आज अगर मलयालम सिनेमा की सबसे बोल्ड, अनोखी और इंटरनेशनल लेवल की फिल्मों की बात होती है, तो उसमें Lijo Jose Pellissery का नाम सबसे ऊपर दिखाई देता है। सोशल मीडिया पर उनकी फिल्मों के सीन, कैमरा वर्क और कहानी कहने का तरीका लगातार वायरल रहता है। “जल्लिकट्टू”, “चुरुली” और “ननपकल नेरथु मयक्कम” जैसी फिल्मों ने उन्हें सिर्फ साउथ इंडिया तक सीमित नहीं रखा, बल्कि पूरी दुनिया में उनकी पहचान बनाई। उनकी फिल्मों को देखकर लोग अक्सर कहते हैं कि ये सिर्फ फिल्में नहीं बल्कि एक सिनेमैटिक एक्सपीरियंस हैं, और यही वजह है कि आज हर फिल्म लवर उनके काम की चर्चा कर रहा है।

केरल के त्रिशूर जिले के चालाकुडी में जन्मे लिजो का सिनेमा से रिश्ता बचपन से ही जुड़ गया था। उनके पिता जोस पेल्लिस्सेरी मलयालम थिएटर और फिल्मों का बड़ा नाम थे। घर में अभिनय और थिएटर का माहौल था, इसलिए लिजो के अंदर कहानी कहने की कला बहुत जल्दी विकसित हो गई। एमबीए की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने विज्ञापन फिल्मों में असिस्टेंट के तौर पर काम शुरू किया, लेकिन उनका सपना अलग तरह का सिनेमा बनाने का था। उन्होंने शॉर्ट फिल्में बनाईं और धीरे-धीरे इंडस्ट्री में अपनी पहचान तैयार की। साल 2010 में “नायकन” से उन्होंने डायरेक्शन में डेब्यू किया। फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कमाल नहीं कर पाई, लेकिन क्रिटिक्स ने साफ समझ लिया था कि इंडस्ट्री को एक नया और अलग सोच वाला फिल्ममेकर मिल चुका है।

इसके बाद “सिटी ऑफ गॉड” और फिर “अमेन” ने उनकी किस्मत बदल दी। “अमेन” सिर्फ एक फिल्म नहीं थी बल्कि मलयालम सिनेमा में एक नई वाइब लेकर आई। इंड्रजीत सुकुमारन, फहाद फासिल और कलाभवन मणि जैसे कलाकारों के साथ बनी इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर शानदार सफलता हासिल की। हालांकि “डबल बैरल” को मिला-जुला रिस्पॉन्स मिला, लेकिन लिजो ने एक्सपेरिमेंट करना नहीं छोड़ा। फिर आई “अंगमाली डायरीज”, जिसने उन्हें मास ऑडियंस और क्रिटिक्स दोनों का फेवरेट बना दिया। करीब 86 नए कलाकारों के साथ बनाई गई इस फिल्म का 11 मिनट का लगातार चलने वाला क्लाइमैक्स आज भी फिल्म स्कूलों में चर्चा का विषय है। बॉलीवुड डायरेक्टर Anurag Kashyap ने इसे अपना “फिल्म ऑफ द ईयर” तक कहा था।

लिजो की सबसे बड़ी ताकत उनका फिल्ममेकिंग स्टाइल है। वे नॉन-लीनियर नैरेशन, लंबे वन-टेक शॉट्स और रॉ विजुअल्स के लिए जाने जाते हैं। “ई.मा.याउ.” ने उन्हें केरल स्टेट अवॉर्ड और इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ इंडिया में सिल्वर पीकॉक अवॉर्ड दिलाया। इसके बाद “जल्लिकट्टू” ने पूरी दुनिया का ध्यान उनकी तरफ खींच लिया। इस फिल्म का प्रीमियर टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में हुआ और बाद में इसे ऑस्कर के लिए भारत की ऑफिशियल एंट्री भी चुना गया। हजारों एक्स्ट्रा कलाकारों और पागलपन भरे कैमरा मूवमेंट्स के साथ बनाई गई यह फिल्म आज भी भारतीय सिनेमा की सबसे इंटेंस फिल्मों में गिनी जाती है।

“चुरुली” और “ननपकल नेरथु मयक्कम” जैसी फिल्मों ने साबित कर दिया कि लिजो सिर्फ तकनीकी तौर पर मजबूत डायरेक्टर नहीं हैं, बल्कि इंसानी दिमाग और समाज की गहराइयों को भी बेहद अलग अंदाज में दिखाना जानते हैं। Mammootty के साथ उनकी फिल्म “ननपकल नेरथु मयक्कम” को केरल स्टेट फिल्म अवॉर्ड में बेस्ट फिल्म का सम्मान मिला। उनकी हर नई फिल्म के साथ दर्शकों की उम्मीदें और भी बढ़ जाती हैं। यही कारण है कि आज लिजो जोस पेल्लिस्सेरी सिर्फ एक डायरेक्टर नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा में क्रिएटिव रिवोल्यूशन का नाम बन चुके हैं।

Pratahkal Newsroom

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