कौन हैं संजय मिश्रा? कॉमेडी के बादशाह जिन्होंने एक्टिंग को बना दिया जादू
बिहार के दरभंगा से निकलकर नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के जरिए अभिनय की दुनिया में पहचान बनाने वाले संजय मिश्रा के संघर्ष और सफलता की कहानी।

अपनी गंभीर और हास्य भूमिकाओं के लिए पहचाने जाने वाले अभिनेता संजय मिश्रा जिन्होंने 'आंखों देखी' और 'वध' जैसी फिल्मों के लिए फिल्मफेयर क्रिटिक्स अवॉर्ड जीते हैं।
आज जब भी बॉलीवुड में दमदार एक्टिंग, शानदार कॉमिक टाइमिंग और दिल छू लेने वाले किरदारों की बात होती है, तो सबसे पहले नाम आता है संजय मिश्रा का। सोशल मीडिया पर उनके मीम्स वायरल होते हैं, फिल्मों में उनका छोटा सा सीन भी पूरी कहानी पर भारी पड़ जाता है और दर्शक उनकी मौजूदगी भर से स्क्रीन से चिपक जाते हैं। यही वजह है कि हर नई फिल्म के साथ लोग पूछते हैं कि आखिर यह अभिनेता इतना खास क्यों है। चाहे “धोंडू, जस्ट चिल” वाला मजेदार अंदाज़ हो या “आंखों देखी” का गंभीर और भावुक किरदार, संजय मिश्रा ने हर बार साबित किया कि असली कलाकार वही होता है जो हर रंग में फिट बैठे।
बिहार के दरभंगा में जन्मे संजय मिश्रा का सफर बिल्कुल आसान नहीं था। बनारस में पढ़ाई करने के बाद उन्होंने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से एक्टिंग सीखी और वहीं से उनके सपनों को असली दिशा मिली। शुरुआती दिनों में उन्होंने छोटे-छोटे रोल किए, विज्ञापनों में काम किया और टीवी की दुनिया में संघर्ष किया। कहा जाता है कि “चाणक्य” के सेट पर पहले दिन उन्होंने एक सीन के लिए 28 टेक दिए थे। लेकिन यही मेहनत आगे जाकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी। “ओह डार्लिंग! ये है इंडिया”, “सत्या” और “दिल से” जैसी फिल्मों में छोटे रोल निभाते-निभाते उन्होंने इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनानी शुरू कर दी।
टीवी शो “ऑफिस ऑफिस” में शुक्ला के किरदार ने उन्हें घर-घर में मशहूर कर दिया। पान चबाने वाला भ्रष्ट कर्मचारी इतना लोकप्रिय हुआ कि लोग आज भी उस किरदार को याद करके हंस पड़ते हैं। इसके बाद “गोलमाल”, “धमाल”, “ऑल द बेस्ट”, “फंस गए रे ओबामा” और “वेलकम” जैसी फिल्मों में उनकी कॉमिक टाइमिंग ने उन्हें बॉलीवुड का सबसे भरोसेमंद कॉमिक अभिनेता बना दिया। खास बात यह रही कि संजय मिश्रा कभी सिर्फ कॉमेडी तक सीमित नहीं रहे। “मसान”, “कड़वी हवा”, “कामयाब” और “वध” जैसी फिल्मों में उन्होंने ऐसी गहरी एक्टिंग दिखाई कि आलोचक भी उनके फैन बन गए।
साल 2014 में आई “आंखों देखी” उनके करियर का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट बनी। फिल्म में “बाऊजी” के किरदार ने दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर दिया और इसी फिल्म के लिए उन्हें फिल्मफेयर क्रिटिक्स अवॉर्ड मिला। इसके बाद “वध” में उनके अभिनय ने फिर साबित कर दिया कि उम्र बढ़ने के साथ उनकी कला और भी निखरती जा रही है। यही कारण है कि उन्हें दो बार फिल्मफेयर क्रिटिक्स बेस्ट एक्टर अवॉर्ड मिल चुका है। “मसान” के लिए भी उन्हें खूब सराहना मिली और ज़ी सिने अवॉर्ड तक अपने नाम किया। संजय मिश्रा उन गिने-चुने कलाकारों में हैं जो मल्टीस्टार फिल्मों में भी अपनी अलग छाप छोड़ देते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि संजय मिश्रा सिर्फ अभिनेता ही नहीं बल्कि निर्देशक और वॉइस आर्टिस्ट भी रहे हैं। उन्होंने “प्रणाम वालेकुम” और “धमा चौकड़ी” जैसी फिल्मों का निर्देशन किया, वहीं “द लॉयन किंग” के हिंदी वर्जन में पुम्बा को अपनी आवाज़ भी दी। क्रिकेट फैंस उन्हें “मौका मौका” विज्ञापन और 1999 वर्ल्ड कप के “एप्पल सिंह” वाले किरदार से भी याद करते हैं। आज भी नेटफ्लिक्स, ओटीटी और बड़े पर्दे पर उनकी लगातार मौजूदगी यह साबित करती है कि कंटेंट के इस दौर में असली स्टार वही है जो अभिनय से दिल जीत ले।
अब हाल यह है कि चाहे “भूल भुलैया”, “भक्षक”, “भोला” या आने वाली “वध 2” और “धमाल 4” जैसी फिल्में हों, दर्शक सबसे ज्यादा इंतजार संजय मिश्रा के किरदार का करते हैं। उन्होंने दिखा दिया कि स्टारडम सिर्फ हीरो बनने से नहीं आता, बल्कि हर किरदार को यादगार बना देने से आता है। यही वजह है कि बॉलीवुड में उन्हें एक्टिंग का ऐसा जादूगर माना जाता है, जो बिना शोर किए हर फिल्म का सबसे मजबूत चेहरा बन जाता है।

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