कौन हैं कविता कृष्णमूर्ति? वो सुरीली आवाज़ जिसने 90 के दशक को 'गोल्डन एरा' बना दिया
पार्श्व गायिका कविता कृष्णमूर्ति के प्रारंभिक संघर्ष, पार्श्व गायन में सफलता और पद्म श्री सहित उनके प्रमुख पुरस्कारों का विस्तृत विवरण।

संगीत कार्यक्रम के दौरान मंच पर प्रस्तुति देतीं सुप्रसिद्ध पार्श्व गायिका कविता कृष्णमूर्ति, जिन्होंने चार दशकों से भारतीय फिल्म संगीत में योगदान दिया है।
आज जब भी 90 के दशक के उन सदाबहार गानों का जिक्र छिड़ता है जो वक्त के साथ और भी बेहतरीन होते जा रहे हैं, तो जेहन में सबसे पहला नाम कविता कृष्णमूर्ति का आता है। उनकी आवाज़ में वो जादुई कशिश है जो आज के डिजिटल युग और स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स पर भी लाखों दिलों को धड़कने पर मजबूर कर देती है। हवा हवाई से लेकर डोला रे डोला तक, उनकी गायकी सिर्फ फिल्मी गाने नहीं थे बल्कि एक पूरे दौर की धड़कन बन गए थे। यही वजह है कि आज की नई पीढ़ी भी उन्हें बड़े चाव से डिस्कवर कर रही है और पुराने संगीत प्रेमी तो उन्हें हमेशा से ही अपनी यादों में संजोए बैठे हैं।
दिल्ली के एक साधारण परिवार में जन्मी शारदा कृष्णमूर्ति का शुरुआती सपना संगीत की दुनिया में नाम कमाना नहीं, बल्कि इंडियन फॉरेन सर्विसेज में जाकर देश की सेवा करना था। लेकिन नियति ने उनके लिए कुछ और ही शानदार लिखकर रखा था। बचपन से ही शास्त्रीय संगीत की तालीम और विभिन्न प्रतियोगिताओं में पदक जीतने वाली कविता के लिए मुंबई की ये भागदौड़ और स्ट्रगल बिल्कुल आसान नहीं था। कॉलेज के दिनों में मिले एक छोटे से मौके ने उनकी पूरी जिंदगी की दिशा बदल दी, जब उन्हें इंडस्ट्री के दिग्गज कलाकारों के साथ सुर मिलाने का अवसर प्राप्त हुआ। एक डबिंग आर्टिस्ट के रूप में शुरुआत कर प्लेबैक सिंगर बनने तक का उनका यह सफर कड़ी मेहनत और अटूट समर्पण की एक मिसाल है।
कविता कृष्णमूर्ति के करियर का असली टर्निंग पॉइंट 80 के दशक के मध्य में आया, लेकिन उनकी लोकप्रियता का असली धमाका मिस्टर इंडिया के गाने हवा हवाई के साथ हुआ। इस एक गाने ने उन्हें रातों-रात पूरे देश की सेंसेशन बना दिया। इसके बाद 90 के दशक में तो जैसे उन्होंने चार्टबस्टर्स की झड़ी लगा दी थी। प्यार हुआ चुपके से, मेरा पिया घर आया और आज मैं ऊपर जैसे गानों ने साबित कर दिया कि उनकी आवाज में हर मूड और हर स्टाइल को निभाने की गजब की क्षमता है। ए आर रहमान और इस्माइल दरबार जैसे दिग्गज संगीतकारों के साथ काम करते हुए उन्होंने अपनी गायकी को एक अलग ही ऊंचे मुकाम पर पहुँचाया।
उनकी सबसे बड़ी खूबी उनकी वर्सटैलिटी और निडर होकर नए प्रयोग करना रहा है। उन्होंने खुद को सिर्फ बॉलीवुड तक सीमित नहीं रखा, बल्कि क्लासिकल, पॉप, फ्यूजन और भक्ति संगीत जैसे हर जॉनर में अपनी गहरी छाप छोड़ी। रॉयल अल्बर्ट हॉल से लेकर मैडिसन स्क्वायर गार्डन तक, उनकी आवाज़ दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित मंचों पर गूंजी है। इतना ही नहीं, उन्होंने विदेशी कलाकारों के साथ मिलकर कई बेहतरीन कोलैबोरेशंस किए और भारतीय संगीत की मिठास को वैश्विक दर्शकों तक पहुंचाया। उनकी कलाकारी की सीमाएं कभी किसी एक दायरे में नहीं बंधीं।
पुरस्कारों की बात करें तो उनकी उपलब्धियों की फेहरिस्त बहुत लंबी और गौरवशाली है। लगातार तीन साल तक फिल्मफेयर का बेस्ट फीमेल प्लेबैक सिंगर अवॉर्ड जीतना कोई साधारण बात नहीं है, और भारत सरकार द्वारा पद्म श्री से सम्मानित किया जाना उनके संगीत के प्रति योगदान पर मुहर लगाता है। डोला रे डोला जैसे कल्ट गानों के जरिए आज भी नई पीढ़ी से जुड़े रहना यह दिखाता है कि उनका जादू कभी फीका नहीं पड़ने वाला। हाल ही में मिले लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड्स इस बात का सबूत हैं कि कविता कृष्णमूर्ति सिर्फ एक गायिका नहीं, बल्कि भारतीय संगीत जगत की एक चलती-फिरती विरासत हैं।
आज कविता कृष्णमूर्ति भारतीय संगीत का वो अध्याय बन चुकी हैं जिसे पढ़े बिना बॉलीवुड का इतिहास अधूरा है। उनकी आवाज़ में पुरानी यादों का वो सुरीला अहसास भी है, क्लासिकल संगीत की गरिमा भी है और वो दुर्लभ भाव भी, जो हर उम्र के इंसान को जोड़ देता है। इसलिए आज भी जब संगीत के गलियारों में असली मेलोडी की तलाश होती है, तो जवाब के तौर पर उनकी आवाज़ खुद-ब-खुद कानों में गूंजने लगती है। उनकी यह विरासत आने वाली कई सदियों तक संगीत प्रेमियों का मार्गदर्शन करती रहेगी।

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