भारतीय सिनेमा की भव्य इमारत जिस नींव पर खड़ी है, वह नींव 16 फरवरी 1944 को मौन हो गई थी। आज दादासाहेब फाल्के की 78वीं पुण्यतिथि पर पूरा देश उस व्यक्तित्व को स्मरण कर रहा है, जिसने न केवल भारत की पहली फीचर फिल्म बनाई, बल्कि एक संपूर्ण उद्योग की आधारशिला रखी। धुंडीराज गोविंद फाल्के, जिन्हें स्नेहपूर्वक दादासाहेब फाल्के कहा जाता है, भारतीय चलचित्र इतिहास में एक युग का नाम हैं।



प्रारंभिक जीवन और कलात्मक पृष्ठभूमि:

30 अप्रैल 1870 को बंबई प्रेसीडेंसी के त्र्यंबकेश्वर (त्र्यंबक) में एक मराठी भाषी चितपावन ब्राह्मण परिवार में जन्मे फाल्के का प्रारंभिक जीवन कला और संस्कृति के वातावरण में बीता। उनके पिता गोविंद सदाशिव फाल्के, जिन्हें दाजीशास्त्री के नाम से जाना जाता था, संस्कृत के विद्वान और धर्माचार्य थे, जबकि उनकी माता द्वारकाबाई गृहिणी थीं। कला के प्रति उनके झुकाव ने उन्हें 1885 में सर जे. जे. स्कूल ऑफ आर्ट, बंबई तक पहुंचाया, जहां उन्होंने चित्रांकन का एक वर्षीय पाठ्यक्रम पूरा किया। इसके बाद वे बड़ौदा के कला भवन (महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय, बड़ौदा) से जुड़े और 1890 में तेल चित्रकला और जलरंग में दक्षता प्राप्त की। वास्तुकला और मॉडलिंग में भी उन्होंने विशेष योग्यता हासिल की।

तकनीकी नवाचार में उनकी रुचि इतनी गहरी थी कि उन्होंने फोटोग्राफी, हाफ-टोन ब्लॉक निर्माण, फोटो-लिथो, कोलोटाइप और डार्करूम तकनीकों का विशेष प्रशिक्षण लिया। 1892 के अहमदाबाद औद्योगिक प्रदर्शनी में आदर्श रंगमंच का मॉडल तैयार करने पर उन्हें स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया। यह वही दौर था जब उन्होंने एक फिल्म कैमरा खरीदा और चलचित्रों के प्रयोगों की शुरुआत की एक ऐसा कदम, जिसने भारतीय सिनेमा का भविष्य बदल दिया।


1911 से 1917 का समय फाल्के के संघर्ष, प्रयोग और अभूतपूर्व सफलता का काल रहा। 1913 में उनकी पहली फीचर फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ प्रदर्शित हुई। यह भारत की पहली पूर्ण लंबाई की मूक पौराणिक फिल्म मानी जाती है। फिल्म की सफलता ने यह सिद्ध कर दिया कि भारतीय दर्शक अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी कहानियों को बड़े पर्दे पर देखना चाहते हैं। यही वह क्षण था, जिसने भारतीय फिल्म उद्योग के जन्म की घोषणा की।

राजा हरिश्चंद्र (1913)


इसके बाद उन्होंने ‘मोहिनी भस्मासुर’ (1913), ‘सत्यवान सावित्री’ (1914), ‘लंका दहन’ (1917), ‘श्रीकृष्ण जन्म’ (1918) और ‘कालिया मर्दन’ (1919) जैसी कई पौराणिक फिल्मों का निर्माण किया। उनकी फिल्मों में तकनीकी प्रयोग, विशेष प्रभावों का अभिनव उपयोग और कथानक की सशक्त प्रस्तुति देखने को मिलती है। वे निर्देशन, संपादन, सेट डिजाइन और मेकअप जैसे कई विभागों की जिम्मेदारी स्वयं निभाते थे। 1918 से 1922 के बीच उन्होंने ‘हिंदुस्तान सिनेमा फिल्म्स कंपनी’ के माध्यम से संगठित फिल्म निर्माण को गति दी। लगभग दो दशकों के अपने करियर में उन्होंने 94 फीचर फिल्मों और 27 लघु फिल्मों का निर्माण किया एक ऐसा रिकॉर्ड, जिसने उन्हें भारतीय सिनेमा का अग्रदूत बना दिया।

सत्यवान और सरस्वती (1914)


भारतीय सिनेमा में उनके ऐतिहासिक योगदान को मान्यता देते हुए भारत सरकार ने उनके सम्मान में ‘दादासाहेब फाल्के पुरस्कार’ की स्थापना की। यह पुरस्कार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों के अंतर्गत दिया जाता है और भारतीय सिनेमा में आजीवन योगदान के लिए सर्वोच्च सम्मान माना जाता है।

आज, 78वीं पुण्यतिथि पर दादासाहेब फाल्के को स्मरण करना केवल एक औपचारिक श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि उस दृष्टा को नमन है जिसने भारतीय संस्कृति, पौराणिक कथाओं और तकनीकी नवाचार को एक साथ जोड़कर एक ऐसे उद्योग की रचना की, जो आज विश्व मंच पर अपनी पहचान बना चुका है। भारतीय सिनेमा की हर नई उपलब्धि में उनके साहस, प्रयोगधर्मिता और दूरदृष्टि की गूंज सुनाई देती है।

Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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