आज जब पुराने बॉलीवुड गानों की बात होती है, तो एक नाम बार-बार ट्रेंड में आ जाता है—मदन मोहन। सोशल मीडिया पर उनकी धुनों की नई-नई रील्स बन रही हैं, पुराने गाने फिर से वायरल हो रहे हैं और लोग पूछ रहे हैं कि आखिर कौन थे ये शख्स जिनकी धुनें आज भी दिल को छू जाती हैं। “लग जा गले”, “नैना बरसे” और “दिल ढूंढता है” जैसे गाने आज की जनरेशन तक को अपनी तरफ खींच रहे हैं, और यही वजह है कि मदन मोहन फिर से चर्चा में हैं।

मदन मोहन का जन्म 25 जून 1924 को बगदाद में हुआ, लेकिन उनकी जड़ें हिंदुस्तान से जुड़ी थीं। बचपन में उन्होंने लाहौर और मुंबई में पढ़ाई की और कम उम्र में ही संगीत की दुनिया से जुड़ गए। दिलचस्प बात ये है कि उन्होंने कभी औपचारिक रूप से संगीत की ट्रेनिंग नहीं ली, फिर भी उनकी समझ और एहसास इतना गहरा था कि वो सीधे दिल तक पहुंच जाता था। ऑल इंडिया रेडियो में काम करते हुए उन्होंने बड़े उस्तादों के साथ समय बिताया, जिससे उनकी संगीत की समझ और निखरती चली गई।

करियर की शुरुआत आसान नहीं थी। सेना में सेकंड लेफ्टिनेंट के तौर पर काम करने के बाद उन्होंने संगीत को अपना रास्ता चुना। 1950 में फिल्म “आंखें” से उन्हें बड़ा ब्रेक मिला और यहीं से उनका सफर शुरू हुआ। इसके बाद उन्होंने लता मंगेशकर, मोहम्मद रफी और तलत महमूद जैसे दिग्गज गायकों के साथ मिलकर एक के बाद एक ऐसे गाने दिए जो अमर हो गए। “सावन के महीने में”, “कभी ना कभी कोई”, “फिर वही शाम” जैसे गानों ने उन्हें एक अलग पहचान दिलाई।

1960 और 70 का दशक उनके करियर का गोल्डन पीरियड माना जाता है। “वो कौन थी”, “मेरा साया”, “हकीकत” और “दस्तक” जैसी फिल्मों में उनका संगीत आज भी क्लासिक माना जाता है। खासकर “हकीकत” का “कर चले हम फिदा” और “वो कौन थी” का “लग जा गले” आज भी सुनने वालों की रूह को छू जाता है। उन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत को फिल्मी धुनों में इस तरह पिरोया कि हर गाना एक अलग ही एहसास बन गया। 1971 में “दस्तक” के लिए उन्हें नेशनल अवॉर्ड भी मिला, जो उनके टैलेंट का बड़ा सबूत है।

मदन मोहन को “ग़ज़लों का शहज़ादा” कहा जाता है, और ये नाम उन्हें यूं ही नहीं मिला। उनकी धुनों में एक दर्द, एक गहराई और एक सुकून होता था, जो सीधे दिल तक उतर जाता है। हालांकि उन्हें अपने दौर में उतनी पहचान नहीं मिली जितनी मिलनी चाहिए थी, लेकिन समय के साथ उनकी कद्र बढ़ती गई। यहां तक कि उनकी मृत्यु के सालों बाद भी उनकी धुनों को फिल्म “वीर-ज़ारा” में दोबारा इस्तेमाल किया गया और उन्हें मरणोपरांत अवॉर्ड भी मिला।

आज भी उनकी धुनें नई फिल्मों और गानों में इंस्पिरेशन बन रही हैं। हाल ही में “व्हाट झुमका” जैसे गाने में उनकी पुरानी धुन का इस्तेमाल किया गया, जिसने साबित कर दिया कि मदन मोहन का संगीत कभी पुराना नहीं होता। उनकी विरासत सिर्फ गानों तक सीमित नहीं है, बल्कि वो एक एहसास है जो हर पीढ़ी को जोड़ता है।

Pratahkal Newsroom

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