मुंबई से आई एक अत्यंत दुखद खबर ने पूरे हिंदी फिल्म जगत को शोक में डुबो दिया है। वरिष्ठ फिल्म निर्माता और केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) के पूर्व अध्यक्ष पहलाज निहलानी का 4 जून 2026 को मुंबई में निधन हो गया। वे 76 वर्ष के थे। उनके निधन के साथ ही भारतीय सिनेमा ने एक ऐसे व्यक्तित्व को खो दिया है, जिसने दशकों तक मुख्यधारा के बॉलीवुड को अपनी फिल्मों और निर्णयों से गहराई से प्रभावित किया।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, पहलाज निहलानी पिछले कई महीनों से गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे थे। वे लीवर सिरोसिस सहित लंबे समय से लीवर संबंधी बीमारी से पीड़ित थे। लगभग चार महीनों से उनका उपचार मुंबई के नानावटी अस्पताल में चल रहा था। बताया जाता है कि अंतिम दिनों में उनकी हालत लगातार बिगड़ती गई, जिसके चलते उन्हें एक से अधिक अस्पतालों में स्थानांतरित भी किया गया। तमाम चिकित्सकीय प्रयासों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। उनका अंतिम संस्कार मुंबई के सांताक्रूज श्मशान घाट पर लगभग दोपहर 3 बजे संपन्न हुआ। इस दौरान फिल्म उद्योग से कई प्रमुख हस्तियां उन्हें अंतिम विदाई देने पहुंचीं। सैफ अली खान, वरुण धवन, शत्रुघ्न सिन्हा, फरहान अख्तर और गोविंदा सहित कई कलाकारों ने उपस्थित होकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।

पहलाज निहलानी हिंदी सिनेमा के उन चुनिंदा निर्माताओं में शामिल रहे, जिन्होंने 1980 और 1990 के दशक में मुख्यधारा की व्यावसायिक फिल्मों को नई पहचान दी। उन्होंने विशेष रूप से गोविंदा के साथ कई सफल फिल्मों का निर्माण किया, जिनमें ‘इल्ज़ाम’ शामिल है, जो गोविंदा की डेब्यू फिल्म भी मानी जाती है। इसके अतिरिक्त उन्होंने ‘शोला और शबनम’, ‘आंखें’, ‘आग ही आग’ और ‘अंदाज़’ जैसी लोकप्रिय फिल्मों का निर्माण किया। उन्हें अभिनेता गोविंदा के शुरुआती करियर को स्थापित करने तथा चंकी पांडे जैसे कलाकारों को मंच प्रदान करने का श्रेय भी दिया जाता है। उनकी फिल्मों की पहचान पारिवारिक और व्यावसायिक मनोरंजन के मेल के रूप में रही, जिसने उस दौर के दर्शकों के बीच खास लोकप्रियता हासिल की।

वर्ष 2015 से 2017 के बीच पहलाज निहलानी केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के अध्यक्ष रहे। उनका कार्यकाल भारतीय सिनेमा में अत्यंत चर्चित और विवादास्पद माना जाता है। इस दौरान उनकी सख्त सेंसर नीति को लेकर देशभर में व्यापक बहस छिड़ गई थी। कई फिल्मों में कटौती के उनके निर्णयों ने फिल्मकारों और रचनात्मक स्वतंत्रता के पक्षधर वर्ग के बीच तीखी चर्चा को जन्म दिया। विशेष रूप से ‘उड़ता पंजाब’ और ‘लिपस्टिक अंडर माई बुर्का’ जैसी फिल्मों को लेकर उनके रुख पर गंभीर सवाल उठे और इसे लेकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम नैतिक सेंसरशिप पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस तेज हो गई। हालांकि, उन्होंने अपने निर्णयों को सांस्कृतिक मूल्यों और सामाजिक संवेदनशीलता की रक्षा के रूप में उचित ठहराया।

फिल्म उद्योग में पहलाज निहलानी एक मुखर और स्पष्ट विचारों वाले व्यक्तित्व के रूप में जाने जाते थे। वे पारंपरिक व्यावसायिक बॉलीवुड सिनेमा के समर्थक थे और अक्सर आधुनिक फिल्मी संस्कृति, स्टार सिस्टम तथा उद्योग में बदलते व्यवहार को लेकर अपनी राय खुलकर व्यक्त करते थे। वे फिल्म इंडस्ट्री में अनुशासन की कमी, नाइटलाइफ कल्चर और नशे के प्रभाव जैसे विषयों पर भी अपनी स्पष्ट राय रखते थे। उनका जन्म 1950 में एक सिंधी परिवार में हुआ था। व्यक्तिगत जीवन में वे अपनी पत्नी नीता निहलानी के साथ लगभग 45 वर्षों से अधिक समय तक वैवाहिक जीवन में रहे। वे अपने पीछे परिवार और सिनेमा जगत में व्यापक संबंधों की विरासत छोड़ गए हैं।

अपने अंतिम दिनों में गंभीर लीवर रोग से जूझते हुए उनका स्वास्थ्य लगातार गिरता गया। लंबे उपचार और चिकित्सकीय प्रयासों के बावजूद 76 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। पहलाज निहलानी का जाना हिंदी सिनेमा के उस युग के अंत के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें व्यावसायिक फिल्म निर्माण, स्टार सिस्टम और सेंसरशिप पर गहन बहसें समानांतर रूप से चलती थीं। उनका योगदान और उनके विवाद दोनों ही भारतीय फिल्म इतिहास में लंबे समय तक चर्चा का विषय बने रहेंगे।

Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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