कौन हैं रंगायना रघु? 400 फिल्मों के बाद भी क्यों नहीं थम रहा इस स्टार का जलवा
थियेटर से शुरुआत कर 400 से अधिक फिल्मों में काम करने वाले रंगायना रघु ने 'शाखाहारी' और 'रंगसमुद्र' जैसी फिल्मों से अपनी बहुमुखी प्रतिभा साबित की है।

कन्नड़ अभिनेता रंगायना रघु, जिन्होंने फिल्म 'दुनिया' के लिए राज्य पुरस्कार जीता और 'शाखाहारी' में अपने अभिनय के लिए चर्चा में रहे।
कन्नड़ सिनेमा में इन दिनों अगर किसी कलाकार की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है, तो वह हैं Rangayana Raghu। साल 2024 में आई फिल्मों ‘रंगसमुद्र’ और ‘शाखाहारी’ ने एक बार फिर साबित कर दिया कि रघु सिर्फ कॉमेडी कलाकार नहीं, बल्कि ऐसे दमदार अभिनेता हैं जो किसी भी किरदार में जान डाल सकते हैं। ‘शाखाहारी’ में मासूम सुब्बन्ना भट्ट का रोल हो या ‘रंगसमुद्र’ में आत्मसम्मान के लिए लड़ते लोक कलाकार की कहानी, हर जगह उनका अभिनय लोगों के दिलों में उतर गया। यही वजह है कि दशकों पुराना यह चेहरा आज भी नई पीढ़ी के बीच वायरल बना हुआ है।
17 अप्रैल 1965 को कर्नाटक के तुमकुर जिले के छोटे से गांव कोत्तुरु में जन्मे रघुनाथ का सफर बिल्कुल फिल्मी कहानी जैसा रहा। उनके पिता लोक कलाकार थे और गांव में बयलाटा लोकनाट्य किया करते थे। बचपन से ही मंच और अभिनय का माहौल देखने वाले रघु के अंदर भी एक्टिंग का जुनून पैदा हुआ। बेंगलुरु के नेशनल कॉलेज में पढ़ाई के दौरान उनका झुकाव थिएटर की तरफ बढ़ा और फिर उन्होंने मशहूर रंगकर्मी बी. वी. कारंथ के थिएटर ग्रुप ‘रंगायना’ से जुड़कर अभिनय की बारीकियां सीखीं। यही थिएटर आगे चलकर उनकी पहचान बन गया और लोग उन्हें ‘रंगायना रघु’ के नाम से जानने लगे।
फिल्मों में उनका शुरुआती दौर आसान नहीं था। उनकी पहली फिल्म ‘सुग्गी’ रिलीज ही नहीं हो पाई, लेकिन 1998 में आई ‘भूमि थय्या चोच्चला मागा’ ने उन्हें इंडस्ट्री में एंट्री दिला दी। शुरुआत में उन्हें छोटे रोल, कॉमिक किरदार और निगेटिव शेड वाले कैरेक्टर मिले, लेकिन 2002 की फिल्म ‘धुम्म’ ने पहली बार लोगों का ध्यान उनकी तरफ खींचा। इसके बाद ‘रंगा एसएसएलसी’, ‘सायनाइड’, ‘राम’, ‘ओलावे मंदारा’ और ‘जयम्मना मागा’ जैसी फिल्मों में उन्होंने ऐसा अभिनय किया कि दर्शकों को महसूस होने लगा कि यह कलाकार किसी भी फ्रेम को अकेले संभाल सकता है। 2007 में आई ‘दुनिया’ उनके करियर का बड़ा टर्निंग पॉइंट बनी और इसी फिल्म के लिए उन्हें कर्नाटक स्टेट अवॉर्ड भी मिला।
रंगायना रघु की सबसे बड़ी ताकत उनकी वर्सेटिलिटी मानी जाती है। वह एक तरफ लोगों को हंसाते हैं, तो दूसरी तरफ गंभीर और इमोशनल किरदारों में भी उतनी ही गहराई दिखाते हैं। ‘फ्रेंच बिरयानी’, ‘बडवा रास्कल’, ‘फैमिली पैक’ और ‘टगरु पल्या’ जैसी फिल्मों में उनकी कॉमिक टाइमिंग ने दर्शकों को खूब एंटरटेन किया, वहीं ‘शाखाहारी’ जैसी फिल्मों में उन्होंने बेहद शांत लेकिन अंदर तक असर छोड़ देने वाला अभिनय किया। यही वजह है कि उनके नाम आज 400 से ज्यादा फिल्मों का रिकॉर्ड दर्ज है और कन्नड़ सिनेमा में उन्हें एक संस्था की तरह देखा जाता है।
अवार्ड्स की बात करें तो रघु का सफर उपलब्धियों से भरा पड़ा है। उन्होंने कई बार फिल्मफेयर साउथ अवॉर्ड जीते, एसआईआईएमए अवॉर्ड्स अपने नाम किए और दो बार कर्नाटक स्टेट फिल्म अवॉर्ड हासिल किया। ‘सायनाइड’ से लेकर ‘टगरु पल्या’ तक और ‘शाखाहारी’ जैसी फिल्मों तक उनका सफर लगातार मजबूत होता गया। खास बात यह है कि इतने साल इंडस्ट्री में बिताने के बाद भी वह खुद को दोहराते नहीं हैं। हर नई फिल्म में उनका नया अंदाज देखने को मिलता है और शायद यही कारण है कि आज भी फैंस उनकी हर रिलीज का बेसब्री से इंतजार करते हैं।

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