कौन हैं ऋषिकेश मुखर्जी? जिन्होंने बॉलीवुड को दिल से जीना सिखाया
केमिस्ट्री शिक्षक से करियर की शुरुआत करने वाले ऋषिकेश मुखर्जी ने 'मिडिल सिनेमा' के जरिए हिंदी फिल्मों में आम आदमी के जीवन और रिश्तों को नई पहचान दी।

फिल्म निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी मुंबई में एक स्टूडियो के भीतर एडिटिंग टेबल पर काम करते हुए, जिन्होंने आनंद और गोलमाल जैसी कालजयी फिल्में बनाईं।
आज जब सोशल मीडिया पर क्लासिक फिल्मों की बात होती है, तो एक नाम बार-बार ट्रेंड करता दिखाई देता है — Hrishikesh Mukherjee। कोई “आनंद” के इमोशनल डायलॉग्स शेयर कर रहा है, कोई “गोलमाल” की कॉमिक टाइमिंग पर रील बना रहा है, तो कोई “चुपके चुपके” की मासूम कॉमेडी को आज के दौर से बेहतर बता रहा है। यही वजह है कि दशकों बाद भी ऋषिकेश मुखर्जी का सिनेमा लोगों के दिलों में जिंदा है। उन्हें प्यार से “हृषि दा” कहा जाता था और उन्होंने हिंदी सिनेमा को ऐसा मिडिल क्लास हीरो दिया, जो ना सुपरमैन था और ना ही बहुत बड़ा विद्रोही, बल्कि बिल्कुल आम इंसान था।
30 सितंबर 1922 को कोलकाता में जन्मे ऋषिकेश मुखर्जी ने शुरुआत फिल्मों से नहीं, बल्कि साइंस और मैथ्स पढ़ाने से की थी। केमिस्ट्री में ग्रेजुएशन करने के बाद उन्होंने कुछ समय तक अध्यापन किया, लेकिन किस्मत उन्हें फिल्मों की दुनिया में खींच लाई। कोलकाता के न्यू थिएटर्स में उन्होंने कैमरा और एडिटिंग का काम सीखा और फिर मुंबई आकर दिग्गज फिल्ममेकर Bimal Roy के साथ जुड़ गए। “दो बीघा ज़मीन”, “देवदास” और “मधुमती” जैसी फिल्मों में एडिटर और असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर काम करते हुए उन्होंने सिनेमा की बारीकियां समझीं। उनकी पहली डायरेक्टोरियल फिल्म “मुसाफिर” भले बड़ी हिट नहीं बनी, लेकिन “अनाड़ी” ने उन्हें रातोंरात चर्चा में ला दिया।
ऋषिकेश मुखर्जी की सबसे बड़ी ताकत थी उनकी कहानी कहने की शैली। उन्होंने ना तो मेनस्ट्रीम सिनेमा की चकाचौंध अपनाई और ना ही आर्ट फिल्मों की भारी गंभीरता। उन्होंने दोनों के बीच एक ऐसा रास्ता बनाया जिसे आज “मिडिल सिनेमा” कहा जाता है। “आनंद”, “अभिमान”, “बावर्ची”, “गुड्डी”, “सत्यकाम”, “अनुपमा”, “मिली” और “नमक हराम” जैसी फिल्मों में रिश्तों, अकेलेपन, सपनों और जिंदगी की छोटी-छोटी खुशियों को बेहद खूबसूरती से दिखाया गया। उनकी फिल्मों के किरदार इतने असली लगते थे कि दर्शकों को उनमें खुद की झलक दिखाई देती थी। यही वजह है कि उनका सिनेमा समय के साथ पुराना नहीं हुआ, बल्कि और ज्यादा प्रासंगिक बनता गया।
कॉमेडी की बात करें तो ऋषिकेश मुखर्जी का मुकाबला आज भी मुश्किल माना जाता है। “चुपके चुपके”, “गोलमाल”, “खूबसूरत” और “किसी से ना कहना” जैसी फिल्मों ने साबित कर दिया कि बिना डबल मीनिंग और शोर-शराबे के भी शानदार कॉमेडी बनाई जा सकती है। उन्होंने Dharmendra को पहली बार कॉमिक रोल में पेश किया और दर्शक हैरान रह गए कि एक एक्शन हीरो इतना मजेदार भी हो सकता है। वहीं Amitabh Bachchan को “आनंद” के जरिए नई पहचान मिली। Jaya Bhaduri को “गुड्डी” में लॉन्च करना भी उनके करियर का बड़ा फैसला था। उन्होंने लगभग हर बड़े स्टार के साथ काम किया, लेकिन उनकी फिल्मों का असली हीरो हमेशा कहानी और भावनाएं रहीं।
सिर्फ डायरेक्टर ही नहीं, ऋषिकेश मुखर्जी एक शानदार एडिटर और लेखक भी थे। उन्होंने अपने करियर में 42 फिल्में बनाईं और आठ फिल्मफेयर अवॉर्ड जीते। “आनंद” और “खूबसूरत” जैसी फिल्मों ने बेस्ट फिल्म का सम्मान हासिल किया, जबकि “अनुराधा”, “अनुपमा”, “आशीर्वाद”, “सत्यकाम” और “आनंद” को नेशनल अवॉर्ड्स मिले। भारत सरकार ने उन्हें 1999 में दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड और 2001 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया। वह सीबीएफसी और एनएफडीसी के चेयरमैन भी रहे। उनके काम का असर इतना गहरा था कि इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ इंडिया ने भी उनकी फिल्मों का विशेष रेट्रोस्पेक्टिव आयोजित किया।
जिंदगी के आखिरी दिनों में ऋषिकेश मुखर्जी किडनी की बीमारी से जूझ रहे थे, लेकिन सिनेमा के लिए उनका प्यार कभी कम नहीं हुआ। 27 अगस्त 2006 को उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा, मगर उनकी फिल्में आज भी हर पीढ़ी को जिंदगी समझना सिखाती हैं। शायद यही वजह है कि जब भी भारतीय सिनेमा के सबसे ईमानदार फिल्ममेकर्स की बात होती है, तो हृषि दा का नाम सबसे ऊपर आता है। उन्होंने सिर्फ फिल्में नहीं बनाईं, बल्कि आम लोगों की भावनाओं को पर्दे पर अमर कर दिया।

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