कौन हैं बिमल रॉय? वो फिल्ममेकर जिसने हिंदी सिनेमा को असली चेहरे से मिलवाया
यथार्थवादी सिनेमा के जनक बिमल रॉय को 2025 में फिल्मफेयर सिने आइकॉन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया, जानें उनकी फिल्मों और संगीत का सफर।

फिल्म निर्देशक बिमल रॉय जिन्हें 2025 में हिंदी सिनेमा में उनके अमर योगदान के लिए फिल्मफेयर सिने आइकॉन अवॉर्ड से मरणोपरांत सम्मानित किया गया।
आज जब लोग कंटेंट सिनेमा, रियलिस्टिक स्टोरी और इमोशनल फिल्मों की बात करते हैं, तो बिमल रॉय का नाम फिर से चर्चा में आ जाता है। सोशल मीडिया पर उनकी फिल्में, गाने और सिनेमा की विरासत नई पीढ़ी के बीच दोबारा वायरल हो रही है। “दो बीघा ज़मीन”, “मधुमती”, “बंदिनी” और “देवदास” जैसी फिल्मों को सिर्फ क्लासिक नहीं, बल्कि हिंदी सिनेमा की आत्मा माना जाता है। यही वजह है कि 2025 में उन्हें हिंदी सिनेमा में उनके अमर योगदान के लिए फिल्मफेयर सिने आइकॉन अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया और एक बार फिर लोग जानना चाहते हैं कि आखिर बिमल रॉय कौन थे, जिनकी फिल्में आज भी दिल पर सीधा असर करती हैं।
12 जुलाई 1909 को ढाका के एक बंगाली परिवार में जन्मे बिमल रॉय ने कैमरे के पीछे अपना सफर शुरू किया था। शुरुआत में वो न्यू थिएटर्स में कैमरा असिस्टेंट और सिनेमैटोग्राफर रहे। “देवदास” जैसी फिल्मों में उन्होंने पर्दे के पीछे काम किया और वहीं से सिनेमा की गहराई को समझा। बाद में कोलकाता से मुंबई आने का फैसला उनके करियर का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। अपने साथ उन्होंने ऋषिकेश मुखर्जी, सलिल चौधरी और नबेंदु घोष जैसे टैलेंटेड लोगों की पूरी टीम बनाई, जिसने आगे चलकर भारतीय सिनेमा की दिशा बदल दी।
बिमल रॉय की सबसे बड़ी ताकत थी उनकी कहानी कहने की शैली। वो ऐसे फिल्ममेकर थे जो गरीबी, समाज, प्यार, जात-पात और इंसानी भावनाओं को बिना किसी दिखावे के पर्दे पर उतारते थे। “दो बीघा ज़मीन” में किसान की मजबूरी हो या “सुजाता” में छुआछूत का दर्द, उनकी फिल्मों में हर किरदार असली लगता था। इटालियन नियो-रियलिस्ट सिनेमा से प्रेरित होकर उन्होंने ऐसा सिनेमा बनाया जो आम आदमी की जिंदगी से जुड़ा था। यही वजह रही कि “दो बीघा ज़मीन” ने कान्स फिल्म फेस्टिवल में इंटरनेशनल प्राइज जीता और दुनिया को दिखाया कि भारतीय सिनेमा सिर्फ गानों और ड्रामे तक सीमित नहीं है।
अगर बिमल रॉय की फिल्मों की बात हो और उनके संगीत का जिक्र न आए, तो कहानी अधूरी रह जाएगी। “सुहाना सफर और ये मौसम हसीं”, “आजा रे परदेसी”, “ओ सजना बरखा बहार आई”, “मोरा गोरा अंग लाई ले” और “जलते हैं जिसके लिए” जैसे गाने आज भी लोगों की प्लेलिस्ट में जिंदा हैं। सलिल चौधरी और एस.डी. बर्मन के साथ उनकी जोड़ी ने संगीत को भावनाओं से जोड़ दिया। उनकी फिल्मों के गाने सिर्फ सुनाई नहीं देते थे, बल्कि कहानी को महसूस करवाते थे। यही कारण है कि उनकी फिल्मों का म्यूजिक आज भी सदाबहार माना जाता है।
“मधुमती” को हिंदी सिनेमा की सबसे आइकॉनिक फिल्मों में गिना जाता है। पुनर्जन्म की कहानी पर बनी इस फिल्म ने आगे चलकर “कर्ज” से लेकर “ओम शांति ओम” तक कई फिल्मों को प्रेरित किया। दिलचस्प बात ये है कि “मधुमती” ने 1958 में 9 फिल्मफेयर अवॉर्ड जीतकर रिकॉर्ड बनाया था, जो पूरे 37 साल तक कायम रहा। बिमल रॉय सिर्फ शानदार निर्देशक नहीं थे, बल्कि वो नए कलाकारों को मौका देने वाले इंसान भी थे। आशा पारेख जैसे कई सितारों को उन्होंने शुरुआती ब्रेक दिया। उनकी फिल्मों ने पैरेलल सिनेमा और मेनस्ट्रीम बॉलीवुड के बीच की दूरी भी खत्म कर दी।
7 जनवरी 1966 को कैंसर की वजह से बिमल रॉय इस दुनिया को अलविदा कह गए, लेकिन उनका सिनेमा आज भी जिंदा है। उनकी फिल्में दुनिया भर के फिल्म फेस्टिवल्स में दिखाई जाती हैं, नेशनल फिल्म आर्काइव उन्हें रीस्टोर कर रहा है और नई पीढ़ी उन्हें फिर से खोज रही है। बिमल रॉय वो नाम हैं जिन्होंने फिल्मों को सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज का आईना बना दिया। यही वजह है कि दशकों बाद भी उनका जादू खत्म नहीं हुआ और हिंदी सिनेमा की बात उनके बिना अधूरी मानी जाती है।

Pratahkal Newsroom
प्रातःकाल न्यूज़-रूम, प्रातःकाल न्यूज़ की वह समर्पित संपादकीय टीम है, जो सटीक, समयबद्ध और निष्पक्ष समाचार पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध है। हमारा न्यूज़-रूम राजनीति, समाज, अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय मामलों में सत्यापित रिपोर्टिंग, गहन विश्लेषण और जिम्मेदार पत्रकारिता पर अपना ध्यान केंद्रित करता है।
