IIT बॉम्बे (पवई कैंपस) में एनर्जी साइंस एंड इंजीनियरिंग विभाग के दूसरे वर्ष के 22 वर्षीय छात्र साहिल रवींद्र वाकोडे द्वारा 18 सितंबर 2026 को की गई आत्महत्या ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। देश के इस प्रतिष्ठित संस्थान में बीते 7 महीनों के भीतर छात्र की आत्महत्या का यह तीसरा मामला सामने आया है। इस घटना के बाद से ही संस्थान में तरह-तरह के सवाल उठ रहे हैं, विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं और पुलिस की जांच तेजी से चल रही है। इन तमाम आरोपों, हंगामों और पुलिसिया कार्रवाई के बीच बॉलीवुड के मशहूर गीतकार और 'मैदान' फिल्म के लिए नेशनल फिल्म अवॉर्ड जीतने वाले मनोज मुंतशिर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक वीडियो साझा किया है। 5 मिनट और 29 सेकेंड लंबे इस वीडियो में उन्होंने कुछ ऐसे सुलगते और गंभीर सवाल उठाए हैं, जिन पर हम सभी को गहराई से सोचने की जरूरत है।

मनोज मुंतशिर ने वीडियो की शुरुआत में दो टूक शब्दों में कहा कि अगर पंखा बदलना या सीलिंग फैन की जगह वॉल माउंटेड फैन लगाना बड़े समाधान का सिर्फ एक छोटा सा कदम है, तो यह ठीक है; लेकिन अगर हम यह मान लें कि यही इस पूरी समस्या का एकमात्र और अंतिम समाधान है, तो हमसे ज्यादा मूर्ख कोई नहीं होगा। उन्होंने कहा कि कभी-कभी हम समाधान की तलाश में असली और मूल समस्या को ही भूल जाते हैं और शुतुरमुर्ग की तरह रेत में अपना सिर दबाकर खतरे का सामना करने से कतराते हैं।

गीतकार ने आगे विस्तार से अपनी बात रखते हुए कहा कि इसे सिर्फ IIT बॉम्बे के एक अलग-थलग मामले की तरह देखना बहुत बड़ी भूल होगी। यह वक्त संभलने का है और बच्चों पर लगातार बन रहे मानसिक दबाव को समझने का है। उन्होंने कहा, "एक बच्चा आत्महत्या कर लेता है, अपनी बहुमूल्य जान दे देता है। माता-पिता का बुढ़ापा पूरी तरह उजड़ जाता है। बहन की कलाई सूखी रह जाती है और राखियां मिट जाती हैं। पूरे परिवार की हंसी हमेशा-हमेशा के लिए खत्म हो जाती है। और इसके जवाब में हम क्या करते हैं? हम हॉस्टल का पंखा बदल देते हैं। इससे आखिरकार कितना फर्क पड़ जाएगा? वॉल माउंटेड फैन लगाने से कितना बदलाव आ जाएगा? मुश्किल से एक-दो प्रतिशत, और इस बात की भी कोई गारंटी नहीं है।"

मनोज मुंतशिर ने साफ शब्दों में कहा कि पंखा इस समस्या की असली जड़ नहीं है, बल्कि समस्या हमारी सोच और हमारा नजरिया है। हम बार-बार गंदगी को कालीन के नीचे छुपा देते हैं और यह सोचते हैं कि हमारा घर बिल्कुल साफ है। हम बिना समस्या का सही मंथन किए समाधान का अमृत पाने की कोशिश कर रहे हैं, जो कि असंभव है। जब तक हम जड़ से इस समस्या को नहीं सुलझाएंगे, तब तक हमें अपने देश के युवा बच्चों की इस तरह असमय होने वाली मौतों का दुख झेलना ही पड़ेगा। उन्होंने कहा कि हर साल देश में सैकड़ों ऐसे मामले सामने आते हैं जहां बच्चे आत्महत्या जैसा चरम कदम उठा लेते हैं। हमें यह पता लगाना होगा कि वे आखिर उस आखिरी सीमा तक क्यों पहुंच जाते हैं, जहां से एक कदम आगे केवल मौत होती है। आईआईटी में सिलेक्शन न होना, बोर्ड परीक्षा में खराब परिणाम आना, जॉब इंटरव्यू में रिजेक्ट हो जाना या फिर प्यार में नाकामी मिलना—बच्चे इन सभी स्थितियों से निपटने के लिए हर बीमारी का एक ही इलाज ढूंढ रहे हैं, और वह है आत्महत्या। इतने सुंदर और संभावनाओं से भरे बच्चे अचानक ऐसा खतरनाक कदम क्यों उठा रहे हैं?

माता-पिता की उम्मीदों के दबाव पर बात करते हुए मनोज मुंतशिर ने एक अलग और अनूठा दृष्टिकोण रखा। उन्होंने कहा कि उन्होंने पिछले कुछ वर्षों में ऐसे बच्चों द्वारा छोड़े गए सुसाइड नोट्स पढ़े हैं, जो अखबारों और न्यूज पोर्टल्स में छपे थे। ज्यादातर नोट्स में एक बात बिल्कुल कॉमन थी— 'मम्मा-पापा, मैं आपकी उम्मीदें पूरी नहीं कर पाया, मुझे माफ कर देना।' यानी ज्यादातर बच्चे यही मानते हैं कि उन्हें हर हाल में अपने माता-पिता की उम्मीदों पर खरा उतरना है। उन्होंने आगे कहा कि उन्होंने इस विषय पर कई एक्सपर्ट्स के इंटरव्यू भी देखे हैं, जिनके अनुसार माता-पिता को बच्चों पर अपनी उम्मीदों का बोझ नहीं डालना चाहिए। वे उन सभी विशेषज्ञों के अनुभव का पूरा सम्मान करते हैं, लेकिन उनकी राय इस मामले में थोड़ी अलग है।

मनोज मुंतशिर ने सवाल उठाया कि क्या माता-पिता को अपने बच्चों से उम्मीदें नहीं रखनी चाहिए? एक आम इंसान अपनी जिंदगी का आधा हिस्सा खुद पर और बाकी आधा अपने बच्चों को पालने-पोसने और पढ़ाने में खर्च करता है। अगर माता-पिता ही अपने बच्चों को बड़े सपने नहीं दिखाएंगे, तो फिर कौन दिखाएगा? अगर माता-पिता यह न कहें कि 'तू मेरा शेर का बच्चा है, तू मेरी शेरनी है, तू यह कर सकता है', तो और कौन कहेगा? लेकिन ऐसा करते हुए हम एक बड़ी गलती कर बैठते हैं और एक बहुत जरूरी बात छोड़ देते हैं, जो कि असल में इस पूरी समस्या की असली जड़ है।

उन्होंने समझाया कि जब हम अपने शेर या शेरनी जैसे बच्चों को दुनिया के इस मुश्किल जंगलों में अपने सपनों का शिकार करने के लिए भेजते हैं, तो उन्हें भरपूर हिम्मत देना बहुत जरूरी है। इसके साथ ही उन्हें दो बातें समझाना और भी ज्यादा जरूरी है। पहली यह कि शिकार करते समय रास्ते में जंगली घास बार-बार चुभेगी और कई तरह की खरोंचें भी आएंगी। लेकिन ये बहुत छोटी चोटें हैं, जो एक-दो दिन में खुद-ब-खुद ठीक हो जाएंगी। इनसे कभी डरना नहीं है और घबराना नहीं है। और दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि अगर दो, चार या दस दिन तक भी कोई शिकार हाथ न लगे, तो भी डरने की कोई जरूरत नहीं है। बस अपनी कोशिश जारी रखना। और अगर फिर भी सफलता न मिले, तो हमारे पास अपनी खुली बांहों में वापस लौटने से पहले दो बार मत सोचना। हम तुम्हारे माता-पिता हैं और हमेशा रहेंगे। हम तुम्हारा सबसे सुरक्षित ठिकाना हैं। हमारे घर में दाल-रोटी बहुत अच्छी है, आओ और सब मिलकर खाते हैं। और जब तुम्हारा मन करे, तो फिर से नए सिरे से सपनों का शिकार करने के लिए निकल जाना।

वीडियो के अंत में गीतकार ने एक बेहद भावुक संदेश देते हुए कहा कि अगर बच्चे के मन में यह बात बैठ जाए कि घर लौटने पर उसे प्यार और सम्मान नहीं मिलेगा, बल्कि सिर्फ घूरती हुई निगाहें और सवाल भरे ताने मिलेंगे, तो वह कभी भी घर के दरवाजे पर दस्तक नहीं देगा। वह उस खौफनाक रास्ते पर चला जाएगा जहां से कोई कभी वापस नहीं लौटता। तब चाहे छत का पंखा हो या न हो, उसके पास दुनिया छोड़ने के सौ और तरीके होंगे। लेकिन हमारे पास अपने फूल जैसे बच्चों की जान और उनका आत्मसम्मान बचाने का सिर्फ एक ही तरीका है—वे बांहें जो उसे बचपन में पहली बार उठाकर आसमान की ओर उछालती थीं, वे हमेशा उनके लिए खुली रहें। जिन होठों से उसने पहली बार प्यार पाया था, वहां से कभी कोई कठोर शब्द न सुनाई दें। जब वह अपनी मार्कशीट लेकर घर आए, तो उसे प्यार से गले लगाकर यह कहें, "मार्कशीट क्या है बाबा? वह सिर्फ कागज का एक टुकड़ा है, और तू मेरे दिल का सबसे अनमोल टुकड़ा है। दुनिया का कोई भी कागज किसी धड़कते हुए दिल से ज्यादा कीमती नहीं हो सकता।"

गौरतलब है कि IIT बॉम्बे (पवई कैंपस) में 18 सितंबर 2026 को हुई इस दुखद घटना के बाद से माहौल काफी गरमाया हुआ है। एनर्जी साइंस एंड इंजीनियरिंग विभाग में पढ़ने वाले साहिल रवींद्र वाकोडे अपने हॉस्टल के कमरे में छत के पंखे से लटके हुए पाए गए थे। इस घटना से कुछ घंटे पहले ही मिड-सेमेस्टर परीक्षा के दौरान उन्हें कथित तौर पर मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (ChatGPT) की मदद लेते हुए पकड़ा गया था। इसके बाद मामला तब और अधिक गंभीर हो गया जब साहिल के परिवार ने संस्थान पर गंभीर जातिगत उत्पीड़न और भेदभाव के आरोप लगाए। उनके पिता रवींद्र वाकोडे ने संस्थान के एक प्रोफेसर सूर्यनारायण दूला और अन्य पर मानसिक प्रताड़ना के संगीन आरोप दर्ज कराए। इसके बाद मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच ने आत्महत्या के लिए उकसाने और एससी/एसटी (SC/ST) एक्ट के तहत प्राथमिकी दर्ज की है। इस भारी दबाव के बीच IIT बॉम्बे ने संबंधित प्रोफेसर को प्रशासनिक जिम्मेदारियों से मुक्त कर दिया है और मामले की जांच के लिए एक आंतरिक समिति का गठन किया है। संस्थान ने अपनी सफाई में यह भी स्पष्ट किया था कि साहिल पर कोई भी औपचारिक अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की गई थी, और शिक्षकों ने उन्हें समझाकर भरोसा भी दिलाया था कि इससे उनके करियर पर कोई आंच नहीं आएगी, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने यह चरम कदम उठा लिया। पिछले सात महीनों में कैंपस में छात्र की आत्महत्या का यह तीसरा मामला होने के कारण छात्रों में भारी आक्रोश है और विरोध प्रदर्शनों का दौर जारी है, जिसके जवाब में प्रशासन ने हॉस्टल के कमरों से छत के पंखे हटाकर उनकी जगह दीवार पर लगने वाले पंखे लगाना शुरू कर दिया है।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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