जब भी हिंदी सिनेमा के सबसे खतरनाक और स्टाइलिश विलेन की बात होती है, तो सबसे पहले एक नाम गूंजता है — Prem Chopra। आज भी सोशल मीडिया पर उनका आइकॉनिक डायलॉग “प्रेम नाम है मेरा, प्रेम चोपड़ा” मीम्स, रील्स और फिल्मों की चर्चाओं में छाया रहता है। छह दशक से ज्यादा लंबे करियर में 380 से ज्यादा फिल्मों में काम करने वाले प्रेम चोपड़ा ने ऐसा खौफ पैदा किया कि हीरो से ज्यादा लोग उनके एंट्री सीन का इंतजार करते थे। हाल ही में उन्हें मिले लाइफटाइम अचीवमेंट सम्मान और नई पीढ़ी के बीच फिर बढ़ती लोकप्रियता ने उन्हें दोबारा सुर्खियों में ला दिया है।

1935 में लाहौर में जन्मे प्रेम चोपड़ा का बचपन भारत-पाकिस्तान बंटवारे के बाद शिमला में बीता। परिवार चाहता था कि वो डॉक्टर या आईएएस अफसर बनें, लेकिन उनका दिल थिएटर और फिल्मों में बसता था। कॉलेज के दिनों में ड्रामा करते-करते उनके अंदर का कलाकार जाग चुका था। सपनों की तलाश उन्हें मुंबई ले आई, जहां शुरुआती दिनों में उन्होंने काफी स्ट्रगल किया। फिल्मों में मौका पाने के लिए स्टूडियो के चक्कर लगाते रहे और खर्च चलाने के लिए टाइम्स ऑफ इंडिया में नौकरी भी की। इसी दौरान पंजाबी फिल्म ‘चौधरी कर्नैल सिंह’ से उन्हें पहला बड़ा ब्रेक मिला, जिसने उन्हें इंडस्ट्री में पहचान दिलाई।

इसके बाद फिल्मों का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ जिसने उन्हें हिंदी सिनेमा का सबसे यादगार विलेन बना दिया। ‘शहीद’, ‘उपकार’, ‘दो रास्ते’, ‘कटी पतंग’, ‘बॉबी’, ‘दाग’, ‘दो अंजाने’, ‘क्रांति’, ‘दोस्ताना’ और ‘खिलाड़ी’ जैसी फिल्मों में उनके किरदार आज भी याद किए जाते हैं। खासकर Bobby में बोला गया उनका डायलॉग “प्रेम नाम है मेरा, प्रेम चोपड़ा” भारतीय सिनेमा के इतिहास का सबसे आइकॉनिक वन-लाइनर बन गया। उनकी खासियत ये थी कि वो बिना ऊंची आवाज या ओवरएक्टिंग के सिर्फ चेहरे के एक्सप्रेशन और मुस्कान से डर पैदा कर देते थे। यही वजह रही कि 70 और 80 के दशक में निर्माता-निर्देशक उन्हें अपनी फिल्मों का सबसे मजबूत निगेटिव चेहरा मानते थे।

Rajesh Khanna के साथ उनकी जोड़ी भी खूब चर्चा में रही। दोनों ने साथ में लगभग 20 फिल्मों में काम किया और ज्यादातर फिल्में सुपरहिट साबित हुईं। इंडस्ट्री में कहा जाता था कि अगर राजेश खन्ना फिल्म के हीरो हैं और प्रेम चोपड़ा विलेन, तो फिल्म का हिट होना लगभग तय है। दिलचस्प बात ये है कि प्रेम चोपड़ा सिर्फ निगेटिव रोल तक सीमित नहीं रहे। समय के साथ उन्होंने कॉमिक और पॉजिटिव किरदार भी निभाए। ‘धमाल’, ‘दिल्ली-6’, ‘रॉकेट सिंह’, ‘गोलमाल 3’ और हालिया फिल्मों में भी उनकी मौजूदगी ने दर्शकों को पुरानी यादें ताजा कर दीं।

फिल्मों के अलावा उनकी निजी जिंदगी भी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं रही। उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘प्रेम नाम है मेरा, प्रेम चोपड़ा’ के जरिए अपने संघर्ष, रिश्तों और इंडस्ट्री के अनसुने किस्से साझा किए। कपूर परिवार से रिश्तेदारी और बॉलीवुड के बड़े सितारों के साथ उनकी गहरी दोस्ती हमेशा चर्चा में रही। उम्र के इस पड़ाव पर भी उनका अंदाज, आवाज और स्क्रीन प्रेजेंस वैसी ही दमदार है। यही वजह है कि आज की युवा पीढ़ी भी उन्हें सिर्फ एक पुराने जमाने का विलेन नहीं, बल्कि हिंदी सिनेमा का असली स्टाइल आइकन मानती है।

आज जब बॉलीवुड में क्लासिक विलेन की बात होती है, तो प्रेम चोपड़ा का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने साबित किया कि खलनायक सिर्फ बुराई का चेहरा नहीं होता, बल्कि कहानी की जान भी बन सकता है। शायद यही कारण है कि दशकों बाद भी उनका नाम सुनते ही लोगों के चेहरे पर मुस्कान और दिमाग में उनका वही मशहूर डायलॉग गूंज उठता है।

Pratahkal Newsroom

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