26/11 का वह साहसी अध्याय: केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने सराही कंगना रनौत की ‘भारत भाग्य विधाता’
26/11 के खौफनाक आतंकी हमले में कामा अस्पताल की नर्सों द्वारा दिखाई गई बहादुरी की अनकही कहानी अब बड़े पर्दे पर। क्या था वह साहस जिसने 400 जिंदगियां बचाईं? केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी द्वारा सराही गई फिल्म ‘भारत भाग्य विधाता’ के इस भावुक सफर को जानें।

फिल्म 'भारत भाग्य विधाता' की स्क्रीनिंग के बाद केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने 26/11 हमले में नर्सों के योगदान को याद कर उनकी सराहना की।
मुंबई के कामा अस्पताल में 26/11 के खौफनाक आतंकी हमले के दौरान अपनी जान जोखिम में डालकर 400 से अधिक लोगों की जान बचाने वाली नर्सों और अस्पताल कर्मियों की निडरता अब बड़े पर्दे पर जीवंत हो उठी है। कंगना रनौत अभिनीत फिल्म ‘भारत भाग्य विधाता’ ने न केवल दर्शकों को झकझोर दिया है, बल्कि केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने भी इस फिल्म की मुक्तकंठ से प्रशंसा की है। 12 जून 2026 को फिल्म की स्क्रीनिंग के बाद मीडिया से मुखातिब होते हुए गडकरी ने उन यादों को ताजा किया जब वे स्वयं 2008 में मुंबई में मौजूद थे और उन्होंने इस मंजर को करीब से देखा था।
केंद्रीय मंत्री ने स्पष्ट किया कि यह फिल्म केवल एक व्यावसायिक सिनेमा नहीं, बल्कि उन गुमनाम नायकों को एक भावभीनी श्रद्धांजलि है जिन्होंने गोलियों की गूंज के बीच अपना कर्तव्य निभाया। गडकरी के अनुसार, फिल्म में नर्सों के साहस का जो चित्रण किया गया है, वह वास्तविक और प्रेरणादायक है। उन्होंने जोर देकर कहा कि आज के युवाओं को इन वास्तविक जीवन के नायकों से समर्पण और सेवाभाव की सीख लेनी चाहिए। फिल्म की पटकथा को 2008 की वास्तविक घटनाओं और प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों पर तैयार किया गया है, जो इसकी गंभीरता को और बढ़ा देता है।
फिल्म के शीर्षक ‘भारत भाग्य विधाता’ के पीछे की प्रेरणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा राष्ट्र के मेहनतकश वर्ग को दिए गए सम्मान से जुड़ी है। कंगना रनौत ने साझा किया कि यह शीर्षक उन अदृश्य हाथों को समर्पित है जो देश की नींव को मजबूत रखते हैं। दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने भी फिल्म की विशेष स्क्रीनिंग में हिस्सा लिया, जो इस कथा की सामाजिक और राजनीतिक प्रासंगिकता को रेखांकित करता है। यद्यपि फिल्म का बॉक्स ऑफिस पर प्रदर्शन स्थिर है, लेकिन इसकी असली सफलता उन कहानियों को सामने लाने में है जो अक्सर मुख्यधारा के विमर्श में पीछे छूट जाती हैं। यह फिल्म हमें यह स्मरण कराती है कि राष्ट्र का वास्तविक भाग्य विधाता कोई वर्दीधारी सेनानी ही नहीं, बल्कि वे सामान्य सेवाकर्मी भी हैं जो संकट के समय अडिग खड़े रहते हैं।

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