होटल अकाउंटेंट से नेशनल अवॉर्ड विजेता निर्देशक बनने तक शूजित सरकार ने भारतीय सिनेमा को विक्की डोनर और सरदार उधम जैसी कई प्रभावशाली और सफल फिल्में दी हैं।

फिल्म निर्देशक शूजित सरकार जिन्होंने 'आई वॉन्ट टू टॉक' के लिए बेस्ट फिल्म क्रिटिक्स का फिल्मफेयर अवॉर्ड जीता और इंडस्ट्री में अपनी एक अलग पहचान बनाई।
आजकल जब भी कंटेंट ड्रिवन सिनेमा की बात होती है, तो सबसे पहले जिस नाम की चर्चा होती है, वो है Shoojit Sircar। सोशल मीडिया से लेकर फिल्म सर्किट तक हर जगह उनके काम की तारीफ हो रही है। वजह सिर्फ उनकी फिल्मों की सफलता नहीं, बल्कि वो इमोशनल गहराई है जो उनकी कहानियों में दिखाई देती है। “सरदार उधम” जैसी ऐतिहासिक फिल्म हो या “पिकू” जैसी हल्की-फुल्की लेकिन दिल छू लेने वाली कहानी, शूजित सरकार ने हर बार साबित किया कि बिना शोर मचाए भी सिनेमा लोगों के दिलों तक पहुंच सकता है। अब “आई वॉन्ट टू टॉक” के लिए फिर से बेस्ट फिल्म क्रिटिक्स का फिल्मफेयर अवॉर्ड जीतने के बाद उनका नाम फिर ट्रेंड में है।
कोलकाता के एक बंगाली परिवार में जन्मे शूजित सरकार का सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं रहा। उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की और शुरुआती दिनों में होटल में अकाउंटेंट की नौकरी भी की। लेकिन फिल्मों का जुनून उन्हें लगातार खींचता रहा। इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में सत्यजीत रे की “पाथेर पांचाली” और वियतनाम वॉर पर बनी डॉक्यूमेंट्री “डियर अमेरिका” देखने के बाद उन्होंने तय कर लिया कि जिंदगी फिल्मों को ही समर्पित करनी है। थिएटर ग्रुप “ऐक्ट वन” के जरिए उन्होंने मनोज बाजपेयी, पियूष मिश्रा और आशीष विद्यार्थी जैसे कलाकारों के साथ काम किया और यहीं से उनकी क्रिएटिव दुनिया की नींव पड़ी।
शूजित सरकार ने 2005 में “यहां” से डायरेक्शन की शुरुआत की, लेकिन असली पहचान उन्हें “विक्की डोनर” ने दिलाई। स्पर्म डोनेशन जैसे टैबू विषय को हल्के-फुल्के अंदाज में दिखाना उस दौर में बड़ा रिस्क माना जाता था, मगर उन्होंने इसे ऐसा बनाया कि फिल्म बॉक्स ऑफिस पर भी छा गई और नेशनल अवॉर्ड भी जीत ले गई। इसी फिल्म ने आयुष्मान खुराना को बॉलीवुड में लॉन्च किया। इसके बाद “मद्रास कैफे” में उन्होंने राजनीति और इतिहास को जिस गंभीरता से पेश किया, उसने क्रिटिक्स को चौंका दिया। राजीव गांधी हत्याकांड की बैकड्रॉप पर बनी इस फिल्म ने दिखा दिया कि शूजित सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि सोचने पर मजबूर करने वाला सिनेमा बनाते हैं।
अगर शूजित सरकार की फिल्मों की सबसे बड़ी ताकत पूछी जाए, तो वो है उनकी साधारण कहानियों को असाधारण बना देने की कला। “पिकू” में बाप-बेटी के रिश्ते को जिस खूबसूरती से दिखाया गया, उसने हर घर को अपनी कहानी याद दिला दी। अमिताभ बच्चन, दीपिका पादुकोण और इरफान खान की केमिस्ट्री आज भी लोगों के दिल में बसी हुई है। वहीं “पिंक” ने समाज में महिलाओं की सहमति और अधिकार जैसे मुद्दों पर ऐसी बहस छेड़ी कि फिल्म सिर्फ हिट नहीं, बल्कि एक सामाजिक आंदोलन जैसी बन गई। “नो मतलब नो” वाला संवाद आज भी पॉप कल्चर का हिस्सा माना जाता है।
शूजित सरकार का सिनेमा हमेशा अलग रहा है। “ऑक्टोबर” जैसी शांत और भावनात्मक फिल्म बनाना हर निर्देशक के बस की बात नहीं। उन्होंने रिश्तों को बिना ड्रामा और ओवरएक्टिंग के इतने सच्चे तरीके से दिखाया कि दर्शक खुद को कहानी के भीतर महसूस करने लगे। कोरोना काल में रिलीज हुई “गुलाबो सिताबो” ने ओटीटी पर भी उनकी पकड़ साबित की। लेकिन “सरदार उधम” ने उन्हें एक नए स्तर पर पहुंचा दिया। जलियांवाला बाग हत्याकांड के दर्द और उधम सिंह की जिंदगी को उन्होंने जिस संवेदनशीलता के साथ पर्दे पर उतारा, उसकी तारीफ देश ही नहीं विदेशों में भी हुई। इस फिल्म को हिंदी सिनेमा की सबसे बेहतरीन बायोपिक फिल्मों में गिना जाता है।
आज शूजित सरकार सिर्फ एक निर्देशक नहीं, बल्कि ऐसे फिल्ममेकर बन चुके हैं जिनकी हर फिल्म एक अनुभव लगती है। उनकी प्रोडक्शन कंपनी “राइजिंग सन फिल्म्स” लगातार नए और अलग विषयों पर काम कर रही है। नेशनल अवॉर्ड से लेकर फिल्मफेयर तक, उनके खाते में कई बड़े सम्मान हैं, लेकिन उनकी असली ताकत वो भरोसा है जो दर्शकों को उनकी फिल्मों पर है। यही वजह है कि जब भी शूजित सरकार नई फिल्म की घोषणा करते हैं, लोगों को यकीन होता है कि इस बार भी कहानी सिर्फ एंटरटेन नहीं करेगी, कुछ महसूस भी कराएगी।

