जयपुर से न्यूयॉर्क और बराक ओबामा की प्लेलिस्ट तक पहुंचने वाले प्रतीक कुहाड ने अपनी अनूठी गायकी और लेखन से भारतीय स्वतंत्र संगीत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दी है।

गायक प्रतीक कुहाड एक लाइव कॉन्सर्ट के दौरान गिटार बजाते हुए, जिन्होंने अपने स्वतंत्र संगीत और 'cold/mess' जैसे गानों से वैश्विक स्तर पर ख्याति प्राप्त की है।
आजकल अगर आप किसी कैफे की शांत शाम का आनंद ले रहे हों या रात की किसी लॉन्ग ड्राइव पर हों, तो एक बेहद सुकून भरी और रूह को छू लेने वाली आवाज आपका पीछा जरूर करती है। यह जादुई आवाज किसी और की नहीं बल्कि प्रतीक कुहाड़ की है, जिनके गाने 'कसूर' और 'सीओटू' आज सिर्फ संगीत मात्र नहीं रह गए हैं, बल्कि करोड़ों युवाओं की भावनाओं और उनकी अनकही कहानियों का हिस्सा बन चुके हैं। प्रतीक आज भारत के उन चुनिंदा इंडी कलाकारों में से एक हैं जिनकी चर्चा अब केवल गिने-चुने संगीत प्रेमियों के बीच नहीं, बल्कि गली-मोहल्लों से लेकर सात समंदर पार तक हो रही है। हर कोई यह जानना चाहता है कि बिना किसी शोर-शराबे या भारी तामझाम के, अपनी साधारण सी गिटार की धुनों से लोगों को रुला देने वाला और फिर उसी धुन से उनके जख्मों पर मरहम लगा देने वाला यह कलाकार आखिर है कौन।
जयपुर की गलियों से निकलकर ग्लोबल म्यूजिक चार्ट्स के शिखर तक पहुंचने का प्रतीक का यह शानदार सफर रातों-रात तय नहीं हुआ। महज सोलह साल की उम्र में पहली बार गिटार थामने वाले प्रतीक के भीतर संगीत की समझ तो बहुत गहरी थी, लेकिन उन्होंने इसे पेशेवर रूप देने के लिए एक लंबा और चुनौतीपूर्ण रास्ता चुना। अपनी उच्च शिक्षा के लिए न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी पहुंचे प्रतीक वहां क्लासरूम में गणित और अर्थशास्त्र के जटिल समीकरण सुलझाते जरूर थे, लेकिन उनका दिल हमेशा इलियट स्मिथ और बॉब डिलन जैसे संगीत के दिग्गजों की दुनिया में बसा रहता था। न्यूयॉर्क प्रवास के दौरान ही उन्होंने खुद को संगीत की दुनिया में गहराई से तलाशा और लकी अली जैसे भारतीय लेजेंड्स से प्रेरणा लेकर अपनी उस अनूठी सिग्नेचर शैली को जन्म दिया, जो आज पूरी दुनिया में उनकी पहचान बन चुकी है।
भारत वापस आने के बाद प्रतीक ने किसी बड़े स्टूडियो का सहारा लेने के बजाय अपने दम पर इंडी म्यूजिक के अनछुए क्षेत्र में कदम रखा। उनका पहला एल्बम 'इन टोकन्स एंड चार्म्स' संगीत प्रेमियों के बीच धीरे-धीरे अपनी जगह बनाने लगा और जल्द ही उनकी पहचान एक ऐसे कलाकार की बन गई जो चिल्लाकर नहीं, बल्कि अपनी सादगी और शांत धुनों से सीधा दिल के सबसे नाजुक कोने पर चोट करता है। उनके मशहूर गाने 'कोल्ड/मेस' ने तो वैश्विक स्तर पर ऐसा धमाका किया कि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भी इसके मुरीद हो गए और उन्होंने इसे अपनी पसंदीदा गानों की सालाना लिस्ट में शामिल कर लिया। किसी भी भारतीय स्वतंत्र कलाकार के लिए यह एक बहुत बड़ा और गर्व करने वाला मील का पत्थर था, जिसने प्रतीक को अंतरराष्ट्रीय मानचित्र पर एक बड़े सितारे के रूप में स्थापित कर दिया।
प्रतीक के संगीत की सबसे बड़ी यूएसपी उनका एकॉस्टिक गिटार, कम से कम साज-सज्जा और बेहद निजी लगने वाले जादुई बोल हैं। उनके गानों को सुनते वक्त अक्सर ऐसा महसूस होता है जैसे वह आपके ठीक बगल में बैठकर आपकी ही कोई अधूरी प्रेम कहानी या कोई पुरानी याद सुना रहे हों। 'खो गए हम कहां' और 'सांसें' जैसे बॉलीवुड गानों के जरिए उन्होंने मुख्यधारा के सिनेमा में भी अपनी धाक जमाई, लेकिन उनकी रूह आज भी उसी स्वतंत्र कलाकार वाली है। वह हिंदी और अंग्रेजी दोनों ही भाषाओं में इतनी सहजता और ईमानदारी से गाते हैं कि सुनने वाला उनके साथ एक गहरा आत्मिक जुड़ाव महसूस करने लगता है, और शायद यही वजह है कि उनकी फैन फॉलोइंग में कॉलेज जाने वाले युवाओं से लेकर परिपक्व उम्र के लोग भी शामिल हैं।
साल दो हजार बीस में प्रतीक ने एक और बड़ा कीर्तिमान अपने नाम किया जब वह प्रतिष्ठित अमेरिकी लेबल इलेक्ट्रा रिकॉर्ड्स के साथ हाथ मिलाने वाले पहले भारतीय कलाकार बने। यह इस बात का पुख्ता सबूत था कि उनकी कला की सीमाएं भौगोलिक सरहदों को काफी पीछे छोड़ चुकी हैं। 'द वे दैट लवर्स डू' जैसे एल्बम्स ने यह साबित कर दिया कि वह महज एक गायक नहीं बल्कि एक ग्लोबल स्टोरीटेलर हैं। वह प्यार, अकेलेपन और रिश्तों की उलझनों को एक ऐसी काव्यात्मक लय में पिरोते हैं कि सुनने वाला अपनी सारी थकान और तनाव भूलकर उनकी आवाज की गहराई में खो जाता है। प्रतीक कुहाड़ आज महज एक नाम नहीं बल्कि एक ऐसा एहसास बन चुके हैं, जो प्यार में पड़े युवाओं से लेकर ब्रेकअप के गम में डूबे लोगों तक का सबसे बड़ा सहारा है।

