कौन हैं कुमार सानू? 90s की वो जादुई आवाज़ जो आज की जनरेशन के लिए बन गई है एक इमोशन
केदारनाथ भट्टाचार्य से पद्म श्री विजेता बनने तक का सफर और 'आशिकी' फिल्म से मिली रातों-रात सफलता का उनके करियर पर प्रभाव।

पद्म श्री से सम्मानित गायक कुमार सानू एक लाइव म्यूजिक कॉन्सर्ट के दौरान मंच पर प्रस्तुति देते हुए।
आज के दौर में जब इंस्टाग्राम रील्स और म्यूजिक चार्ट्स पर नजर डालते हैं, तो एक नाम अचानक फिर से हर जगह दिखाई देने लगा है और वो नाम है कुमार सानू। सोशल मीडिया के इस दौर में जहां हर रोज नए गाने आते और जाते हैं, वहां सानू दा की आवाज का जादू एक बार फिर वायरल हो रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि आज की युवा पीढ़ी रिमिक्स के शोर से थककर अब उस ओरिजिनल फील की तलाश कर रही है, जो सिर्फ उनकी मेलोडियस आवाज में मिलता है। चाहे वो कॉलेज के गलियारे हों या लाइव कॉन्सर्ट्स, उनकी आवाज आज भी हर लव स्टोरी और इमोशन को एक नई पहचान दे रही है, जिससे वो एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गए हैं।
कोलकाता की गलियों में केदारनाथ भट्टाचार्य के रूप में जन्मे इस कलाकार का कुमार सानू बनने तक का सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। उनके पिता खुद एक संगीतकार थे, इसलिए सुरों की समझ उन्हें विरासत में मिली थी, लेकिन बॉलीवुड की चकाचौंध में अपनी जगह बनाने के लिए उन्हें लंबा और कड़ा संघर्ष करना पड़ा। उनकी किस्मत का सितारा अस्सी के दशक के आखिर में तब चमकना शुरू हुआ जब दिग्गज गजल गायक जगजीत सिंह ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें इंडस्ट्री में पहला बड़ा मौका दिलवाया। इसके बाद साल 1990 में आई फिल्म 'आशिकी' ने संगीत की दुनिया के सारे समीकरण बदल दिए और इसके गानों ने उन्हें रातों-रात एक ऐसा सुपरस्टार बना दिया जिसकी आवाज हर घर की जरूरत बन गई।
नब्बे का दशक भारतीय संगीत इतिहास में वास्तव में कुमार सानू का गोल्डन एरा था, जहां उनकी आवाज के बिना कोई भी फिल्म अधूरी मानी जाती थी। साजन, दीवाना, बाजीगर और 1942 ए लव स्टोरी जैसी यादगार फिल्मों में उन्होंने ऐसे सुर छेड़े कि सुनने वाले बस उनके मुरीद होकर रह गए। उनकी गायकी की सबसे बड़ी खासियत उनका सादगी भरा अंदाज और दिल को छू लेने वाले इमोशन थे, जो सीधे सुनने वाले की रूह तक पहुंच जाते थे। इसी करिश्मे की बदौलत उन्होंने लगातार पांच साल फिल्मफेयर अवॉर्ड्स जीतकर एक ऐसा रिकॉर्ड कायम किया, जिसे तोड़ना आज भी किसी चुनौती से कम नहीं है और यही कारण था कि वो उस दौर के हर बड़े म्यूजिक डायरेक्टर की पहली पसंद बन चुके थे।
उनकी लोकप्रियता और काम के प्रति दीवानगी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि साल 1993 में उन्होंने एक ही दिन में 28 गाने रिकॉर्ड करके गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में अपना नाम दर्ज करा दिया था। अलका याग्निक के साथ उनके गाए हुए डुएट्स ने रोमांस की एक ऐसी नई परिभाषा लिखी जिसे आज भी प्रेमी जोड़ें गुनगुनाते हैं। उस दौर में उदित नारायण के साथ उनकी प्रोफेशनल प्रतिद्वंद्विता की खबरें भी खूब सुर्खियां बटोरती थीं, लेकिन हकीकत में इन दोनों महान गायकों की आवाजों ने मिलकर नब्बे के दशक को भारतीय संगीत का स्वर्ण युग बना दिया था। उनकी आवाज में वो कशिश थी जो किसी भी साधारण बोल को एक अमर गीत में तब्दील कर सकती थी।
दो हजार के दशक के बाद भले ही बॉलीवुड के संगीत में बदलाव आया और उनका दबदबा थोड़ा कम हुआ, लेकिन उनके चाहने वालों का क्रेज कभी कम नहीं हुआ। आज भी वो रियलिटी शोज में जज और मेंटर के तौर पर नजर आते हैं और लाइव स्टेज पर उनकी मौजूदगी नई पीढ़ी को अपने साथ जोड़ लेती है। भारतीय संगीत में उनके अतुलनीय योगदान के लिए साल 2009 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया, जो उनके शानदार करियर की एक बड़ी उपलब्धि है। असल में कुमार सानू सिर्फ एक गायक नहीं बल्कि करोड़ों लोगों की यादों का वो हिस्सा हैं, जो प्यार और दर्द के हर मोड़ पर साथ खड़ा रहता है। यही वजह है कि उनकी आवाज कभी पुरानी नहीं होती और वो हमेशा प्रासंगिक बने रहते हैं।

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