नई दिल्ली: भारतीय अपराध इतिहास के पन्नों में दर्ज कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं, जो दशकों बाद भी समाज के मानस पटल को झकझोर कर रख देती हैं। अस्सी के दशक में पूरे देश को हिलाकर रख देने वाले दो कुख्यात अपराधियों, रंगा और बिल्ला के संगीन जुर्म और उन्हें मिली मौत की सजा पर पूरे देश की निगाहें टिकी थीं। विरल से aविरलतम मामलों की श्रेणी में आने वाले उस जघन्य अपराध ने देश की न्याय व्यवस्था और सुरक्षा तंत्र के समक्ष कई गंभीर सवाल खड़े किए थे। उसी खौफनाक और वास्तविक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से प्रेरित होकर निर्देशक प्रोसित रॉय डिजिटल प्लेटफॉर्म पर 'राख' नामक एक नई वेब सीरीज लेकर आए हैं। यह खोजी थ्रलर श्रृंखला अमेज़न प्राइम वीडियो पर आधिकारिक तौर पर प्रसारित कर दी गई है, जो दर्शकों को सत्तर के दशक के अपराध जगत और मानवीय क्रूरता के काले पन्नों के सफर पर ले जाती है।

इस वेब सीरीज का ताना-बाना देश की राजधानी दिल्ली की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में बुना गया है। कहानी की शुरुआत एक बेहद सामान्य और सुखी परिवार के बिखरने से होती है, जहां एक शिक्षिका मोना अरोड़ा (सोनाली बेंद्रे) और उनके पति आर्मी अफसर लेफ्टिनेंट कर्नल अशोक अरोड़ा (आमिर बशीर) के दो किशोर बच्चे सुमन और साहिल अचानक लापता हो जाते हैं। दोनों बच्चे ऑल इंडिया रेडियो स्टेशन में एक गीत की प्रस्तुति के लिए घर से निकलते हैं, लेकिन वहां कभी पहुंच नहीं पाते। इस रहस्यमयी और संवेदनशील गुमशुदगी के मामले की जांच की कमान दिल्ली पुलिस के सब-इंस्पेक्टर जयप्रकाश उर्फ जेपी (अली फजल) को सौंपी जाती है। इसके समानांतर, कहानी मुंबई से दिल्ली आए दो क्रूर अपराधियों बाबू (आकाश मखीजा) और राज्जो (रामदेव यादव) के हिंसक रास्तों को उजागर करती है, जिसके बाद पुलिस अनुसंधान और अपराधियों की धरपकड़ का एक लंबा और जटिल सिलसिला शुरू होता है।

कानूनी और प्रक्रियात्मक दृष्टिकोण से यह श्रृंखला केवल एक पारंपरिक चोर-पुलिस की लुकाछिपी नहीं है, बल्कि यह न्याय व्यवस्था की प्रशासनिक पेचीदगियों, अदालती प्रक्रिया की चुनौतियों और पीड़ित परिवारों के कानूनी संघर्ष को भी गहराई से रेखांकित करती है। लेखक अनुषा नंदकुमार और संदीप सकेत ने पटकथा में तत्कालीन पुलिसिया जांच के तौर-तरीकों और अपराधियों के विकृत मनोविज्ञान के कानूनी पहलुओं को बारीकी से पिरोया है। सत्तर और अस्सी के दशक के दौरान उपलब्ध सीमित फोरेंसिक संसाधनों के बीच पुलिस प्रशासन किस प्रकार साक्ष्यों को एकत्रित करता था, इसे बेहद प्रामाणिक ढंग से दर्शाया गया है। खोजी दल के सामने कानून के दायरे में रहकर अपराधियों को सजा दिलाने की संवैधानिक बाध्यता और समाज के बढ़ते दबाव के बीच का संतुलन इस विधिक विमर्श को और अधिक गंभीर बनाता है।

मनोरंजन और कलात्मक धरातल पर कुल आठ कड़ियों की यह श्रृंखला अपनी धीमी लेकिन निरंतर तनावपूर्ण रफ्तार से दर्शकों को बांधे रखने में सफल रही है। अभिनय के मोर्चे पर अली फजल ने एक कर्तव्यनिष्ठ लेकिन व्यवस्था की सीमाओं से जूझते पुलिस अधिकारी के रूप में बेहद सधा हुआ प्रदर्शन किया है। वहीं, लंबे समय बाद पर्दे पर लौटीं सोनाली बेंद्रे ने अपनी संतानों को खो चुकी एक असहाय मां के गहरे मानसिक संताप और प्रशासनिक संघर्ष को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ जीवंत किया है। सहायक कलाकारों में राकेश बेदी और दिब्येंदु भट्टाचार्य ने अपनी भूमिकाओं के साथ पूरा न्याय किया है। कुल मिलाकर, यह सीरीज केवल अपराध के तंत्र का विश्लेषण नहीं करती, बल्कि यह संदेश देती है कि न्याय की प्राप्ति के बाद भी पीड़ित परिवारों के जीवन में आए खालीपन को कभी भरा नहीं जा सकता, जो भारतीय डिजिटल सिनेमा में एक महत्वपूर्ण रचनात्मक योगदान है।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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