अभिनेत्री राधिका आप्टे ने दक्षिण भारतीय फिल्म उद्योग में अभिनेत्रियों के चयन के दौरान गोरे रंग को प्राथमिकता दिए जाने की प्रवृत्ति पर सवाल उठाए हैं। उनका मानना है कि उत्तर भारतीय अभिनेत्रियों को उनके गोरे रंग के कारण दक्षिण भारतीय फिल्मों में अवसर दिए जाते रहे हैं, जबकि दक्षिण भारत में प्रतिभाशाली अभिनेत्रियों की कमी नहीं है। राधिका ने स्थानीय कलाकारों को प्राथमिकता देने की वकालत करते हुए कहा कि वह ऐसी प्रवृत्ति को बढ़ावा नहीं देना चाहतीं।

न्यूज18 को दिए एक साक्षात्कार में राधिका आप्टे ने दक्षिण भारतीय सिनेमा से दूरी बनाने के पीछे की वजहों पर बात की। उन्होंने कहा कि उनके अनुभव के अनुसार, दक्षिण भारतीय फिल्मों में उत्तर भारतीय अभिनेत्रियों को इसलिए चुना जाता था, क्योंकि उनका रंग अधिक गोरा होता है। उन्होंने अपने रंग का जिक्र करते हुए कहा, “मैं गोरी नहीं हूं।” राधिका ने सवाल उठाया कि दक्षिण भारतीय फिल्मों में वहां की अभिनेत्रियों को ही अवसर क्यों नहीं दिए जाते और इसके बजाय उत्तर भारतीय अभिनेत्रियों को क्यों चुना जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय फिल्म उद्योग में विदेशी कलाकारों को प्राथमिकता देने की प्रवृत्ति भी देखने को मिलती है।

राधिका ने दक्षिण भारतीय अभिनेत्रियों की प्रतिभा, खूबसूरती और स्थानीय भाषाओं पर उनकी पकड़ का उल्लेख किया। उनके मुताबिक, दक्षिण भारत की अभिनेत्रियां बेहतरीन कलाकार हैं और उन्हें अपने क्षेत्र की फिल्मों में काम करने के अधिक अवसर मिलने चाहिए। उन्होंने मुंबई से आने वाली उन अभिनेत्रियों को कास्ट करने पर भी सवाल उठाए, जिन्हें संबंधित भाषा का ज्ञान नहीं होता और जिनके संवाद दूसरी कलाकारों से डब कराए जाते हैं। राधिका ने स्पष्ट किया कि वह इस व्यवस्था के पक्ष में नहीं थीं और इसे प्रोत्साहित नहीं करना चाहती थीं।

अभिनेत्री ने दक्षिण भारतीय फिल्मों में काम करने के दौरान भाषा की बाधा को भी एक अहम चुनौती बताया। उन्होंने कहा कि शुरुआत में उन्हें लगता था कि वह किसी भी भाषा में अभिनय कर सकती हैं। इसी सोच के साथ उन्होंने सात अलग-अलग भाषाओं में फिल्में कीं, लेकिन बाद में उन्हें एहसास हुआ कि किसी भाषा को जाने बिना किरदार के साथ पूरा न्याय करना कठिन हो सकता है।

राधिका के अनुसार, अभिनय केवल संवाद याद करने तक सीमित नहीं है। कलाकार को किरदार की परिस्थितियों को समझना, दूसरे कलाकारों के साथ सहज प्रतिक्रिया देना और दृश्य की जरूरत के अनुसार संवादों में बदलाव करने की क्षमता भी रखनी चाहिए। किसी भाषा की जानकारी नहीं होने पर इन पहलुओं को स्वाभाविक रूप से निभाना मुश्किल हो सकता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी विशेष भूमिका के लिए किसी खास अभिनेत्री को चुने जाने का उचित कारण हो, तो वह इसे समझ सकती हैं। हालांकि, भाषा की बाधा उनके लिए दक्षिण भारतीय फिल्मों में काम करने के फैसले को प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण पहलू रही है।

राधिका आप्टे ने दक्षिण भारतीय फिल्म उद्योग में अपने अनुभवों के दूसरे पहलुओं पर भी बात की। उन्होंने पहले तेलुगु फिल्म उद्योग की पुरुष-प्रधान मानसिकता और महिलाओं के चित्रण की आलोचना की थी। इसके बावजूद, उन्होंने दक्षिण भारतीय फिल्मों के सेट पर मिले सहयोग और अपनत्व को भी याद किया। उनके मुताबिक, वहां का माहौल अपेक्षाकृत अनौपचारिक था और कलाकारों तथा अन्य सदस्यों के बीच मित्रवत व्यवहार देखने को मिलता था।

राधिका ने बताया कि सेट पर लोग उनके साथ परिवार के सदस्य की तरह व्यवहार करते थे। वे उन्हें अपनी बहन जैसा मानते थे और उनसे सहजता से बातचीत की जा सकती थी। हालांकि, इस तरह के संबंधों के साथ कभी-कभी व्यक्तिगत एहसान करने की अपेक्षाएं भी जुड़ जाती थीं, जो उनके लिए परेशानी का कारण बन सकती थीं। उन्होंने माना कि इस अनौपचारिक माहौल के सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों पहलू थे।

दक्षिण भारतीय सिनेमा में राधिका आप्टे ने ‘रक्त चरित्र’, ‘वेत्री सेलवन’, ‘कबाली’ और ‘लायन’ जैसी फिल्मों में काम किया है। उनकी आखिरी दक्षिण भारतीय फिल्म ‘चिथिरम पेसुथाडी 2’ वर्ष 2019 में रिलीज हुई थी। यह फिल्म रिलीज होने से छह साल पहले शूट की गई थी।

राधिका अब नेटफ्लिक्स की आगामी सीरीज ‘अक्का’ में नजर आएंगी, जिसमें उनके साथ कीर्ति सुरेश भी हैं। दक्षिण भारतीय फिल्म उद्योग में कास्टिंग, त्वचा के रंग और स्थानीय कलाकारों को अवसर देने को लेकर उनकी टिप्पणियों ने फिल्म जगत में प्रतिनिधित्व और प्रतिभा के आधार पर चयन की बहस को फिर चर्चा में ला दिया है।

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