आज के डिजिटल दौर में जब हर रोज़ नए गाने आते और जाते हैं, वहीं एक पुरानी आवाज़ फिर से मोबाइल स्क्रीन पर जादू बिखेर रही है। अगर आप इंस्टाग्राम रील्स या स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स खंगाल रहे हैं, तो आपने गौर किया होगा कि मुकेश के सदाबहार नगमे एक बार फिर ट्रेंड में हैं। “कभी कभी मेरे दिल में” से लेकर “कहीं दूर जब दिन ढल जाए” तक, उनकी रूहानी आवाज़ आज की नई पीढ़ी को भी अपना दीवाना बना रही है। लोगों को हैरानी हो रही है कि दशकों पहले रिकॉर्ड हुए इन गानों में आज भी वही ताजगी और गहरा अहसास कैसे बचा हुआ है, जो सीधे दिल के तार छेड़ देता है।

दिल्ली के एक साधारण परिवार में साल उन्नीस सौ तेईस में जन्मे मुकेश चंद माथुर का असल जिंदगी का सफर किसी फिल्मी पटकथा जैसा ही रोमांचक रहा है। दसवीं के बाद एक मामूली नौकरी करने वाले इस लड़के की किस्मत तब बदली जब उनके एक दूर के रिश्तेदार और मशहूर अभिनेता मोतीलाल ने उनकी आवाज़ की खनक को पहचाना। मोतीलाल ही उन्हें सपनों के शहर मुंबई लेकर आए, जहाँ से हिंदी सिनेमा को एक ऐसा गायक मिला जिसकी आवाज़ दर्द, सच्चाई और सादगी का दूसरा नाम बन गई। हालांकि शुरुआत में वो अपने आदर्श के एल सहगल की नकल करते थे, लेकिन दिग्गज संगीतकार नौशाद ने उन्हें उनकी अपनी मौलिक शैली खोजने में मदद की, जिसने आगे चलकर इतिहास रच दिया।

मुकेश की आवाज़ और राज कपूर की स्क्रीन मौजूदगी का ऐसा संगम हुआ कि दोनों एक-दूसरे की पहचान बन गए। “आवारा हूं” और “जीना यहां मरना यहां” जैसे गानों ने राज कपूर के फिल्मी किरदारों को एक नई रूह दी। यह रिश्ता इतना गहरा था कि जब मुकेश दुनिया छोड़ कर गए, तो राज कपूर के शब्द थे कि उन्होंने अपनी आवाज़ खो दी है। मुकेश कभी गानों की संख्या की दौड़ में शामिल नहीं हुए, उन्होंने अपने पूरे करियर में करीब तेरह सौ गाने गाए, लेकिन उनका हर एक गाना मील का पत्थर साबित हुआ। “एक प्यार का नगमा है” और “दोस्त दोस्त ना रहा” जैसे गानों में उन्होंने जो इमोशनल डेप्थ डाली, वह आज भी बेमिसाल है।

उनकी प्रतिभा का लोहा पूरी दुनिया ने माना और साल उन्नीस सौ चौहत्तर में फिल्म रजनीगंधा के गाने “कई बार यूं ही देखा है” के लिए उन्हें नेशनल अवॉर्ड से नवाजा गया। इसके अलावा उनके खाते में कई फिल्मफेयर अवॉर्ड्स भी आए। उन्होंने दिलीप कुमार, मनोज कुमार और सुनील दत्त जैसे दिग्गज सितारों के लिए भी प्लेबैक सिंगिंग की, लेकिन राज कपूर के साथ उनकी जोड़ी हमेशा सबसे खास रही। मुकेश की व्यक्तिगत जिंदगी भी काफी साहसी रही; उन्होंने अपने करियर के शुरुआती अनिश्चित दौर में सरला त्रिवेदी से भागकर शादी की और तमाम मुश्किलों के बावजूद एक खुशहाल परिवार बनाया। उनकी इस सुरीली विरासत को उनके बेटे नितिन मुकेश और पोते नील नितिन मुकेश ने आज भी बखूबी संभाला हुआ है।

भले ही साल उन्नीस सौ छिहत्तर में अमेरिका के एक कॉन्सर्ट के दौरान दिल का दौरा पड़ने से मुकेश हमें अलविदा कह गए, लेकिन उनकी आवाज़ आज भी हमारे बीच ज़िंदा है। वो आज भी हर उस इंसान के साथी हैं जिसने कभी मोहब्बत की है या जिंदगी के उतार-चढ़ाव को महसूस किया है। सोशल मीडिया पर उनके गानों का दोबारा वायरल होना इस बात का सबूत है कि सच्ची आवाज़ कभी बूढ़ी नहीं होती। मुकेश आज भी सिर्फ एक गायक नहीं, बल्कि करोड़ों दिलों की धड़कन और अहसासों की वो गूँज हैं जो वक्त के साथ और भी गहरी होती जा रही है।

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Pratahkal Newsroom

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