भारतीय सिनेमा के क्षितिज पर कुछ सितारे ऐसे चमकते हैं जिनकी रोशनी सरहदों और भाषाओं के बंधन को तोड़ देती है। आज कल हर तरफ सिर्फ एक ही नाम की गूंज है और वो है दक्षिण भारतीय सिनेमा के दिग्गज मोहनलाल। हाल ही में भारत सरकार द्वारा उन्हें सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से नवाजा गया है, जिसके बाद से ही सोशल मीडिया से लेकर न्यूज़ रूम्स तक उनकी चार दशकों लंबी जादुई यात्रा की चर्चा हो रही है। १८ साल की उम्र में फिल्म 'थिरनोत्तम' से अपने सफर की शुरुआत करने वाले इस कलाकार ने आज ४०० से अधिक फिल्मों का एक ऐसा साम्राज्य खड़ा कर दिया है, जहाँ अभिनय की परिभाषा हर फिल्म के साथ बदल जाती है।

मोहनलाल की सबसे बड़ी खासियत उनका 'नेचुरल' अभिनय है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत एक विलेन के तौर पर फिल्म 'मंजिल विरिंजा पूक्कल' से की थी, लेकिन उनकी प्रतिभा ने उन्हें जल्द ही सुपरस्टार बना दिया। अस्सी के दशक में 'राजाविन्ते मकान' जैसी फिल्मों से उन्होंने जो स्टारडम हासिल किया, वह आज भी बरकरार है। उनकी एक्टिंग की रेंज इतनी व्यापक है कि वह एक तरफ 'किरीडम' में एक लाचार युवक के मानसिक दर्द को जीवंत कर देते हैं, तो दूसरी तरफ 'नारसिम्हम' और 'पुलिमुरुगन' जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्मों में अपनी 'लार्जर देन लाइफ' इमेज से बॉक्स ऑफिस पर आग लगा देते हैं। यही वजह है कि उन्हें प्यार से 'लालेट्टन' कहा जाता है।

सिर्फ मलयालम ही नहीं, बल्कि हिंदी, तमिल और तेलुगु सिनेमा में भी उन्होंने अपनी अमिट छाप छोड़ी है। बॉलीवुड फिल्म 'कंपनी' में उनके द्वारा निभाए गए पुलिस ऑफिसर श्रीनिवासन के किरदार को आज भी हिंदी दर्शकों के बीच बेहतरीन परफॉरमेंस माना जाता है। वहीं मणिरत्नम की 'इरुवर' में उनके अभिनय ने साबित कर दिया कि वह किसी भी भाषा के सांचे में खुद को ढाल सकते हैं। साल २०२५ में 'एल २: एम्पुरान' और 'हृदयपूर्वम' जैसी फिल्मों की भारी सफलता ने यह दिखा दिया है कि उम्र के इस पड़ाव पर भी उनका जादू कम नहीं हुआ है, बल्कि वह और भी ज्यादा प्रभावशाली होकर उभरे हैं।

मोहनलाल की उपलब्धियों की लिस्ट किसी सपने जैसी लगती है। पांच नेशनल फिल्म अवार्ड्स, पद्म श्री और पद्म भूषण जैसे सम्मान उनके नाम के आगे सजे हैं। इतना ही नहीं, वह भारतीय प्रादेशिक सेना में लेफ्टिनेंट कर्नल की मानद रैंक पाने वाले पहले अभिनेता भी हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वह एक बेहतरीन एक्टर होने के साथ-साथ एक कुशल गायक, निर्माता और प्रोफेशनल रेसलर भी रहे हैं। उन्होंने 'दृश्यम' जैसी कल्ट क्लासिक फिल्म दी, जिसके रीमेक ने पूरी दुनिया में धूम मचा दी। उनकी हर फिल्म के साथ एक नई उम्मीद और एक नया कीर्तिमान जुड़ा होता है।

पर्दे के पीछे भी मोहनलाल एक प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी हैं। 'विश्वशांति फाउंडेशन' के माध्यम से समाजसेवा हो या फिर केरल के हस्तशिल्प और स्वास्थ्य अभियानों के ब्रांड एंबेसडर के रूप में उनकी भूमिका, उन्होंने हमेशा समाज को कुछ देने की कोशिश की है। वे ओशो और रमण महर्षि के विचारों को पढ़ने के शौकीन हैं और अपनी सफलता को नियति का खेल मानते हैं। आज जब हम उन्हें दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित होते देख रहे हैं, तो यह केवल एक अभिनेता का सम्मान नहीं है, बल्कि उस सादगी और समर्पण का सम्मान है जिसने भारतीय सिनेमा को एक नई ऊंचाई दी है।

Pratahkal Newsroom

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