कौन हैं के. एस. चित्रा? वो जादुई आवाज़ जिसकी दीवानी अब नई पीढ़ी भी हो गई है
छह नेशनल अवॉर्ड्स जीतने वाली के. एस. चित्रा ने 25,000 से ज्यादा गानों के जरिए भारतीय संगीत जगत में एक अमिट पहचान बनाई है।

मंच पर लाइव परफॉर्मेंस के दौरान गायिका के. एस. चित्रा, जिन्हें संगीत में उनके योगदान के लिए पद्म भूषण और छह राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है।
आजकल जब सोशल मीडिया पर हर दूसरे दिन नए गाने और गायक वायरल होते हैं, तब भी एक ऐसी आवाज़ है जिसकी चमक फीकी पड़ने के बजाय और बढ़ती जा रही है। हम बात कर रहे हैं सुरों की मल्लिका के. एस. चित्रा की, जिन्हें आज की युवा पीढ़ी बड़े उत्साह के साथ इंटरनेट पर डिस्कवर कर रही है। चाहे वह फिल्म 'बॉम्बे' का वो रूहानी गाना 'कहना ही क्या' हो या दक्षिण भारतीय सिनेमा के दिल को छू लेने वाले गीत, चित्रा की आवाज़ आज भी उतनी ही ताज़ा और सुकून देने वाली लगती है। यही कारण है कि उन्हें 'मेलोडी क्वीन' और 'गोल्डन वॉयस ऑफ इंडिया' जैसे बड़े खिताबों से नवाजा गया है, जो इस बात का सबूत हैं कि उनकी साख दशकों बाद भी वैसी ही बनी हुई है।
केरल के तिरुवनंतपुरम में जन्मी चित्रा का संगीत की दुनिया में कदम रखना किसी फिल्मी कहानी से कम रोमांचक नहीं है। एक मध्यमवर्गीय परिवार में पली-बढ़ी इस महान गायिका को संगीत का जुनून अपने पिता से विरासत में मिला था। उनके पिता ने ही उनकी शुरुआती प्रतिभा को पहचाना और उसे सही दिशा दी। स्कूल के दिनों से ही उनके शिक्षकों को इस बात का अंदाज़ा हो गया था कि यह बच्ची आगे चलकर बड़ा नाम करेगी। इसके बाद उन्होंने कर्नाटक संगीत की कड़ी ट्रेनिंग ली और केरल यूनिवर्सिटी से संगीत में टॉप रैंक के साथ ग्रेजुएशन पूरा किया। नेशनल टैलेंट स्कॉलरशिप ने उनके सपनों को जैसे पंख लगा दिए और फिर प्लेबैक सिंगिंग की दुनिया में उनके उस ऐतिहासिक सफर की शुरुआत हुई जिसने भारतीय संगीत का चेहरा बदल दिया।
अस्सी और नब्बे के दशक में चित्रा ने सफलता का जो मुकाम हासिल किया, वह आज के दौर के किसी भी कलाकार के लिए एक मिसाल है। उन्होंने खुद को किसी एक क्षेत्र या भाषा तक सीमित नहीं रखा, बल्कि तमिल, तेलुगु, मलयालम और हिंदी से लेकर बंगाली, गुजराती और यहाँ तक कि कई विदेशी भाषाओं में भी पच्चीस हजार से ज्यादा गाने रिकॉर्ड कर एक अटूट कीर्तिमान स्थापित किया। उनकी आवाज़ में इतनी विविधता और गहराई है कि अलग-अलग संस्कृतियों के लोग उन्हें अपनी मिट्टी की आवाज़ मानते हैं। जहाँ एक तरफ 'पिया बसंती' जैसे एलबम्स ने उन्हें उत्तर भारत के घर-घर में एक पॉप स्टार की तरह मशहूर कर दिया, वहीं दक्षिण भारत में तो वह पहले से ही एक लीजेंड के रूप में स्थापित हो चुकी थीं।
संगीत की दुनिया के सबसे बड़े दिग्गजों के साथ उनके कोलैबोरेशंस हमेशा ही चर्चा का विषय रहे हैं। ए. आर. रहमान, इलैयाराजा और एम. एम. कीरावनी जैसे महान संगीतकारों के साथ मिलकर उन्होंने ऐसे अनगिनत चार्टबस्टर गाने दिए हैं जो आज भी लोगों की प्लेलिस्ट का हिस्सा हैं। के. जे. येसुदास और एस. पी. बालासुब्रमण्यम के साथ गाए गए उनके युगल गीत आज भी संगीत प्रेमियों के लिए एक बेंचमार्क माने जाते हैं। उनके करियर का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय पल तब आया जब साल उन्नीस सौ पचानवे की फिल्म बॉम्बे का उनका गाना 'कहना ही क्या' इतना लोकप्रिय हुआ कि उसे ब्रिटेन के मशहूर अखबार 'द गार्डियन' की सुनने लायक दुनिया के एक हजार बेहतरीन गानों की लिस्ट में गौरवपूर्ण स्थान मिला।
पुरस्कारों और सम्मान के मामले में भी चित्रा का रिकॉर्ड किसी के लिए भी प्रेरणा बन सकता है। छह नेशनल अवॉर्ड्स, दस फिल्मफेयर अवॉर्ड्स साउथ और चालीस से ज्यादा राज्य पुरस्कारों के साथ उन्होंने अपनी श्रेष्ठता को बार-बार साबित किया है। भारत सरकार ने भी उनके योगदान को सराहते हुए उन्हें पद्म श्री और पद्म भूषण जैसे सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से सम्मानित किया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ब्रिटिश संसद से लेकर अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया तक उन्हें विशेष पहचान मिली है। सबसे खास बात यह है कि साल दो हजार पच्चीस में उनके सम्मान में 'के. एस. चित्रा डे' की घोषणा की गई, जो किसी भी भारतीय कलाकार के लिए एक असाधारण सम्मान है और उनकी वैश्विक पहुंच को दर्शाता है।
इस शानदार और चकाचौंध भरे करियर के पीछे कई गहरे व्यक्तिगत दर्द और संघर्ष भी छिपे रहे हैं। अपनी मासूम बेटी को खोने के असहनीय दुख के बाद भी चित्रा ने हिम्मत नहीं हारी और संगीत को ही अपना मरहम बना लिया। उन्होंने अपनी कला के जरिए लाखों लोगों को खुशी बाँटना जारी रखा और दर्द को सुरों में पिरो लेने की यही खूबी उनकी सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी। आज भी वह बड़े कॉन्सर्ट्स, रियलिटी शोज और ग्लोबल प्लेटफॉर्म्स पर उतनी ही सक्रियता के साथ नजर आती हैं और उभरते हुए गायकों के लिए एक गाइडिंग लाइट बनी हुई हैं। सच तो यह है कि चित्रा सिर्फ एक प्लेबैक सिंगर नहीं, बल्कि भारतीय संगीत की एक जीवित विरासत हैं जिनकी सुरीली विरासत कभी पुरानी नहीं होगी।

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