‘करमचंद’ से ‘मकबूल’ तक… 72वें जन्मदिन से पहले जानिए पंकज कपूर क्यों कहलाते हैं एक्टिंग के असली मास्टर?
भारतीय अभिनेता पंकज कपूर 29 मई 2026 को अपना 72वां जन्मदिन मनाने जा रहे हैं। लुधियाना से लेकर राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार तक का उनका सफर थिएटर, टीवी और फिल्मों में उत्कृष्ट अभिनय का उदाहरण है। ‘करमचंद’, ‘राख’, ‘मकबूल’ जैसी कृतियों ने उन्हें अमर पहचान दी।

अभिनेता पंकज कपूर
भारतीय फिल्म, टेलीविजन और थिएटर जगत के वरिष्ठ और बहुआयामी अभिनेता पंकज कपूर 29 मई 2026 को अपने 72वें जन्मदिन की ओर अग्रसर हैं। 29 मई 1954 को पंजाब के लुधियाना स्थित एक हिंदू परिवार में जन्मे पंकज कपूर ने अभिनय की दुनिया में अपनी प्रतिभा, गंभीरता और असाधारण चरित्र-चित्रण क्षमता के बल पर एक विशिष्ट पहचान स्थापित की है। उनकी यात्रा केवल सिनेमा तक सीमित नहीं रही, बल्कि थिएटर, टेलीविजन और साहित्य तक फैली एक सशक्त सांस्कृतिक विरासत के रूप में देखी जाती है।
पंकज कपूर ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा पंजाब में प्राप्त की और बचपन से ही थिएटर और अभिनय के प्रति गहरी रुचि विकसित की। इसी जुनून ने उन्हें प्रतिष्ठित राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) तक पहुंचाया, जहां उन्होंने अभिनय की औपचारिक शिक्षा प्राप्त की। एनएसडी से स्नातक होने के बाद उन्होंने लगभग चार वर्षों तक थिएटर में सक्रिय रूप से कार्य किया और कई नाटकों का निर्देशन भी किया, जिनमें ‘मोहंदास बी.ए.एल.एल.बी.’, ‘वाह भाई वाह’, ‘साहबजी बीवीजी गुलामजी’, ‘दृष्टांत’, ‘कनक दी बल्लि’, ‘अल्बर्ट्स ब्रिज’ और ‘पंचवा सवार’ जैसे चर्चित मंचीय और टीवी प्रोडक्शंस शामिल रहे।
अभिनेता पंकज कपूर का पारिवारिक जीवन
थिएटर के बाद पंकज कपूर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली जब उन्हें रिचर्ड एटनबरो की बहुचर्चित फिल्म ‘गांधी’ में भूमिका मिली, जिसमें उन्होंने महात्मा गांधी के दूसरे सचिव प्यारेलाल नायर की भूमिका निभाई। इसी दौरान उन्होंने फिल्म ‘गांधी’ के हिंदी संस्करण में भी डबिंग की।
सिनेमा में उनका औपचारिक पदार्पण श्याम बेनेगल की फिल्म ‘अरोहन’ (1982) से हुआ। इसके बाद उन्होंने समानांतर सिनेमा के कई महत्वपूर्ण निर्देशकों के साथ काम किया और भारतीय कला सिनेमा को नई दिशा देने में योगदान दिया। उनकी प्रमुख फिल्मों में ‘मंडी’ (1983), ‘जाने भी दो यारों’ (1983), ‘मोहन जोशी हाजिर हो!’ (1984), ‘खंडहर’ (1984) और ‘खामोश’ (1985) शामिल हैं। इन फिल्मों में उनके अभिनय ने उन्हें गंभीर और संवेदनशील अभिनेता के रूप में स्थापित किया। इन अनेक फिल्मों ने राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी प्राप्त किए।
1986 में उन्होंने टेलीविजन की दुनिया में कदम रखा और लोकप्रिय धारावाहिक ‘करमचंद’ में जासूस करमचंद की भूमिका निभाकर घर-घर में लोकप्रियता हासिल की। इस दौरान उन्होंने ‘कब तक पुकारूं’, ‘जाबान संभाल के’ (अंग्रेजी सीरीज़ Mind Your Language का रीमेक), ‘लाइफलाइन’ (विजया मेहता के साथ), ‘नीम का पेड़’ और ‘फिलिप्स टॉप 10’ जैसे कार्यक्रमों में भी अभिनय किया।
इसी बीच उन्होंने फिल्मों में अपनी मजबूत उपस्थिति बनाए रखी और ‘चमेली की शादी’ (1986), ‘एक रुका हुआ फैसला’ (1986), ‘ये वो मंज़िल तो नहीं’ (1987) और ‘जलवा’ (1987) जैसी फिल्मों में अभिनय किया। 1989 में फिल्म ‘राख’ में उनके सशक्त अभिनय के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त हुआ, जिसमें उनके साथ आमिर खान भी थे। इसी वर्ष उन्होंने पंजाबी फिल्म ‘मढ़ी दा दीवा’ में भी काम किया।
1991 में ‘एक डॉक्टर की मौत’ में एक संघर्षरत वैज्ञानिक की भूमिका के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार – विशेष जूरी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह भूमिका उनके करियर की सबसे प्रभावशाली प्रस्तुतियों में से एक मानी जाती है। 1992 में उन्होंने मणिरत्नम की फिल्म ‘रोज़ा’ में भी अभिनय किया, जो बाद में कई भाषाओं में डब होकर व्यापक रूप से लोकप्रिय हुई। 2000 में उन्होंने टेलीविजन पर वापसी की और व्यंग्यात्मक धारावाहिक ‘ऑफिस ऑफिस’ में भ्रष्टाचार पर आधारित हास्य प्रस्तुति के जरिए दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया।
2003 में उन्होंने विशाल भारद्वाज की फिल्म ‘मकबूल’ में अब्बा जी की भूमिका निभाई, जो शेक्सपियर के नाटक ‘मैकबेथ’ के किंग डंकन पर आधारित थी। इस भूमिका के लिए उन्हें 2004 में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार – सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता से सम्मानित किया गया। इसके बाद उन्होंने ‘द ब्लू अम्ब्रेला’ (2005), ‘दस’ (2005) और ‘हल्ला बोल’ (2008) जैसी फिल्मों में भी काम किया।
2006 में उन्होंने टेलीविजन धारावाहिक ‘नया ऑफिस ऑफिस’ के साथ एक बार फिर टीवी पर उपस्थिति दर्ज कराई। वर्ष 2013 में विशाल भारद्वाज की फिल्म ‘मटरू की बिजली का मंडोला’ में भी वे नजर आए। नवंबर 2019 में उन्होंने साहित्य के क्षेत्र में भी कदम रखा और अपनी लिखी हुई 1992 की नवेला ‘दोपहरी’ को प्रकाशित किया, जिससे उनकी रचनात्मकता का एक नया आयाम सामने आया।
निजी जीवन की बात करें तो पंकज कपूर ने 1979 में अभिनेत्री और नृत्यांगना नीलीमा अज़ीम से विवाह किया। उस समय वे नई दिल्ली में रहते थे और 1981 में उनके पुत्र शाहिद कपूर का जन्म हुआ। 1984 में उनका तलाक हो गया। इसके बाद 1988 में उन्होंने अभिनेत्री सुप्रिया पाठक से विवाह किया। इस दंपति के दो बच्चे हैं, पुत्री सना कपूर और पुत्र रुहान कपूर। 2 मार्च 2022 को सना कपूर का विवाह मयंक पहवा से हुआ, जबकि सितंबर 2023 में रुहान कपूर का विवाह मनुक्रिति पहवा से हुआ। इनका संबंध अभिनेता मनोज पहवा और अभिनेत्री सीमा भार्गव पहवा के परिवार से भी जुड़ता है।
पंकज कपूर के परिवार का फिल्मी जगत से गहरा संबंध रहा है। उनकी पहली पत्नी नीलीमा अज़ीम के साथ वैवाहिक संबंध 1984 में समाप्त हुए, जिसका मुख्य कारण भौगोलिक दूरी, करियर की व्यस्तता और व्यक्तिगत मतभेद बताए जाते हैं। उस समय दोनों बहुत कम उम्र के थे और जीवन के अलग-अलग चरणों में आगे बढ़ रहे थे। बाद में दोनों ने आपसी सहमति से अलग होने का निर्णय लिया और अपने-अपने जीवन में आगे बढ़े।
पंकज कपूर ने बाद में सुप्रिया पाठक के साथ स्थिर पारिवारिक जीवन स्थापित किया, जबकि नीलीमा अज़ीम ने अपने पुत्र शाहिद कपूर का पालन-पोषण करते हुए अपना करियर जारी रखा। थिएटर से लेकर फिल्म, टेलीविजन और साहित्य तक फैली पंकज कपूर की यह बहुआयामी यात्रा भारतीय अभिनय जगत के लिए एक अमूल्य धरोहर मानी जाती है। उनका योगदान न केवल मनोरंजन उद्योग में बल्कि अभिनय की गहराई और शिल्प के मानकों को ऊंचा उठाने में भी अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है।

Manyaa Chaudhary
यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।
