कौन हैं कुलभूषण खरबंदा? ‘शाकाल’ बनकर जिसने खौफ की नई पहचान बना दी
थिएटर से अभिनय की शुरुआत करने वाले कुलभूषण खरबंदा ने फिल्म 'शान' के शाकाल से लेकर 'मिर्जापुर' के बाऊजी तक भारतीय सिनेमा में अपनी एक अलग पहचान बनाई है।

हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता कुलभूषण खरबंदा एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान मीडिया से बातचीत करते हुए।
बॉलीवुड में जब भी सबसे खतरनाक और स्टाइलिश विलेन की बात होती है, तो एक नाम अपने आप लोगों के ज़हन में आ जाता है — कुलभूषण खरबंदा। आज भी सोशल मीडिया पर उनका ‘शाकाल’ वाला लुक, डायलॉग और स्क्रीन प्रेजेंस वायरल होती रहती है। फिल्म ‘शान’ में निभाया गया उनका किरदार सिर्फ एक विलेन नहीं था, बल्कि हिंदी सिनेमा के इतिहास का ऐसा आइकॉन बन गया जिसने खलनायकी की पूरी परिभाषा बदल दी। दिलचस्प बात ये है कि कुलभूषण खरबंदा ने सिर्फ निगेटिव रोल्स से ही नहीं, बल्कि आर्ट फिल्मों, थिएटर, टीवी और ओटीटी तक हर जगह अपनी एक्टिंग का ऐसा रंग छोड़ा कि लोग उन्हें अभिनय का चलता-फिरता स्कूल मानते हैं।
21 अक्टूबर 1944 को जन्मे कुलभूषण खरबंदा का सफर ग्लैमर से नहीं बल्कि थिएटर के स्ट्रगल से शुरू हुआ था। दिल्ली में दोस्तों के साथ थिएटर ग्रुप बनाने से लेकर ‘यात्रिक’ और फिर कोलकाता के मशहूर ‘पदातिक’ थिएटर ग्रुप तक, उन्होंने मंच पर सालों मेहनत की। यही थिएटर उनकी एक्टिंग की असली यूनिवर्सिटी बना। श्याम बेनेगल जैसे दिग्गज निर्देशक ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और ‘निशांत’, ‘मंथन’, ‘भूमिका’, ‘जुनून’ और ‘कलयुग’ जैसी फिल्मों में मौका दिया। उस दौर में कुलभूषण खरबंदा पैरेलल सिनेमा का बड़ा चेहरा बन चुके थे और गंभीर अभिनय के लिए जाने जाते थे।
फिर आया साल 1980 और फिल्म ‘शान’। गंजे सिर, ठंडी आंखों और खतरनाक मुस्कान वाले ‘शाकाल’ ने ऐसा धमाका किया कि दर्शक डरने के साथ-साथ उसके फैन भी बन गए। उस दौर में विलेन अक्सर तेज आवाज़ और ओवरएक्टिंग वाले होते थे, लेकिन कुलभूषण खरबंदा ने शाकाल को बेहद शांत, क्लासी और साइको अंदाज दिया। यही वजह है कि दशकों बाद भी लोग उन्हें उसी किरदार से याद करते हैं। हालांकि उन्होंने खुद को सिर्फ एक इमेज में कैद नहीं होने दिया। ‘अर्थ’, ‘चक्र’, ‘मंडी’, ‘एक चादर मैली सी’, ‘नसीम’, ‘फायर’, ‘अर्थ’, ‘वॉटर’ और ‘मॉनसून वेडिंग’ जैसी फिल्मों में उन्होंने अपने अभिनय की गहराई दिखाई।
मुख्यधारा सिनेमा में भी उनका सफर शानदार रहा। ‘घायल’, ‘जो जीता वही सिकंदर’, ‘बॉर्डर’, ‘गुप्त’, ‘यस बॉस’, ‘लगान’, ‘जोधा अकबर’, ‘हैदर’, ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ और हालिया फिल्म ‘क्रू’ तक उन्होंने हर दौर में खुद को प्रासंगिक बनाए रखा। पंजाबी फिल्मों में भी उनका बड़ा योगदान रहा और ‘चन परदेसी’ जैसी फिल्मों ने उन्हें अलग पहचान दी। ओटीटी के दौर में भी उन्होंने ‘मिर्जापुर’ में बाऊजी बनकर नई पीढ़ी को अपना दीवाना बना दिया। उनकी आवाज़, स्क्रीन कमांड और आंखों का अभिनय आज भी उतना ही असरदार लगता है जितना 80 के दशक में था।
कुलभूषण खरबंदा उन चुनिंदा कलाकारों में शामिल हैं जिन्होंने कमर्शियल और आर्ट सिनेमा के बीच की दूरी मिटा दी। एक तरफ वे ‘शाकाल’ जैसे पॉप कल्चर आइकॉन बने, तो दूसरी तरफ दीप मेहता की ‘फायर’, ‘अर्थ’ और ‘वॉटर’ जैसी अंतरराष्ट्रीय फिल्मों का अहम चेहरा भी रहे। थिएटर से लेकर फिल्मों और वेब सीरीज तक, उन्होंने हर माध्यम में खुद को साबित किया। शायद यही वजह है कि आज भी जब अभिनय की क्लास, दमदार विलेन या स्क्रीन प्रेजेंस की बात होती है, तो कुलभूषण खरबंदा का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है।

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