आज अगर तमिल सिनेमा में किसी डायरेक्टर का नाम सबसे अलग और दमदार अंदाज़ में लिया जाता है, तो वो हैं Pa. Ranjith। सोशल मीडिया से लेकर फिल्म फेस्टिवल तक हर जगह उनकी चर्चा हो रही है, क्योंकि वो सिर्फ फिल्में नहीं बनाते, बल्कि समाज की उन कहानियों को पर्दे पर लाते हैं जिन्हें लंबे समय तक नजरअंदाज किया गया। उनकी फिल्मों में नॉर्थ चेन्नई की गलियां, आम लोगों की जिंदगी, राजनीति, संघर्ष और पहचान इतनी रियल लगती है कि दर्शक खुद को कहानी का हिस्सा महसूस करने लगते हैं। यही वजह है कि आज पा. रंजीत को सिर्फ डायरेक्टर नहीं, बल्कि सिनेमा में बदलाव की आवाज माना जाता है।

चेन्नई के करलापक्कम में जन्मे रंजीत का सफर बिल्कुल आसान नहीं था। गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ फाइन आर्ट्स में पढ़ाई के दौरान उन्होंने दुनिया भर की फिल्में देखीं और वहीं से उनके अंदर अलग तरह का सिनेमा बनाने का जुनून पैदा हुआ। ‘द बैटल ऑफ अल्जीयर्स’ और ‘सिटी ऑफ गॉड’ जैसी फिल्मों ने उनकी सोच बदल दी। शुरुआत में उन्होंने असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर काम किया, लेकिन असली पहचान मिली साल 2012 में आई फिल्म ‘अट्टाकाठी’ से। बेहद छोटे बजट में बनी इस फिल्म ने युवाओं और रोमांस को इतने फ्रेश अंदाज़ में दिखाया कि लोग रंजीत की कहानी कहने की कला के फैन हो गए।

इसके बाद आई ‘मद्रास’ ने तो जैसे तमिल सिनेमा का पूरा टोन बदल दिया। कार्थी स्टारर इस फिल्म में नॉर्थ चेन्नई की राजनीति और वहां के लोगों की जिंदगी को जिस ईमानदारी से दिखाया गया, उसने क्रिटिक्स और ऑडियंस दोनों को हैरान कर दिया। इसके बाद रंजीत को मिला सुपरस्टार Rajinikanth के साथ काम करने का मौका। ‘कबाली’ और ‘काला’ जैसी फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर तहलका मचा दिया। ‘काला’ तो इतनी बड़ी फिल्म साबित हुई कि उसे ब्रिटिश फिल्म इंस्टीट्यूट की 21वीं सदी की 25 महान फिल्मों की लिस्ट में जगह मिली। खास बात ये रही कि रंजीत ने सुपरस्टार वाली फिल्मों में भी अपनी सामाजिक सोच और जमीनी मुद्दों को कभी गायब नहीं होने दिया।

पा. रंजीत का नाम सिर्फ निर्देशन तक सीमित नहीं है। उन्होंने ‘नीलम प्रोडक्शंस’ के जरिए ऐसे कलाकारों और कहानियों को मौका दिया जिन्हें मेनस्ट्रीम सिनेमा में जगह नहीं मिलती थी। Pariyerum Perumal जैसी फिल्मों ने समाज में जाति और भेदभाव जैसे मुद्दों पर खुलकर बात की और लोगों को सोचने पर मजबूर किया। वहीं ‘सारपट्टा परंबरई’ ने बॉक्सिंग, राजनीति और नॉर्थ चेन्नई की संस्कृति को इतने दमदार तरीके से पेश किया कि फिल्म आज भी कल्ट मानी जाती है। आर्या की ट्रांसफॉर्मेशन और फिल्म की रियलिस्टिक दुनिया ने इसे ओटीटी पर ब्लॉकबस्टर बना दिया।

रंजीत का असर फिल्मों से बाहर भी दिखाई देता है। उनका ‘नीलम कल्चरल सेंटर’ कला और सामाजिक मुद्दों को जोड़ने का काम करता है। उन्होंने ‘द कास्टलेस कलेक्टिव’ नाम का म्यूजिक बैंड भी बनाया, जिसने म्यूजिक और रैप के जरिए समाज में बराबरी की बात को नई आवाज दी। उनका ‘वानम आर्ट फेस्टिवल’ तमिलनाडु के कलाकारों के लिए बड़ा मंच बन चुका है। यही वजह है कि आज युवा फिल्ममेकर्स उन्हें सिर्फ डायरेक्टर नहीं, बल्कि एक मूवमेंट मानते हैं।

हाल के वर्षों में ‘नட்சத்திரम नगरगिरधु’, ‘थंगालान’ और आने वाले प्रोजेक्ट ‘वेट्टुवम’ को लेकर भी जबरदस्त चर्चा रही है। उनकी हर नई फिल्म रिलीज से पहले ही बहस का विषय बन जाती है, क्योंकि लोग जानते हैं कि पा. रंजीत सिर्फ एंटरटेनमेंट नहीं, बल्कि सोच बदलने वाला सिनेमा लेकर आते हैं। यही कारण है कि आज उनका नाम भारतीय सिनेमा के सबसे बेबाक और प्रभावशाली फिल्ममेकर्स में शामिल किया जाता है।

Pratahkal Newsroom

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