'दिल' फिल्म के 36 साल पूरे होने पर निर्देशक इंद्र कुमार ने आमिर-माधुरी की कास्टिंग और अपनी पहली फिल्म से जुड़ी अनकही यादें ताजा की हैं। जानिए, कैसे ईमानदारी और दृढ़ विश्वास ने इस फिल्म को भारतीय सिनेमा का कालजयी रोमांस बना दिया।

तस्वीर में फिल्म 'दिल' के मुख्य कलाकार आमिर खान और माधुरी दीक्षित हैं। रिलीज के 36 साल बाद निर्देशक इंद्र कुमार ने कास्टिंग और फिल्म की सफलता पर चर्चा की।
हिंदी सिनेमा के कालजयी रोमांस का पर्याय बन चुकी फिल्म 'दिल' को आज 36 साल पूरे हो गए हैं। वर्ष 1990 में रिलीज हुई इस फिल्म ने न केवल बॉक्स ऑफिस पर सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किए, बल्कि निर्देशक इंद्र कुमार को फिल्म उद्योग में एक विशिष्ट पहचान दिलाई। अपनी इस ब्लॉकबस्टर शुरुआत और 'बेटा' व 'राजा' जैसी सफलताओं के बाद, इंद्र कुमार ने फिल्म निर्माण में अपनी सहज प्रवृत्तियों पर भरोसा करने की वकालत की है। फिल्म की 36वीं वर्षगांठ के अवसर पर, निर्देशक ने उन कहानियों को साझा किया है जिन्होंने उन्हें और इस फिल्म को दर्शकों के दिलों के करीब ला खड़ा किया।
फिल्म की कास्टिंग पर बात करते हुए इंद्र कुमार ने 'वैरायटी इंडिया' के साथ एक बातचीत में स्पष्ट किया कि आमिर खान और माधुरी दीक्षित ही उनकी पहली और एकमात्र पसंद थे। उन्होंने बताया कि आमिर को 'कयामत से कयामत तक' (1988) की रिलीज के तुरंत बाद साइन कर लिया गया था, हालांकि फिल्म को पूरा करने में उन्हें दो साल का समय लगा। इस दौरान आमिर की अन्य फिल्में रिलीज हुईं, जो व्यावसायिक रूप से सफल नहीं रहीं, लेकिन इंद्र कुमार का अपने नायक पर अटूट विश्वास बना रहा। उन्होंने जोर देकर कहा कि हर अभिनेता के करियर में एक चुनौतीपूर्ण दौर आता है और 'दिल' की सफलता ने यह साबित कर दिया।
इंद्र कुमार 'दिल' को अपने निर्देशन करियर का 'पहला प्यार' मानते हैं। उनका मानना है कि फिल्म की ईमानदारी और शुद्धता ही वह तत्व था, जो पर्दे पर दिखाई दिया। निर्देशक ने वर्तमान फिल्म निर्माण की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए सलाह दी कि किसी भी सफल फिल्म को दोहराने की कोशिश करना घातक सिद्ध हो सकता है। उनका मानना है कि फिल्म निर्माताओं को अपनी कहानियों पर ईमानदारी से काम करना चाहिए और दूसरों को खुश करने के बजाय स्वयं के विचारों पर विश्वास करना चाहिए।
फिल्म 'दिल' की पटकथा राजा और मधु की प्रेम कहानी के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसमें उनके परिवारों के बीच का संघर्ष मुख्य बाधा बनता है। राजा के पिता हजारीप्रसाद (अनुपम खेर) एक मध्यमवर्गीय कबाड़ व्यापारी हैं, जबकि मधु के पिता मिस्टर मेहरा (सईद जाफरी) एक धनाढ्य व्यवसायी हैं। हजारीप्रसाद द्वारा खुद को अमीर साबित करने का ढोंग और उसके बाद सगाई में हुए खुलासे ने फिल्म में नाटकीय मोड़ पैदा किए। अंततः, राजा और मधु का अडिग प्रेम ही उनके पिताओं के दिलों को पिघलाने और उनके मिलन का मार्ग प्रशस्त करने में सफल रहा। 36 वर्षों बाद भी यह फिल्म भारतीय सिनेमा में शुद्ध प्रेम और पारिवारिक ड्रामा का एक उत्कृष्ट उदाहरण बनी हुई है।

