फोटोग्राफी के शिखर पुरुष रघु राय का निधन: खंडवा और नर्मदा के विस्थापन के दर्द से था उनका अटूट रिश्ता

फोटोग्राफी की दुनिया में अपनी जादुई नजर से इतिहास लिखने वाले महान छायाकार रघु राय अब हमारे बीच नहीं रहे। उनके निधन की खबर ने न केवल कला जगत को शोक संतप्त कर दिया है, बल्कि मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में भी दुख की एक गहरी लहर दौड़ गई है। रघु राय का खंडवा से नाता केवल एक पेशेवर असाइनमेंट तक सीमित नहीं था, बल्कि यह मानवीय संवेदनाओं और एक ऐतिहासिक आंदोलन की गवाही का एक भावनात्मक सफर था। वर्ष 1989 में जब नर्मदा बचाओ आंदोलन अपनी चरम सीमा पर था, तब रघु राय ने खंडवा और हरसूद के विस्थापन के दर्द को अपने कैमरे के जरिए पूरी दुनिया के सामने प्रस्तुत किया था।

खंडवा के वरिष्ठ पत्रकारों के अनुसार, 27 सितंबर 1989 की वह शाम आज भी लोगों के जेहन में ताजा है जब एक सफेद एम्बेसडर कार घंटाघर स्थित वीना स्टूडियो के सामने रुकी थी। उस कार से उतरने वाले शख्स कोई और नहीं, बल्कि रघु राय थे। उन्हें देखने के लिए स्थानीय पत्रकारों और छायाकारों का हुजूम उमड़ पड़ा था। वे वहां 'टाइम मैगजीन' के एक विशेष असाइनमेंट पर आए थे, जिसका उद्देश्य नर्मदा घाटी में हो रहे विस्थापन और आंदोलन कीcover story तैयार करना था। उस दौर में इस प्रोजेक्ट की महत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि रघु राय को केवल 10-12 तस्वीरों के लिए भारी मानदेय दिया जाना था, जबकि उनकी पूर्व पत्नी उषा राय इस कहानी के लेखन का जिम्मा संभाल रही थीं।

रघु राय के व्यक्तित्व का सबसे प्रभावशाली पहलू उनकी सादगी और फोटोग्राफी के प्रति उनका दर्शन था। खंडवा के NVDA रेस्ट हाउस में जब स्थानीय युवाओं ने उनसे तकनीकी सवाल पूछे, तो उन्होंने एक ऐसा मूलमंत्र दिया जो आज भी छायाकारों के लिए प्रेरणा है। उन्होंने कहा था कि बेहतरीन कैमरे भले ही जापान में बनते हों, लेकिन एक श्रेष्ठ तस्वीर कैमरे से नहीं बल्कि फोटोग्राफर की सोच और नजर से बनती है। उनके अनुसार, सही क्षण और भाव ही किसी साधारण दृश्य को कालजयी कृति में बदल देते हैं। रघु राय की तस्वीरों में भोपाल गैस त्रासदी की भयावहता हो या नर्मदा के डूब प्रभावितों की बेबसी, हर फ्रेम एक कहानी बयां करता था।

उनकी महानता केवल उनके काम में नहीं, बल्कि उनके संवेदनशील हृदय में भी झलकती थी। ओंकारेश्वर से लौटते समय उन्होंने एक असहाय भिक्षु महिला की जिस प्रकार मदद की, वह किस्सा खंडवा के गलियारों में आज भी सुनाया जाता है। उन्होंने न केवल उसे आर्थिक सहायता दी, बल्कि यह सुनिश्चित किया कि वह महिला सुरक्षित रूप से अपने गंतव्य मोरटक्का तक पहुंचे। रघु राय का मानना था कि एक अच्छा फोटोग्राफर होने से पहले एक संवेदनशील इंसान होना जरूरी है। आज उनके जाने के बाद नर्मदा की लहरें और खंडवा की मिट्टी उस महान कलाकार को याद कर रही है, जिसने विस्थापन के शोर में दबी खामोश आवाजों को अपनी तस्वीरों के जरिए वैश्विक मंच प्रदान किया।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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