसर थे, लेकिन बचपन से ही उन्हें स्टेज और अभिनय की दुनिया आकर्षित करती थी। एक थिएटर ग्रुप को देखकर उन्हें तेलुगु भाषा से ऐसा प्यार हुआ कि उन्होंने सिर्फ एक साल में भाषा सीख ली और थिएटर में उतर गईं। रविंद्र भारती में उन्होंने अपने स्टेज करियर की शुरुआत की और धीरे-धीरे थिएटर की दुनिया में अपनी अलग पहचान बना ली। बाद में 1979 में फिल्म ‘मा भूमि’ से उनका फिल्मी सफर शुरू हुआ और फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

तेलंगाना शकुंतला की सबसे बड़ी ताकत थी उनका रॉ और देसी स्क्रीन प्रेजेंस। वो सिर्फ विलेन नहीं थीं, बल्कि ऐसा किरदार निभाती थीं जिसमें डर भी होता था और कॉमेडी भी। यही वजह थी कि ‘नुव्वु नेनु’, ‘वीडे’, ‘गंगोत्री’, ‘इंद्रा’, ‘संदाडे संदाडी’ और ‘सैनीकुडु’ जैसी फिल्मों में उनके रोल को लोगों ने हाथोंहाथ लिया। तमिल सिनेमा में भी उन्होंने अपनी छाप छोड़ी और फिल्म ‘धूल’ में ‘सोर्नक्का’ का किरदार इतना पॉपुलर हुआ कि तमिल ऑडियंस भी उनकी फैन बन गई। उनकी बोली, एक्सप्रेशन और स्क्रीन एनर्जी ने उन्हें बाकी कलाकारों से बिल्कुल अलग बना दिया।

फिल्मों के साथ-साथ शकुंतला ने टीवी इंडस्ट्री में भी काम किया और हर प्लेटफॉर्म पर अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई। खास बात यह थी कि वो जिस भी किरदार में आती थीं, उस रोल को पूरी तरह जी लेती थीं। उन्हें 1980 में फिल्म ‘कुक्का’ के लिए नंदी अवॉर्ड से सम्मानित किया गया, जो उनके अभिनय की ताकत का सबसे बड़ा सबूत माना जाता है। अपने लंबे करियर में उन्होंने सैकड़ों फिल्मों में काम किया और हर दौर के बड़े सितारों के साथ स्क्रीन शेयर की।

तेलुगु भाषा के प्रति उनका प्यार इतना गहरा था कि अपने आखिरी इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि अगर उन्हें दोबारा जन्म मिले तो वो तेलुगु परिवार में जन्म लेना चाहेंगी। यही लगाव उन्हें दर्शकों के दिलों के बेहद करीब ले आया। 14 जून 2014 को कार्डियक अरेस्ट की वजह से उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी दमदार आवाज और यादगार किरदार आज भी सिनेमा प्रेमियों के दिलों में जिंदा हैं। तेलंगाना शकुंतला सिर्फ एक अभिनेत्री नहीं थीं, बल्कि वो उस दौर की पहचान थीं जब महिला किरदार भी फिल्मों में पूरी ताकत के साथ स्क्रीन पर राज करते थे।

Pratahkal Newsroom

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