आज जब भी दमदार एक्टिंग, रियल किरदार और स्क्रीन पर सच्चाई जैसी परफॉर्मेंस की बात होती है, तो सबसे पहले नाम आता है मनोज बाजपेयी का। ओटीटी से लेकर बड़े पर्दे तक उनका जलवा ऐसा है कि हर नई रिलीज़ के साथ सोशल मीडिया पर उनकी चर्चा शुरू हो जाती है। ‘द फैमिली मैन’ में श्रीकांत तिवारी हो या ‘भोंसले’ का शांत लेकिन अंदर से टूट चुका पुलिसवाला, मनोज हर किरदार में ऐसी जान डालते हैं कि दर्शक उन्हें सिर्फ देखते नहीं, महसूस करते हैं। यही वजह है कि आज भी लोग उन्हें बॉलीवुड का सबसे भरोसेमंद और सबसे खतरनाक परफॉर्मर मानते हैं।

बिहार के पश्चिम चंपारण जिले के छोटे से गांव बेलवा में जन्मे मनोज बाजपेयी का सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। किसान परिवार से आने वाले मनोज बचपन से ही अभिनेता बनना चाहते थे। गांव की झोपड़ी वाले स्कूल से पढ़ाई शुरू करने वाला यह लड़का 17 साल की उम्र में दिल्ली पहुंचा, लेकिन यहां उनका संघर्ष बेहद दर्दनाक रहा। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा ने उन्हें चार बार रिजेक्ट किया। कहा जाता है कि लगातार रिजेक्शन ने उन्हें अंदर तक तोड़ दिया था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। थिएटर करते रहे, बैरी जॉन जैसे मशहूर एक्टिंग कोच के साथ काम किया और धीरे-धीरे खुद को ऐसा कलाकार बना लिया, जिसे आज पूरी इंडस्ट्री सलाम करती है।

फिल्मों में उनका शुरुआती सफर आसान नहीं था। ‘द्रोहकाल’ और ‘बैंडिट क्वीन’ जैसी फिल्मों में छोटे रोल करने वाले मनोज की जिंदगी तब बदल गई जब राम गोपाल वर्मा ने उन्हें ‘सत्या’ में भीकू म्हात्रे का किरदार दिया। “मुंबई का किंग कौन? भीकू म्हात्रे” वाला डायलॉग आज भी हिंदी सिनेमा के सबसे आइकॉनिक डायलॉग्स में गिना जाता है। इस फिल्म ने मनोज बाजपेयी को रातों-रात स्टार बना दिया। नेशनल अवॉर्ड और फिल्मफेयर क्रिटिक्स अवॉर्ड जीतने वाले मनोज ने इसके बाद ‘शूल’, ‘कौन’, ‘पिंजर’ और ‘अक्स’ जैसी फिल्मों में साबित कर दिया कि वह सिर्फ हीरो नहीं, एक्टिंग की पूरी पाठशाला हैं।

हालांकि सफलता के बाद उनका करियर हमेशा आसान नहीं रहा। एक वक्त ऐसा भी आया जब लगातार फ्लॉप फिल्मों ने उन्हें इंडस्ट्री में लगभग किनारे कर दिया था। लेकिन मनोज बाजपेयी उन कलाकारों में से नहीं थे जो हार मान लें। ‘राजनीति’ से उन्होंने जोरदार वापसी की और फिर ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ ने उन्हें नई पीढ़ी का फेवरेट बना दिया। सरदार खान के किरदार में उनका अंदाज इतना जबरदस्त था कि लोग फिर से उनके दीवाने हो गए। इसके बाद ‘अलीगढ़’ में प्रोफेसर रामचंद्र सिरस का दर्द, ‘स्पेशल 26’ का सीबीआई ऑफिसर और ‘चक्रीयव्यूह’ का नक्सली—हर किरदार ने दिखाया कि मनोज सिर्फ एक्टिंग नहीं करते, वह किरदार को जीते हैं।

मनोज बाजपेयी की सबसे बड़ी ताकत उनकी रियलिस्टिक एक्टिंग मानी जाती है। इंडस्ट्री के कई बड़े कलाकार, जिनमें नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी भी शामिल हैं, खुलकर कह चुके हैं कि मनोज ने हिंदी सिनेमा में मेथड एक्टिंग का रास्ता खोला। शेखर कपूर और हंसल मेहता जैसे निर्देशक भी उनकी तारीफ करते नहीं थकते। चार नेशनल अवॉर्ड, कई फिल्मफेयर अवॉर्ड और भारत सरकार का पद्मश्री सम्मान इस बात का सबूत है कि मनोज बाजपेयी सिर्फ एक अभिनेता नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा की ऐसी विरासत हैं जिन्होंने टैलेंट को स्टारडम से ऊपर खड़ा किया।

आज ओटीटी के दौर में भी मनोज बाजपेयी का क्रेज कम नहीं हुआ है। ‘द फैमिली मैन’ ने उन्हें नई पीढ़ी के बीच सुपरस्टार बना दिया। एक आम मिडिल क्लास आदमी और सीक्रेट एजेंट के डबल जीवन को उन्होंने जिस अंदाज में निभाया, उसने दर्शकों को पूरी तरह बांध लिया। यही वजह है कि गांव से निकला यह लड़का आज करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा बन चुका है। मनोज बाजपेयी की कहानी सिर्फ संघर्ष और सफलता की कहानी नहीं, बल्कि उस जुनून की मिसाल है जो बार-बार गिरकर भी इंसान को जीतना सिखाता है।

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