Suryakantham का नाम आज भी तेलुगु सिनेमा की सबसे दमदार और यादगार अभिनेत्रियों में लिया जाता है। सोशल मीडिया पर उनकी पुरानी फिल्मों के क्लिप्स और डायलॉग्स फिर से वायरल हो रहे हैं, और नई पीढ़ी भी जानना चाहती है कि आखिर वो कौन थीं जिनकी एंट्री होते ही पर्दे पर डर, कॉमेडी और ड्रामा एक साथ शुरू हो जाता था। क्रूर सास, चालाक औरत या घर की दबंग महिला का किरदार हो, सूर्यकांतम ने उसे ऐसा निभाया कि वो किरदार हमेशा के लिए अमर हो गया। उनकी खास बात ये थी कि निगेटिव रोल में भी वो लोगों को हंसाने का हुनर रखती थीं, और यही उन्हें बाकी अभिनेत्रियों से अलग बनाता था।

आंध्र प्रदेश के काकीनाडा के पास एक तेलुगु परिवार में जन्मीं सूर्यकांतम बचपन से ही कला की दुनिया की तरफ खिंच गई थीं। महज छह साल की उम्र में उन्होंने डांस और सिंगिंग सीखना शुरू कर दिया था। परिवार में कई दुख देखने के बावजूद उन्होंने अपने सपनों का साथ नहीं छोड़ा। फिल्मों में उनका शुरुआती सफर आसान नहीं था। उन्होंने मशहूर फिल्म ‘चंद्रलेखा’ में डांसर के तौर पर काम किया, जिसके लिए उन्हें सिर्फ 75 रुपये मिले थे। बाद में ‘नारदा नारदी’ से अभिनय की शुरुआत हुई, लेकिन असली पहचान उन्हें धीरे-धीरे कैरेक्टर रोल्स से मिली। चेहरे पर चोट लगने वाली एक बड़ी कार दुर्घटना के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और अपने अभिनय के दम पर इंडस्ट्री में मजबूत जगह बनाई।

सूर्यकांतम की सबसे बड़ी ताकत उनका स्क्रीन प्रेजेंस था। वो जब भी पर्दे पर आती थीं, दर्शकों की नजरें उन्हीं पर टिक जाती थीं। ‘संसारम’ में क्रूर सास का किरदार हो, ‘मायाबाजार’ की हिडिंबी हो या फिर ‘गुंडम्मा कथा’ की गुंडम्मा, हर रोल में उन्होंने जान डाल दी। खास बात ये रही कि दर्शक उनसे डरते भी थे और उन्हें पसंद भी उतना ही करते थे। उस दौर के दिग्गज निर्माता-निर्देशक बी. नागी रेड्डी और चक्रपाणि तो बिना सूर्यकांतम के फिल्म बनाने की सोचते तक नहीं थे। यही वजह थी कि ‘गुंडम्मा कथा’ जैसी फिल्म सुपरहिट साबित हुई और उन्हें घर-घर में पहचान मिल गई।

दिलचस्प बात ये है कि सूर्यकांतम सिर्फ बेहतरीन अभिनेत्री ही नहीं, बल्कि बेहद संवेदनशील इंसान भी थीं। एक बॉलीवुड निर्माता ने उन्हें हीरोइन बनने का मौका दिया था, लेकिन उन्होंने ये रोल सिर्फ इसलिए ठुकरा दिया क्योंकि किसी दूसरी अभिनेत्री को हटाकर उन्हें लिया जा रहा था। उनका कहना था कि वो किसी कलाकार की बदकिस्मती पर अपना करियर नहीं बनाना चाहतीं। यही सोच उन्हें इंडस्ट्री में सम्मान दिलाती थी। उन्होंने करीब पांच दशकों तक सिनेमा पर राज किया और तेलुगु के साथ-साथ तमिल फिल्मों में भी अपनी अलग पहचान बनाई।

अपने लंबे करियर में सूर्यकांतम ने ‘रामुडु भीमुडु’, ‘नर्तनशाला’, ‘लव कुशा’, ‘यमगोला’, ‘यमुडिकी मोगुडु’ और ‘गोविंदा गोविंदा’ जैसी कई बड़ी फिल्मों में काम किया। उन्हें ‘महानटी सावित्री मेमोरियल अवॉर्ड’ से सम्मानित किया गया और पद्मावती महिला विश्वविद्यालय ने मानद डॉक्टरेट भी दी। ‘गय्याली अत्तैया’, ‘हास्य नटा शिरोमणि’ और ‘रंगस्थला शिरोमणि’ जैसे खिताब उनके अभिनय के प्रभाव को दिखाते हैं। 18 दिसंबर 1994 को उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा, लेकिन उनकी आवाज, उनका अंदाज और उनकी कॉमिक टाइमिंग आज भी तेलुगु सिनेमा के इतिहास में जिंदा है।

Pratahkal Newsroom

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