कोच्चि में 17 फरवरी 2017 को घटित हुई अभिनेत्री के अपहरण और यौन उत्पीड़न की वीभत्स घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। इस सनसनीखेज मामले में अब एक नया और गंभीर मोड़ आ गया है। पीड़िता ने केरल उच्च न्यायालय में एक नई याचिका दायर की है, जिसमें घटना के दौरान रिकॉर्ड किए गए और साक्ष्य के रूप में अदालत में सुरक्षित रखे गए मेमोरी कार्ड के साथ हुई कथित छेड़छाड़ की अदालत की निगरानी में नए सिरे से जांच की मांग की गई है।

सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर के माध्यम से दायर इस याचिका में पीड़िता ने पूर्व में हुई जांच के निष्कर्षों पर गंभीर सवाल उठाए हैं। पीड़िता ने अपनी याचिका में विशेष जांच दल (SIT) द्वारा फॉरेंसिक विशेषज्ञों की मौजूदगी में गहन जांच की मांग की है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि अदालत की अभिरक्षा में रखे गए मेमोरी कार्ड तक अनधिकृत पहुंच बनाकर क्या फुटेज को कॉपी किया गया, प्रसारित किया गया या लीक किया गया।

यह याचिका मुख्य रूप से जिला एवं सत्र न्यायाधीश द्वारा उच्च न्यायालय के निर्देश पर तैयार की गई उस जांच रिपोर्ट को चुनौती देती है, जिसमें बताया गया था कि मेमोरी कार्ड को मजिस्ट्रेट कोर्ट, सत्र अदालत के वरिष्ठ क्लर्क और एक अन्य क्लर्क द्वारा तीन बार एक्सेस किया गया था। पीड़िता का तर्क है कि ट्रायल कोर्ट द्वारा की गई यह तथ्यात्मक जांच न तो निष्पक्ष थी और न ही पूर्ण, जिससे यह पता नहीं चल सका कि संवेदनशील वीडियो फुटेज को लीक किया गया है या नहीं। पीड़िता ने इसे अपनी निजता, गरिमा और न्याय पाने के मौलिक संवैधानिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन बताया है।

उल्लेखनीय है कि इस मामले में एक आरोपी द्वारा यौन उत्पीड़न की घटना को रिकॉर्ड किया गया था, जिसे बाद में अलुवा मजिस्ट्रेट कोर्ट में साक्ष्य के रूप में पेश किया गया था। पीड़िता ने वर्ष 2022 में पहली बार उच्च न्यायालय में मेमोरी कार्ड तक अनधिकृत पहुंच का आरोप लगाया था, जिसके बाद अदालत ने तथ्यात्मक जांच के आदेश दिए थे। अप्रैल 2024 में उच्च न्यायालय ने पीड़िता को जांच के दौरान दर्ज किए गए बयानों की प्रतियां उपलब्ध कराने का निर्देश दिया था, लेकिन SIT जांच के प्रश्न को खुला छोड़ दिया था।

यह कानूनी घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब इस मामले में ट्रायल कोर्ट का फैसला आ चुका है, जिसमें मुख्य आरोपी अभिनेता दिलीप को बरी कर दिया गया है जबकि छह अन्य को दोषी ठहराया गया है। फिलहाल, इस फैसले के खिलाफ राज्य सरकार की अपील उच्च न्यायालय में लंबित है। पीड़िता का यह कदम न केवल न्याय के लिए जारी संघर्ष को दर्शाता है, बल्कि संवेदनशील अदालती साक्ष्यों की सुरक्षा और पारदर्शिता पर भी बड़े सवाल खड़े करता है।

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