हिंदी सिनेमा में अगर खतरनाक विलेन की बात हो और सबसे पहले किसी चेहरे की याद आए, तो वो चेहरा था Pran का। आज भी सोशल मीडिया पर उनकी पुरानी फिल्मों के डायलॉग, स्टाइल और स्क्रीन प्रेजेंस की क्लिप्स वायरल होती रहती हैं। “बरखुरदार” बोलने का उनका अंदाज़ हो या आंखों से डर पैदा कर देने वाली एक्टिंग, प्राण ने बॉलीवुड में विलेन की ऐसी परिभाषा लिखी जिसे आज तक कोई मिटा नहीं पाया। यही वजह है कि दशकों बाद भी उनका नाम सुनते ही लोगों को फिल्मों का असली खलनायक याद आ जाता है।

12 फरवरी 1920 को लाहौर में जन्मे प्राण कृष्ण सिकंद ने कभी नहीं सोचा था कि वो भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े सितारों में शामिल होंगे। शुरुआत में उनका सपना फोटोग्राफर बनने का था, लेकिन किस्मत उन्हें फिल्मों तक खींच लाई। पंजाबी फिल्म ‘यमला जट’ से शुरू हुआ उनका सफर जल्दी ही हिंदी सिनेमा तक पहुंच गया। ‘खानदान’ में उन्होंने हीरो का रोल निभाया, लेकिन असली पहचान उन्हें निगेटिव किरदारों से मिली। बंटवारे के बाद जब वो मुंबई आए तो स्ट्रगल का दौर भी देखा, होटल में नौकरी तक की, लेकिन ‘जिद्दी’ फिल्म ने उनकी जिंदगी बदल दी। इसके बाद वो लगातार ऐसी फिल्मों में नजर आए जहां उनका खौफ ही कहानी की जान बन गया।

पचास और साठ के दशक में प्राण का नाम विलेन का पर्याय बन चुका था। Dilip Kumar, Dev Anand और Raj Kapoor जैसे सुपरस्टार्स की फिल्मों में उनका होना लगभग तय माना जाता था। ‘मधुमती’, ‘जिस देश में गंगा बहती है’, ‘देवदास’, ‘राम और श्याम’ और ‘आदमी’ जैसी फिल्मों में उन्होंने ऐसा निगेटिव असर छोड़ा कि दर्शक सचमुच उनसे नफरत करने लगे। कहा जाता है कि उस दौर में लोग अपने बच्चों का नाम “प्राण” रखने से बचते थे क्योंकि पर्दे पर उनका डर इतना असली लगता था। सिगरेट के धुएं से रिंग बनाना, अलग-अलग गेटअप और भारी आवाज़ उनकी पहचान बन गई थी।

लेकिन प्राण सिर्फ विलेन नहीं थे, वो एक शानदार कैरेक्टर आर्टिस्ट भी थे। ‘उपकार’ में मलंग चाचा बनकर उन्होंने लोगों की सोच ही बदल दी। इस किरदार ने साबित कर दिया कि वही इंसान जो पर्दे पर सबसे खतरनाक लगता है, वो दिल छू लेने वाला रोल भी कर सकता है। ‘जंजीर’ में शेर खान का किरदार आज भी बॉलीवुड के सबसे आइकॉनिक रोल्स में गिना जाता है। दिलचस्प बात ये है कि Amitabh Bachchan को ‘जंजीर’ दिलाने में भी प्राण का बड़ा हाथ था। ‘अमर अकबर एंथनी’, ‘डॉन’, ‘शराबी’, ‘विक्टोरिया नंबर 203’ और ‘जॉनी मेरा नाम’ जैसी फिल्मों में उन्होंने हर बार अपनी मौजूदगी से कहानी को ऊंचा कर दिया।

करीब छह दशक लंबे करियर में प्राण ने 350 से ज्यादा फिल्मों में काम किया और उस दौर में कई हीरोज से ज्यादा फीस लेने वाले कलाकारों में शामिल रहे। उन्हें तीन बार फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला, “विलेन ऑफ द मिलेनियम” का खिताब मिला, पद्म भूषण से सम्मानित किया गया और आखिरकार भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े सम्मान दादासाहेब फाल्के अवॉर्ड से भी नवाजा गया। उनकी एक्टिंग इतनी दमदार थी कि लोग सिर्फ उन्हें देखने थिएटर पहुंच जाते थे। यही वजह है कि आज भी उन्हें बॉलीवुड का सबसे बड़ा और सबसे असरदार विलेन माना जाता है।

12 जुलाई 2013 को मुंबई में प्राण ने दुनिया को अलविदा कहा, लेकिन उनकी विरासत आज भी जिंदा है। नई पीढ़ी जब पुराने सिनेमा की बात करती है तो प्राण का नाम अपने आप सामने आ जाता है। उन्होंने सिर्फ किरदार नहीं निभाए, बल्कि हिंदी सिनेमा में खलनायकी को एक नई पहचान दी। शायद यही कारण है कि आज भी जब स्क्रीन पर असली विलेन की चर्चा होती है, तो सबसे पहले याद आते हैं सिर्फ और सिर्फ प्राण साहब।

Pratahkal Newsroom

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