क्यों फिरोज खान के पाकिस्तान जाने पर लगी थी रोक? 17वीं पुण्यतिथि पर जानिए उनके अनसुने किस्से
फिरोज खान की 17वीं पुण्यतिथि पर जानिए उनके जीवन, करियर और विवादों की पूरी कहानी। ‘क्लिंट ईस्टवुड ऑफ इंडिया’ कहे जाने वाले इस दिग्गज अभिनेता-निर्देशक ने हिंदी सिनेमा में स्टाइल, साहस और अंतरराष्ट्रीय पहचान की नई मिसाल कायम की।

अभिनेता और निर्देशक फिरोज खान
भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ नाम केवल अभिनेता नहीं होते, बल्कि एक दौर, एक अंदाज़ और एक अलग पहचान बन जाते हैं। फिरोज खान उन्हीं चुनिंदा शख्सियतों में शामिल थे, जिनकी मौजूदगी ने बॉलीवुड को एक नया स्टाइल, नई ऊर्जा और अंतरराष्ट्रीय आकर्षण दिया। 27 अप्रैल 2009 को जब उन्होंने अंतिम सांस ली, तब हिंदी सिनेमा ने अपने सबसे करिश्माई और साहसी कलाकारों में से एक को खो दिया। आज, 27 अप्रैल 2026 को उनकी 17वीं पुण्यतिथि पर, उनका जीवन और योगदान एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है।
25 सितंबर 1939 को बेंगलुरु में जन्मे फिरोज खान का असली नाम जुल्फिकार अली शाह खान था। उनके पिता सादिक अली खान अफगानिस्तान के गजनी से थे, जबकि उनकी मां फातिमा का संबंध ईरानी मूल से था। शुरुआती जीवन में खुद को ‘बागी’ बताने वाले फिरोज खान को तीन स्कूलों से निकाला गया, लेकिन उन्होंने अपने सपनों को नहीं छोड़ा और मुंबई का रुख किया, जहां उन्होंने फिल्मी दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई।
1960 में फिल्म ‘दीदी’ से अपने करियर की शुरुआत करने वाले फिरोज खान ने शुरुआती वर्षों में कई छोटे बजट की फिल्मों में काम किया। 1965 में ‘ऊंचे लोग’ और ‘आरज़ू’ जैसी फिल्मों ने उन्हें पहचान दिलाई और वे धीरे-धीरे मुख्यधारा के सितारों में शामिल हो गए। 1969 में ‘आदमी और इंसान’ के लिए उन्हें फिल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता पुरस्कार मिला, जिसने उनके अभिनय कौशल को आधिकारिक मान्यता दी।
1970 और 1980 के दशक में फिरोज खान ने केवल अभिनय तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि निर्देशन और निर्माण में भी अपनी छाप छोड़ी। 1971 में ‘अपराध’ के जरिए उन्होंने निर्देशन की शुरुआत की, जो जर्मनी में ऑटो रेसिंग को दिखाने वाली पहली भारतीय फिल्म थी। 1975 में ‘धर्मात्मा’ ने उन्हें एक सफल निर्माता-निर्देशक के रूप में स्थापित किया। यह फिल्म अफगानिस्तान में शूट होने वाली पहली भारतीय फिल्म थी और हॉलीवुड की प्रसिद्ध फिल्म ‘द गॉडफादर’ से प्रेरित थी।
1980 में आई ‘कुर्बानी’ उनके करियर की सबसे बड़ी सफलता साबित हुई। इस फिल्म ने न केवल बॉक्स ऑफिस पर रिकॉर्ड बनाए, बल्कि पाकिस्तानी पॉप सिंगर नाज़िया हसन को भी ‘आप जैसा कोई’ जैसे यादगार गीत के साथ नई पहचान दी। इसके बाद ‘जांबाज़’ और ‘दयावान’ जैसी फिल्मों ने उनके निर्देशन कौशल को और मजबूत किया।
फिरोज खान ने अपने बेटे फरदीन खान को 1998 में ‘प्रेम अगन’ के जरिए लॉन्च किया, हालांकि यह फिल्म सफल नहीं रही। 2003 में ‘जानशीं’ के साथ उन्होंने निर्देशन और अभिनय में वापसी की। 2007 में आई सुपरहिट फिल्म ‘वेलकम’ में उनका आखिरी अभिनय दर्शकों को लंबे समय तक याद रहा, खासकर उनका डायलॉग “अभी हम ज़िंदा है” आज भी लोकप्रिय है।
व्यक्तिगत जीवन में फिरोज खान ने 1965 में सुंदरी खान से विवाह किया, जो एक सिंधी हिंदू परिवार से थीं। उनके दो बच्चे हैं लैला खान और फरदीन खान। लैला का विवाह व्यवसायी फरहान फर्नीचरवाला से हुआ, जबकि फरदीन ने अभिनेत्री मुमताज की बेटी नताशा माधवानी से शादी की। 2006 में पाकिस्तान यात्रा के दौरान उनके बयान ने विवाद भी खड़ा किया, जब उन्होंने भारत की धर्मनिरपेक्षता और प्रगति पर टिप्पणी की थी। उस समय पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने प्रतिक्रिया देते हुए उन्हें भविष्य में वीजा न देने की बात कही थी।
जीवन के अंतिम वर्षों में फिरोज खान फेफड़ों के कैंसर से जूझ रहे थे, जिसकी जानकारी उन्होंने सार्वजनिक रूप से नहीं दी। 27 अप्रैल 2009 को बेंगलुरु स्थित अपने फार्महाउस में उन्होंने अंतिम सांस ली। उनका अंतिम संस्कार होसुर रोड स्थित शिया कब्रिस्तान में उनकी मां की कब्र के पास किया गया। फिरोज खान का जीवन केवल फिल्मों तक सीमित नहीं था, बल्कि वह एक ऐसी यात्रा थी जिसमें संघर्ष, सफलता, स्टाइल और साहस का अनूठा संगम देखने को मिला। उनकी विरासत आज भी हिंदी सिनेमा में जीवित है, और हर नई पीढ़ी उनके अंदाज़ और योगदान से प्रेरणा लेती रहेगी।

Manyaa Chaudhary
यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।
