जब भी हिंदी सिनेमा की सबसे महान अभिनेत्रियों का नाम लिया जाता है, तो नरगिस का जिक्र अपने आप हो जाता है। आज भी सोशल मीडिया से लेकर फिल्मी चर्चाओं तक लोग उनकी फिल्मों, उनकी खूबसूरती, उनकी दमदार एक्टिंग और उनकी दर्दभरी जिंदगी को याद करते हैं। “मदर इंडिया” से लेकर “आवारा” तक नरगिस ने सिर्फ किरदार नहीं निभाए, बल्कि भारतीय सिनेमा में महिलाओं की एक नई पहचान बनाई। यही वजह है कि दशकों बाद भी उनका नाम एक लेजेंड की तरह लिया जाता है और नई पीढ़ी भी जानना चाहती है कि आखिर नरगिस थीं कौन।

1 जून 1929 को कोलकाता में फातिमा राशिद के नाम से जन्मीं नरगिस का फिल्मी सफर बेहद कम उम्र में शुरू हो गया था। सिर्फ छह साल की उम्र में उन्होंने “तलाश-ए-हक” में काम किया और फिर “तकदीर” ने उन्हें पहचान दिलाई। लेकिन असली स्टारडम मिला 1949 में रिलीज हुई “अंदाज़” और “बरसात” से। राज कपूर के साथ उनकी जोड़ी उस दौर की सबसे चर्चित जोड़ी बन गई। “आग”, “आवारा”, “श्री 420” और “चोरी चोरी” जैसी फिल्मों में दोनों की केमिस्ट्री ने पर्दे पर ऐसा जादू चलाया कि लोग दीवाने हो गए। “आवारा” सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी सुपरहिट हुई और नरगिस इंटरनेशनल स्टार बन गईं।

नरगिस की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि उन्होंने उस दौर में भी मजबूत और आत्मनिर्भर महिलाओं के किरदार निभाए, जब फिल्मों में हीरोइनें अक्सर सिर्फ ग्लैमर तक सीमित रहती थीं। “आवारा” में वकील का रोल हो या “श्री 420” की सादगी, उन्होंने हर किरदार में जान डाल दी। फिर आया 1957, जब “मदर इंडिया” रिलीज हुई और नरगिस इतिहास बन गईं। फिल्म ने ऑस्कर तक का सफर तय किया और नरगिस को फिल्मफेयर बेस्ट एक्ट्रेस अवॉर्ड मिला। इस फिल्म में उन्होंने एक ऐसी भारतीय मां का किरदार निभाया जिसे आज भी हिंदी सिनेमा का सबसे आइकॉनिक रोल माना जाता है। उनकी एक्टिंग इतनी दमदार थी कि उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सम्मान मिला।

“मदर इंडिया” की शूटिंग के दौरान उनकी जिंदगी में सुनील दत्त आए। सेट पर आग लगने की घटना में सुनील दत्त ने उनकी जान बचाई और यहीं से दोनों की प्रेम कहानी शुरू हुई। 1958 में शादी के बाद नरगिस ने फिल्मों से दूरी बना ली और परिवार को समय दिया। उनके बेटे संजय दत्त बाद में बॉलीवुड के बड़े स्टार बने। हालांकि शादी से पहले राज कपूर और नरगिस के रिश्ते की चर्चा भी खूब हुई थी, लेकिन उनकी जिंदगी ने आखिरकार एक नया मोड़ लिया। शादी के बाद भी नरगिस सिर्फ घर तक सीमित नहीं रहीं। उन्होंने समाजसेवा में खुद को झोंक दिया और स्पास्टिक बच्चों के लिए काम करने वाली संस्था से जुड़कर हजारों लोगों की जिंदगी में बदलाव लाया। उन्हें राज्यसभा के लिए भी नामित किया गया था।

1967 में “रात और दिन” के जरिए नरगिस ने आखिरी बार पर्दे पर वापसी की और ऐसा अभिनय किया कि उन्हें पहला नेशनल अवॉर्ड फॉर बेस्ट एक्ट्रेस मिला। इस फिल्म में उन्होंने डबल पर्सनैलिटी से जूझ रही महिला का किरदार निभाया था, जिसे आज भी क्लासिक परफॉर्मेंस माना जाता है। नरगिस सिर्फ एक स्टार नहीं थीं, बल्कि हिंदी सिनेमा में अभिनय की परिभाषा बदलने वाली कलाकार थीं। उनकी सफेद साड़ी वाला अंदाज, उनकी मुस्कान और स्क्रीन प्रेजेंस आज भी लोगों के दिलों में जिंदा है।

1981 में पैंक्रियाटिक कैंसर की वजह से नरगिस ने दुनिया को अलविदा कह दिया। दुख की बात यह रही कि बेटे संजय दत्त की पहली फिल्म “रॉकी” रिलीज होने से ठीक तीन दिन पहले उनका निधन हो गया। लेकिन उनकी विरासत आज भी जिंदा है। उनके नाम पर “नरगिस दत्त अवॉर्ड” शुरू किया गया, उनके सम्मान में डाक टिकट जारी हुआ और आज भी उन्हें भारतीय सिनेमा की सबसे महान अभिनेत्री माना जाता है। यही वजह है कि जब भी बॉलीवुड के गोल्डन एरा की बात होती है, नरगिस का नाम सबसे ऊपर चमकता नजर आता है।

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