मुदस्सर अजीज के निर्देशन में बनी इस फिल्म में आयुष्मान खुराना और वामिका गब्बी का अभिनय मजबूत है, लेकिन संगीत और कहानी का लेखन कमजोर साबित होता है।

फिल्म 'पति पत्नी और वो 2' के आधिकारिक पोस्टर में (बाएं से दाएं) सारा अली खान, वामिका गब्बी और भूमिका चावला के साथ नीचे आयुष्मान खुराना नजर आ रहे हैं, जो वर्ष 2026 में बड़े पर्दे पर रिलीज हो चुकी है।
मुंबई: वर्ष 2019 की हिट कॉमेडी फिल्म 'पति पत्नी और वो' की अगली कड़ी 'पति पत्नी और वो 2' बड़े पर्दे पर दस्तक दे चुकी है, जो दर्शकों के लिए आयुष्मान खुराना, वामिका गब्बी और सारा अली खान की मौजूदगी से सजी एक बिल्कुल नई और अराजक त्रिकोणीय प्रेम कहानी लेकर आई है। निर्देशक मुदस्सर अजीज के निर्देशन में बनी यह फिल्म छोटे शहर के हास्य और पूरी तरह से भ्रम पर आधारित 'कॉमेडी ऑफ एरर्स' के ताने-बाने को मिलाकर विवाहेतर संबंधों वाले पारंपरिक कॉमेडी फॉर्मूले को आधुनिक बनाने का प्रयास करती है। फिल्म के प्रदर्शन और उसकी कहानी की बुनावट में कई ऐसी चीजें हैं जो इसके पक्ष में मजबूती से खड़ी होती हैं, तो वहीं कुछ ऐसे पहलू भी हैं जहां यह काफी कमजोर साबित होती है।
समीक्षा: फिल्म की पांच बड़ी खूबियां और मजबूत पहलू
इस फिल्म का सबसे मजबूत स्तंभ अभिनेता आयुष्मान खुराना की कॉमिक टाइमिंग है। अपनी आम आदमी वाली जड़ों की ओर लौटते हुए आयुष्मान यहां अपने सर्वश्रेष्ठ फॉर्म में नजर आ रहे हैं और उन्होंने हाल के वर्षों में अपना सबसे मनोरंजक प्रदर्शन दिया है। प्रजापति पांडे के रूप में उनके चरित्र का असमंजस, जो लगातार झूठ, अपराधबोध और घबराहट के बीच फंसा रहता है, फिल्म के सबसे बेहतरीन दृश्यों को ऊर्जा प्रदान करता है। अभिनेता द्वारा घबराहट भरी संवेदनशीलता से अत्यधिक हताशा के बीच जिस तरह से बदलाव किया गया है, वह हास्य को लगातार जीवंत बनाए रखता है।
इसके साथ ही, वामिका गब्बी इस फिल्म में पूरी महफिल लूटती हुई नजर आ रही हैं। उन्होंने अपर्णा के किरदार में एक ताजी और उग्र ऊर्जा का संचार किया है, जिससे 'पत्नी' का यह चरित्र पुरुष भ्रम के इर्द-गिर्द केंद्रित रहने वाली इस फ्रेंचाइजी में उम्मीद से कहीं अधिक गहरा और बहुआयामी बन गया है। आयुष्मान खुराना के साथ उनकी ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री बेहद स्वाभाविक और यथार्थवादी लगती है।
फिल्म को दमदार सहयोगी कलाकारों का भी भरपूर साथ मिला है। विजय राज और तिग्मांशु धूलिया जैसे दिग्गज अभिनेताओं ने अपने सिग्नेचर डेडपैन यानी बिना किसी भाव के किए जाने वाले हास्य का एक बेहतरीन उदाहरण पेश किया है। कई दृश्यों में तो उनके उप-कथानक और प्रतिक्रियाएं मुख्य त्रिकोणीय प्रेम कहानी के हंगामे से भी ज्यादा बड़े ठहाके पैदा करती हैं। इन सहयोगी कलाकारों का यह समूह फिल्म को एक समृद्ध कॉमिक बनावट देता है, जो दर्शकों को बॉलीवुड की क्लासिक समूह कॉमेडी फिल्मों की याद दिलाता है।
फिल्म की एक और सबसे बड़ी ताकत इसका जीवंत प्रयागराज का परिवेश है। निर्देशक मुदस्सर अजीज छोटे शहर की बारीकियों, वहां की बोली, स्थानीय संदर्भों और वहां के अराजक माहौल को कैमरे में कैद करने में पूरी तरह महारत दिखाते हैं। फिल्म की दुनिया पूरी तरह से जीवंत और वास्तविक महसूस होती है, जिससे यह साफ होता है कि निर्देशक उत्तर भारतीय छोटे शहरों की लय को बेहद बारीकी से समझते हैं।
पहली फिल्म के नियंत्रित चरमोत्कर्ष के विपरीत, 'पति पत्नी और वो 2' में एक बेहद उन्मत्त और बेलगाम 'कॉमेडी-ऑफ-एरर्स' आधारित चरमोत्कर्ष (क्लाइमेक्स) पेश किया गया है, जहां फिल्म के सभी किरदार एक ही स्थान पर एकत्रित हो जाते हैं। जो दर्शक पुरानी प्रियदर्शन शैली की पागलपन से भरपूर कॉमेडी और पुराने जमाने के बॉलीवुड प्रहसनों को पसंद करते हैं, उनके लिए यह चरमोत्कर्ष सिनेमाघरों में भरपूर मनोरंजन और दर्शकों को झूमने पर मजबूर करने वाला अनुभव प्रदान करता है।
समीक्षा: फिल्म की पांच बड़ी कमियां और कमजोर कड़ियां
इन तमाम सकारात्मक पहलुओं के बावजूद, फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी बिखरी हुई पटकथा है। दो घंटे से भी कम समय की इस फिल्म की कहानी कई जगहों पर अपनी ही गलतफहमियों के बोझ तले दबकर बेहद उलझ जाती है। फिल्म में हास्य और अराजकता को जबरन बनाए रखने के लिए कई परिस्थितियों को अनावश्यक रूप से खींचा और थोपा गया है, जिसके कारण दूसरे भाग के कुछ हिस्से स्वाभाविक लगने के बजाय कृत्रिम और बनावटी महसूस होने लगते हैं।
इस फ्रेंचाइजी को आमतौर पर इसके बेहद लोकप्रिय गानों और चार्टबस्टर्स के लिए याद किया जाता है, लेकिन इसके विपरीत इस बार फिल्म का संगीत आश्चर्यजनक रूप से बेहद औसत और विस्मृत करने वाला है। 'अंगड़ाई' और 'दिल वाले चोर' जैसे गाने दर्शकों पर कोई स्थायी प्रभाव छोड़ने में पूरी तरह विफल रहते हैं। ये गाने फिल्म की गति में केवल एक फिलर की तरह लगते हैं और इनमें वह वायरल अपील या दोबारा सुनने की क्षमता बिल्कुल नहीं है, जो 2019 की फिल्म के संगीत में देखी गई थी।
चरित्र चित्रण की बात करें तो सारा अली खान ने चंचल की भूमिका में भरपूर उत्साह और ग्लैमर का तड़का जरूर लगाया है, लेकिन फिल्म का लेखन उनके किरदार को कभी भी पारंपरिक 'वो' के दायरे से बाहर निकालकर पूरी तरह विकसित नहीं कर पाता है। चंचल के भावनात्मक उद्देश्य बेहद सतही स्तर के ही रह जाते हैं, जिसके चलते दर्शकों के लिए कहानी के केंद्र में मौजूद इस त्रिकोणीय प्रेम संघर्ष के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ पाना काफी कठिन हो जाता है।
इसके अलावा, फिल्म में फॉरेस्ट रेंजर्स और भेड़ियों के शिकार ('वुल्फ-हंटिंग') के एंगल से जुड़ा एक बेहद अजीबोगरीब उप-कथानक शामिल किया गया है, जो पूरी फिल्म के मिजाज और टोन से पूरी तरह से अलग और बेमेल दिखाई देता है। यह ट्रैक कहानी की मुख्य गति में बाधा डालता है, दर्शकों का ध्यान भटकाता है और फिल्म की मूल घरेलू कॉमेडी के प्रवाह को पूरी तरह से बाधित कर देता है।
अंत में, जहां अधिकांश सहयोगी कलाकार हास्य का एक सही संतुलन बनाने में सफल रहे हैं, वहीं आयशा रज़ा द्वारा निभाया गया 'बुआ जी' का किरदार बेहद लाउड और अतिशयोक्तिपूर्ण हो गया है। विशेष रूप से फिल्म के पहले भाग में उनका यह प्रदर्शन एक सीमा के बाद दर्शकों के कानों को चुभने और काफी परेशान करने वाला लगने लगता है, जो फिल्म के समग्र प्रभाव को कमजोर करता है।

