तेलुगु सिनेमा का नाम आते ही अगर किसी चेहरे पर सबसे पहले मुस्कान आ जाती है, तो वो हैं ब्रह्मानंदम। सोशल मीडिया पर उनके मीम्स से लेकर फिल्मों के आइकॉनिक सीन तक आज भी वायरल रहते हैं। एक ऐसा कलाकार जिसने सिर्फ कॉमेडी नहीं की, बल्कि हर किरदार में ऐसा टाइमिंग और एक्सप्रेशन दिया कि लोग उन्हें “कॉमेडी का यूनिवर्सिटी” कहने लगे। 1000 से ज्यादा फिल्मों में काम करके गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड अपने नाम करना कोई मामूली बात नहीं है, और यही वजह है कि आज भी उनकी चर्चा हर फिल्मी बहस में जरूर होती है।

1 फरवरी 1956 को आंध्र प्रदेश के एक साधारण परिवार में जन्मे ब्रह्मानंदम का सफर बिल्कुल फिल्मी कहानी जैसा रहा। उनके पिता बढ़ई थे और घर में आठ बच्चे थे। पढ़ाई में अच्छे ब्रह्मानंदम ने मास्टर ऑफ आर्ट्स की डिग्री हासिल की और फिर तेलुगु लेक्चरर बन गए। लेकिन किस्मत ने उनके लिए कुछ और ही सोच रखा था। कॉलेज में पढ़ाने के साथ-साथ वे थिएटर और मिमिक्री किया करते थे। उनकी आवाज़ और चेहरे के एक्सप्रेशन इतने अलग थे कि दूरदर्शन के शो ‘पकापकालु’ में आते ही लोग उन्हें पहचानने लगे। यही शो उनकी जिंदगी का टर्निंग पॉइंट बना और मशहूर निर्देशक जांध्याला ने उन्हें ‘आहा ना पेल्लांटा!’ में मौका दिया। बस यहीं से शुरू हुआ वो सफर जिसने भारतीय कॉमेडी को हमेशा के लिए बदल दिया।

90 के दशक में ब्रह्मानंदम सिर्फ एक कॉमेडियन नहीं रहे, बल्कि फिल्मों की सफलता की गारंटी बन गए। ‘मनी’ में खान दादा का किरदार आज भी लोगों की फेवरेट कॉमिक परफॉर्मेंस में गिना जाता है। ‘यमलीला’, ‘जंबा लकिडी पंबा’, ‘हैलो ब्रदर’, ‘बावागारू बागुन्नारा’, ‘मनमधुडु’, ‘धी’ और ‘रेस गुर्रम’ जैसी फिल्मों में उनका अंदाज इतना अलग था कि कई बार हीरो से ज्यादा तालियां उन्हें मिलीं। खास बात ये रही कि उन्होंने सिर्फ हल्के-फुल्के रोल ही नहीं किए, बल्कि इमोशनल और इंटेंस किरदारों में भी अपनी एक्टिंग का दम दिखाया। यही वजह है कि दर्शक उन्हें सिर्फ कॉमेडियन नहीं बल्कि एक कम्प्लीट अभिनेता मानते हैं।

ब्रह्मानंदम की सबसे बड़ी ताकत उनका फेस एक्सप्रेशन और डायलॉग डिलीवरी रही है। बिना ज्यादा बोले सिर्फ एक नजर या रिएक्शन से लोगों को हंसाना हर किसी के बस की बात नहीं होती। आज के मीम कल्चर में उनके सीन इंटरनेट की जान बन चुके हैं। चाहे कोई फनी रिएक्शन हो या किसी मैच का मजेदार मोमेंट, ब्रह्मानंदम के एक्सप्रेशन हर जगह फिट बैठ जाते हैं। नई पीढ़ी भले उनकी पुरानी फिल्में न देखी हो, लेकिन मीम्स के जरिए वो उन्हें रोज देखती है। यही उनकी पॉप कल्चर में असली ताकत है।

सम्मानों की बात करें तो ब्रह्मानंदम ने अपने करियर में वो मुकाम हासिल किया है जिसका सपना हर कलाकार देखता है। भारत सरकार ने उन्हें 2009 में पद्मश्री से सम्मानित किया। छह नंदी अवॉर्ड, कई फिल्मफेयर अवॉर्ड और साउथ इंडियन इंटरनेशनल मूवी अवॉर्ड्स उनके नाम हैं। हाल ही में ‘रंगा मार्तांडा’ के लिए उन्हें बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का बड़ा सम्मान भी मिला। इतने सालों बाद भी उनका स्क्रीन प्रेजेंस वैसा ही ताजा लगता है। दिल की सर्जरी के बाद भी जिस तरह उन्होंने वापसी की, उसने फैंस के बीच उनके लिए और ज्यादा सम्मान बढ़ा दिया।

आज ब्रह्मानंदम सिर्फ एक अभिनेता नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा की जीवित विरासत बन चुके हैं। उनकी कॉमेडी में वो अपनापन है जो हर उम्र के दर्शक को जोड़ देता है। शायद यही वजह है कि जब भी तेलुगु सिनेमा के सबसे बड़े एंटरटेनर्स की बात होती है, तो ब्रह्मानंदम का नाम सबसे ऊपर नजर आता है। उन्होंने साबित कर दिया कि असली स्टार वही होता है जो वक्त बदलने के बाद भी लोगों के चेहरे पर मुस्कान ला सके।

Pratahkal Newsroom

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