आज भी जब कानों में 'यारों' या 'तू ही मेरी शब है' की धुन पड़ती है, तो रूह जैसे एक अलग ही दुनिया में चली जाती है। यही वजह है कि कृष्णकुमार कुन्नत यानी केके आज एक बार फिर सोशल मीडिया से लेकर म्यूजिक चार्ट्स तक हर जगह ट्रेंड कर रहे हैं। केके की आवाज़ सिर्फ सुरों का संगम नहीं थी, बल्कि वह एक गहरा एहसास थी जिसने हमारे कॉलेज के आखिरी दिनों से लेकर दिल टूटने वाली रातों तक को अपनी आवाज़ से सजाया है। साल 2022 में भले ही उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन उनका संगीत आज भी नई पीढ़ी के बीच उतना ही लोकप्रिय है जितना कि वह दो दशक पहले हुआ करता था। लोग आज भी उनकी आवाज़ की उस गहराई को तलाश रहे हैं जो सीधे दिल पर दस्तक देती है।

दिल्ली की गलियों में बड़े हुए केके का संगीत की दुनिया तक पहुँचने का सफर किसी फिल्मी कहानी से कम रोमांचक नहीं रहा। संगीत की बिना किसी औपचारिक शिक्षा के उन्होंने अपने करियर की शुरुआत विज्ञापनों के लिए जिंगल्स गाकर की थी। आपको जानकर हैरानी होगी कि इंडस्ट्री में बड़ा ब्रेक मिलने से पहले उन्होंने लगभग 3500 से ज़्यादा जिंगल्स गाए थे। हालांकि फिल्म 'माचिस' से उन्हें एक छोटी सी शुरुआत मिली, लेकिन उनकी किस्मत का सितारा फिल्म 'हम दिल दे चुके सनम' के दर्दभरे गीत 'तड़प तड़प' से चमका। इसी दौर में उनका एल्बम 'पल' रिलीज़ हुआ और इसके गानों ने उन्हें रातों-रात हर दोस्ती और प्यार का नेशनल एंथम बना दिया।

साल 2000 के दशक में केके भारतीय संगीत जगत के एक ऐसे सेंसेशन बन चुके थे जिनकी आवाज़ हर बड़े अभिनेता की पहचान बन गई थी। 'दिल चाहता है' का मस्ती भरा 'कोई कहे' हो, 'साथिया' का 'ओ हमदम' या फिर 'गैंगस्टर' का रूहानी गीत 'तू ही मेरी शब है', केके ने हर मूड को अपनी आवाज़ से जीवंत कर दिया। उनकी आवाज़ में वो गज़ब का लचीलापन था कि वह रोमांस, दर्द और मस्ती जैसे हर इमोशन को बेहद सहजता के साथ निभा ले जाते थे। यही कारण है कि संगीत के जानकारों ने उन्हें 'द मेस्मराइजर' का खिताब दिया, क्योंकि उनकी आवाज़ में वाकई एक जादुई सम्मोहन था जो सुनने वालों को बांध लेता था।

केके के बारे में सबसे दिलचस्प बात यह थी कि उन्होंने कभी किसी गुरु से संगीत नहीं सीखा, बल्कि वह किशोर कुमार को अपना आदर्श मानते थे और उन्हीं के गानों को सुन-सुनकर बड़े हुए। उनकी लाइफ फिलॉसफी बहुत ही सरल और स्पष्ट थी कि एक गायक को दिखना नहीं, बल्कि सिर्फ सुनाई देना चाहिए। शायद इसी सोच के चलते उन्होंने इतनी बड़ी शोहरत हासिल करने के बाद भी खुद को चकाचौंध और लाइमलाइट से दूर रखा और अपना पूरा ध्यान सिर्फ संगीत पर केंद्रित किया। ए. आर. रहमान से लेकर अरिजीत सिंह तक, संगीत जगत के तमाम दिग्गज आज भी उनकी बहुमुखी प्रतिभा और सादगी को सलाम करते हैं।

उनकी कला सिर्फ हिंदी भाषा तक सीमित नहीं रही, बल्कि उन्होंने तमिल, तेलुगु और कन्नड़ जैसी कई क्षेत्रीय भाषाओं में भी एक से बढ़कर एक ब्लॉकबस्टर गाने दिए। जहाँ दक्षिण भारत में उनका गाना 'अपडी पोडु' एक बहुत बड़ा क्लब एंथम बना, वहीं 'खुदा जाने' जैसे गीतों ने उन्हें बड़े अवॉर्ड्स और सम्मान दिलाए। हालांकि केके के लिए असली अवॉर्ड हमेशा उनके श्रोताओं का प्यार ही रहा। उन्होंने खुद भी कई बार यह कहा था कि उनके लिए किसी ट्रॉफी से ज़्यादा एक अच्छा गाना मायने रखता है। उनके लिए संगीत सिर्फ पेशा नहीं, बल्कि उनकी आत्मा की आवाज़ थी जिसे उन्होंने ताउम्र संजो कर रखा।

31 मई 2022 को कोलकाता में एक लाइव कॉन्सर्ट के दौरान आखिरी बार अपनी आवाज़ का जादू बिखेरते हुए उन्होंने अंतिम सांस ली। भले ही वह शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन 'कल हो ना हो' की फिलॉसफी को अपनी आवाज़ से अमर करने वाले केके आज भी हर प्लेलिस्ट का हिस्सा हैं। उनकी आवाज़ का टाइमलेस होना इस बात का सबूत है कि जब कोई कलाकार पूरी ईमानदारी के साथ अपनी कला को जीता है, तो वह वक्त की सीमाओं से परे हो जाता है। आज हर कोई इसीलिए उनके बारे में बात कर रहा है क्योंकि उनकी आवाज़ में वो सुकून मिलता है जो आज के शोर-शराबे वाले दौर में कहीं खो गया है।

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Pratahkal Newsroom

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