चेन्नई: भारतीय संगीत जगत के दिग्गजों में शुमार संगीत उस्ताद इलैयाराजा के फिल्मी सफर ने एक ऐतिहासिक मील का पत्थर छू लिया है। पांच दशक, हजारों गाने और अनगिनत यादों को समेटे इस महान संगीतकार ने आज भी संगीत के प्रति अपने उसी दृष्टिकोण को बरकरार रखा है, जो उनके करियर की शुरुआत में था। 14 मई को उनकी पहली आधिकारिक फिल्म 'अन्नाकिली' (Annakili) के प्रदर्शन के 50 वर्ष पूरे होने के अवसर पर, इस मेस्ट्रो ने आर बाल्की की आगामी तमिल फिल्म की रिकॉर्डिंग से विशेष ब्रेक लिया और चेन्नई में मीडिया से रूबरू हुए। इस दौरान उन्होंने फिल्मी संगीत में अपने 50 साल पूरे होने और लोगों के साथ अपने काम के भावनात्मक जुड़ाव पर खुलकर बात की।

50 साल का ऐतिहासिक मील का पत्थर और शुरुआती सफर

इस ऐतिहासिक 50 साल के मील के पत्थर पर अपने विचार साझा करते हुए इलैयाराजा ने कहा कि यह दुनिया के लिए 50 साल हो सकते हैं, लेकिन उन्हें खुद ऐसा बिल्कुल महसूस नहीं होता। उन्होंने भावुक होकर कहा कि साल भले ही बीत गए हों, लेकिन वह आज भी वही व्यक्ति हैं जो करियर की शुरुआत के समय थे। उन्होंने पूरे आत्मविश्वास के साथ यह भी जोड़ा कि हर कोई यह अच्छी तरह जानता है कि जब वह इस दुनिया में नहीं रहेंगे, तब भी लोग उन्हें इसी तरह याद करेंगे और उनका जश्न मनाएंगे।

अपने शुरुआती वर्षों और संघर्ष के दिनों को याद करते हुए संगीतकार ने बताया कि उन्होंने उद्योग में आने के बाद विजया भास्कर, देवराजन मास्टर, दक्षिणमूर्ति स्वामी, सलिल चौधरी, केवी महादेवन और एमएस विश्वनाथन जैसे महान दिग्गजों के ऑर्केस्ट्रा में विभिन्न वाद्ययंत्र बजाए थे। इसके अलावा, उन्होंने प्रसिद्ध संगीतकार जीके वेंकटेश के साथ लगभग 250 फिल्मों में काम किया। उस दौर में एल वैद्यनाथन और वह स्वयं मिलकर जीके वेंकटेश की सहायता करते थे और उनके गीतों की पूरी योजना बनाकर उन्हें रिकॉर्ड करने का जिम्मा संभालते थे।

'इसाई कडावुल' (संगीत के भगवान) की उपाधि और संगीत रचना का अनुभव

प्रशंसकों द्वारा उन्हें 'इसाई कडावुल' यानी 'संगीत का भगवान' कहे जाने पर इलैयाराजा ने बेहद विनम्रता से जवाब दिया। उन्होंने कहा कि लोग उन्हें उस रूप में देखते हैं, लेकिन क्या भगवान कभी खुद को भगवान समझता है? बिल्कुल नहीं। उन्होंने कहा कि यदि लोग उन्हें संगीत का भगवान मानते हैं, तो उन्हें मानने दें, इससे उन्हें कोई शिकायत नहीं है। यह सम्मान वास्तव में उनके प्रति लोगों के गहरे प्यार को दर्शाता है। एक अनोखा उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि एक मां ने उनसे साझा किया था कि उनके गर्भ में पल रहे बच्चे ने केवल इलैयाराजा का गाना सुनकर ही हलचल (किक) की, जबकि किसी अन्य गाने पर ऐसा नहीं हुआ। इस पर उस्ताद ने स्पष्ट किया कि उन्होंने जानबूझकर ऐसा होने के लिए संगीत नहीं बनाया था; उन्होंने केवल उन्हें दी गई फिल्म की स्थिति और दृश्य के अनुसार संगीत तैयार किया था। उनके अनुसार, स्वर हमेशा एक बेहद पवित्र स्थान से जीवंत होते हैं और जब वह संगीत की रचना करते हैं, तो उनके दिमाग में कुछ और नहीं होता, वह पूरी तरह से शून्य या खाली होता है।

एक स्वतंत्र संगीतकार बनने के अपने शुरुआती अनुभवों को याद करते हुए उन्होंने बताया कि जब उन्हें उनकी पहली फिल्म का प्रस्ताव मिला था, तब वह गहराई से सोचने लगे थे कि गीत की शुरुआत कहाँ से की जाए और क्या किया जाए। यद्यपि उन्होंने पहले से ही कई फिल्मों में एक सहायक के रूप में व्यापक काम किया था, लेकिन जब वह खुद का स्वतंत्र संगीत तैयार करने के लिए आगे बढ़े, तो उन्हें ऐसा महसूस हुआ जैसे उन्हें किसी घने जंगल में बिल्कुल अकेला छोड़ दिया गया हो। यह गहरा अहसास और समर्पण ही है जो आज पांच दशकों के बाद भी उनके संगीत को अमर बनाए हुए है।

Pratahkal Newsroom

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