आज भी जब बॉलीवुड की सबसे रहस्यमयी और स्टाइलिश अभिनेत्रियों की बात होती है, तो सबसे पहला नाम रेखा का आता है। सोशल मीडिया पर उनकी हर झलक वायरल हो जाती है, चाहे वह किसी अवॉर्ड शो में कांजीवरम साड़ी पहनकर पहुंचें या फिर अपनी मुस्कान से पूरी महफिल लूट लें। रेखा सिर्फ एक अभिनेत्री नहीं, बल्कि हिंदी सिनेमा का वो चेहरा हैं जिन्होंने खुद को बार-बार नए अंदाज़ में पेश किया और हर दौर में अपनी अलग पहचान बनाई। यही वजह है कि दशकों बाद भी उनका स्टारडम कम नहीं हुआ और लोग आज भी उनके बारे में जानने के लिए उतने ही उत्सुक रहते हैं।

10 अक्टूबर 1954 को चेन्नई में जन्मीं भानुरेखा गणेशन का बचपन आसान नहीं था। साउथ के मशहूर अभिनेता जेमिनी गणेशन और अभिनेत्री पुष्पावल्ली की बेटी होने के बावजूद उन्हें अपने पिता का पूरा साथ कभी नहीं मिला। आर्थिक परेशानियों ने उन्हें बहुत छोटी उम्र में फिल्मों की दुनिया में धकेल दिया। महज 13-14 साल की उम्र में उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और कैमरे के सामने आ गईं। शुरुआत में उन्हें उनके रंग, वजन और लुक्स को लेकर काफी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। लेकिन रेखा ने हार मानने के बजाय खुद को पूरी तरह बदलने का फैसला किया। योग, डाइट, हिंदी भाषा पर मेहनत और अभिनय की बारीकियों ने उन्हें उस दौर की सबसे ग्लैमरस और दमदार अभिनेत्री बना दिया।

रेखा का हिंदी डेब्यू फिल्म ‘सावन भादों’ से हुआ और इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। ‘घर’ और ‘मुकद्दर का सिकंदर’ ने उन्हें गंभीर अभिनेत्री के रूप में स्थापित किया, जबकि ‘खूबसूरत’ ने उनके अंदर की कॉमिक टाइमिंग को दुनिया के सामने ला दिया। ‘उमराव जान’ में उनकी अदाकारी आज भी हिंदी सिनेमा की सबसे बेहतरीन परफॉर्मेंस में गिनी जाती है। इस फिल्म के लिए उन्हें नेशनल अवॉर्ड मिला और लोग उनकी आवाज़, अदाओं और शायरी के दीवाने हो गए। ‘खून भरी मांग’ में बदले की आग में जलती महिला का किरदार निभाकर उन्होंने यह साबित कर दिया कि महिला प्रधान फिल्में भी बॉक्स ऑफिस पर राज कर सकती हैं।

रेखा की जिंदगी सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं रही। उनका नाम अक्सर Amitabh Bachchan के साथ जोड़ा गया और दोनों की जोड़ी ने ‘सिलसिला’, ‘सुहाग’ और ‘मिस्टर नटवरलाल’ जैसी फिल्मों में इतिहास रचा। इनकी कथित लव स्टोरी बॉलीवुड की सबसे चर्चित कहानियों में शामिल रही। वहीं 1990 में बिजनेसमैन मुकेश अग्रवाल से उनकी शादी और फिर कुछ महीनों बाद उनकी दुखद मौत ने रेखा की निजी जिंदगी को विवादों और दर्द से भर दिया। मीडिया ने उन्हें रहस्यमयी और अकेली अभिनेत्री की छवि दे दी, लेकिन रेखा हमेशा अपने अंदाज़ में जिंदगी जीती रहीं।

2000 के दशक में भी रेखा का जादू खत्म नहीं हुआ। ‘कोई मिल गया’ और ‘कृष’ में उन्होंने मां और दादी के किरदारों में ऐसी गर्मजोशी दिखाई कि नई पीढ़ी भी उनकी फैन बन गई। उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया और राज्यसभा सदस्य के रूप में भी उन्होंने अपनी पहचान बनाई। फिल्म इंडस्ट्री में लोग उन्हें “दिवा” का असली मतलब मानते हैं। संजय लीला भंसाली ने उन्हें “आखिरी महान स्टार” कहा, जबकि कई फिल्म समीक्षक आज भी मानते हैं कि रेखा जैसी स्क्रीन प्रेजेंस किसी और अभिनेत्री में नहीं दिखती।

रेखा की सबसे बड़ी ताकत यही रही कि उन्होंने हर मुश्किल को अपनी ताकत बनाया। कभी अपने लुक्स के लिए रिजेक्ट की जाने वाली लड़की ने आगे चलकर ग्लैमर की नई परिभाषा लिख दी। उनकी जिंदगी में दर्द, प्यार, संघर्ष, विवाद और सफलता सब कुछ रहा, लेकिन उन्होंने हर दौर में खुद को एक आइकन की तरह पेश किया। शायद यही वजह है कि रेखा सिर्फ एक अभिनेत्री नहीं, बल्कि हिंदी सिनेमा का जिंदा इतिहास मानी जाती हैं।

Pratahkal Newsroom

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