पिता और बच्चे का रिश्ता प्यार, उम्मीदों, मतभेद और त्याग से बना होता है। हिंदी और गुजराती सिनेमा ने इस रिश्ते को अलग-अलग भावनात्मक पहलुओं के साथ पर्दे पर पेश किया है। कहीं पिता अपने बच्चे को छोड़ नहीं पाता, कहीं वह चुपचाप त्याग करता है, तो कहीं पीढ़ियों के बीच मतभेद रिश्ते की जटिलता को सामने लाते हैं। ऐसी ही 5 फिल्मों में पिता के यादगार किरदारों के जरिए इस रिश्ते के अलग-अलग रंग देखने को मिलते हैं।

धर्मा प्रोडक्शंस की गुजराती सिनेमा में पहली फिल्म ‘जिंदगी वन्स मोर’ में सिद्धार्थ रांदेरिया ने पिता का किरदार निभाया है। जयमिन के निर्देशन में बनी यह फिल्म पिता और बेटे के रिश्ते पर आधारित है। कहानी उस भावनात्मक बदलाव को सामने लाती है, जब बेटा अपने पिता को केवल पिता की भूमिका में नहीं, बल्कि एक सोच, पसंद और अपनी जिंदगी वाले इंसान के रूप में समझना शुरू करता है।

सिद्धार्थ रांदेरिया के अभिनय में अपनापन, सहजता और हल्का हास्य दिखाई देता है। फिल्म यह दिखाती है कि एक बेटे को अपने पिता की जिंदगी के ऐसे पहलुओं का पता चलता है, जिनके बारे में उसे पहले जानकारी नहीं थी। ‘जिंदगी वन्स मोर’ अब शेमारूमी पर आने वाली है और यह सवाल सामने रखती है कि माता-पिता के करीब जाने की शुरुआत क्या उन्हें सिर्फ माता-पिता के रूप में नहीं, बल्कि एक इंसान के रूप में जानने से हो सकती है।

‘पीकू’ में अमिताभ बच्चन ने भास्कोर बनर्जी का किरदार निभाया है। वह अपनी बात पर अड़े रहने वाला, अलग तरह का, जरूरत से ज्यादा दखल देने वाला और लगातार अपनी बेटी से कुछ न कुछ कहने वाला पिता है। इसके बावजूद उसके किरदार को पसंद किए बिना रहना मुश्किल है।

अमिताभ बच्चन के अभिनय, हाव-भाव और संवाद बोलने के अंदाज ने भास्कोर के कई परेशान करने वाले पलों को भी मजेदार बना दिया है। वहीं दीपिका पादुकोण ने पीकू के किरदार में नाराजगी और अपनापन दोनों को प्रभावी ढंग से दिखाया है। पिता और बेटी की लगातार होने वाली नोकझोंक के बीच उनके रिश्ते में प्यार भी साफ दिखाई देता है। फिल्म करीबी रिश्तों में नाराजगी और प्यार के एक साथ मौजूद रहने की तस्वीर पेश करती है।

‘102 नॉट आउट’ में अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर की जोड़ी एक बार फिर पिता और बेटे के रिश्ते को अलग अंदाज में सामने लाती है। अमिताभ बच्चन ने 102 साल के ऐसे पिता का किरदार निभाया है, जो जिंदगी को पूरे उत्साह के साथ जीना चाहता है। वहीं ऋषि कपूर ने उनके 75 साल के बेटे की भूमिका निभाई है, जो अपनी रोजमर्रा की जिंदगी और आदतों में पूरी तरह बंध चुका है।

दोनों कलाकारों का अलग-अलग अंदाज फिल्म को मजेदार बनाता है। ऋषि कपूर की प्रतिक्रियाएं भी उतनी ही मनोरंजक हैं, जितनी अमिताभ बच्चन की हरकतें। फिल्म में पिता अपने बड़े हो चुके बेटे को जिंदगी को खुलकर जीना सिखाता है और पिता-पुत्र के रिश्ते को एक अलग नजरिए से सामने लाता है। ‘102 नॉट आउट’ साल 2018 में आई थी और अब प्राइम वीडियो पर उपलब्ध है।

‘अंग्रेजी मीडियम’ में इरफान खान का चंपक बंसल का किरदार एक ऐसे पिता की कहानी सामने लाता है, जो अपनी बेटी के विदेश जाकर पढ़ाई करने के सपने को पूरा करने की कोशिश करता है। इस भूमिका में इरफान ने हास्य, परेशानी, चिंता और बेटी के लिए गहरे प्यार को सहज तरीके से पेश किया है।

इरफान खान की आंखों के हाव-भाव, रुककर बोलना और छोटी-छोटी प्रतिक्रियाएं कई बार बिना शब्दों के ही बहुत कुछ कह देती हैं। राधिका मदान के साथ उनके दृश्यों में पिता-बेटी का रिश्ता स्वाभाविक दिखाई देता है। चंपक बंसल के किरदार के जरिए एक आम पिता की भावनाओं को इरफान ने अपने सहज अभिनय से यादगार बनाया। साल 2020 की यह फिल्म जियो हॉटस्टार पर उपलब्ध है।

‘उड़ान’ में पिता और बेटे का रिश्ता प्यार और त्याग से आगे बढ़कर एक कठिन रूप में सामने आता है। रोनित रॉय ने भैरव सिंह का किरदार निभाया है, जो सख्त और कम भावनाएं दिखाने वाला पिता है। वह अपने बेटे के भविष्य को लेकर अपनी सोच को सही मानता है। उनका अभिनय इस किरदार को प्रभावशाली बनाता है, लेकिन उसे आसानी से पसंद किए जाने वाला किरदार नहीं बनाता।

रजत बरमेचा ने रोहन की भूमिका निभाई है, जो लिखना चाहता है, लेकिन अपने पिता की उम्मीदों के दबाव में फंसा हुआ है। दोनों किरदारों के बीच का तनाव फिल्म की भावनात्मक ताकत बनता है। ‘उड़ान’ पिता और बेटे के रिश्ते को किसी आदर्श रूप में पेश करने के बजाय यह सवाल सामने रखती है कि जब माता-पिता के लिए प्यार का अर्थ कुछ और हो और बच्चे के लिए आजादी का अर्थ कुछ और, तो उस रिश्ते पर उसका क्या असर पड़ता है। साल 2010 की यह फिल्म जियो हॉटस्टार पर उपलब्ध है।

इन पांच फिल्मों में पिता के किरदार अलग-अलग परिस्थितियों और भावनात्मक स्तरों पर दिखाई देते हैं। ‘जिंदगी वन्स मोर’, ‘पीकू’, ‘102 नॉट आउट’, ‘अंग्रेजी मीडियम’ और ‘उड़ान’ पिता और बच्चों के रिश्ते में मौजूद अपनापन, नोकझोंक, त्याग, चिंता, पीढ़ियों के मतभेद और आजादी की चाह को अलग-अलग तरीके से सामने लाती हैं।

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